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एमपी चुनाव, बनते बिगड़ते मुद्दे और हाव-भाव

सार

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रण मिलते ही चुनावी राज्यों में सियासत शुरू हो गई. मध्यप्रदेश से सबसे पहली आवाज कांग्रेस के सीएम फेस कमलनाथ ने उठाई. उन्होंने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के लिए भाजपा नेताओं को ही क्यों आमंत्रित किया गया है? जब श्रीराम की जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए कारसेवकों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे. तब यह आवाज़ क्यों नहीं आई थी कि अयोध्या का आंदोलन सभी राजनीतिक दलों का है?

janmat

विस्तार

चुनावी घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण का संकल्प व्यक्त करने वालों को ही मंदिर निर्माण के श्रेय का हक बनता है. सनातन धर्म और आस्था के लिए श्रीराम जन्मभूमि मंदिर चुनावी वाद-विवाद का विषय नहीं हो सकता है. सनातन को डेंगू और मच्छर मानने वाली विचारधारा के सहयोगी और समर्थक चुनावी नजरिये से राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में भागीदारी की मांग कर रहे हैं तो यह सनातन के लिए बड़ी उपलब्धि है. जब मंदिर बन गया है तब हर भारतवासी जिसकी सनातन में आस्था है उसे आत्म कल्याण के लिए इससे जुड़ना ही होगा.

भारत की राजनीति में अयोध्या आंदोलन ने ध्रुवीय परिवर्तन किया है. बीजेपी का विस्तार अयोध्या आंदोलन के साथ जुड़ा हुआ है. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा भारतीय राजनीति में सनातन की प्राण-प्रतिष्ठा का परम अवसर बन गया है. इसके पहले भारतीय राजनीति तुष्टिकरण की बुनियाद पर चलती थी. श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय भी तुष्टिकरण के जांबाज नेता और प्रवक्ता अपने जनाधार के लिए सनातन सोच पर हमला कर रहे थे. यह हमला अभी भी जारी है. 

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की तिथि 22 जनवरी निर्धारित हो गई है. इस उपलब्धि के लिए बीजेपी की लीडरशिप में संघर्ष देश के सभी राज्यों में किया गया था. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार द्वारा भाजपा शासित तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की सरकारें बर्खास्त की गई थी. भाजपा की सरकारों को बर्खास्त कराने के एजेंडे का नेतृत्व मध्यप्रदेश के ही बड़े कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह द्वारा किए जाने की चर्चा ज़ोरों पर थी. तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा थे.

अब जब मंदिर का निर्माण हो गया है, प्राण प्रतिष्ठा की तिथि आई है, तब एमपी में विधानसभा के चुनाव शुरू हो चुके हैं. इन चुनावों में राम मंदिर के मुद्दे का प्रवेश हो चुका है. शहरों में बीजेपी की ओर से पोस्टर लगाए गए हैं. इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के फोटो के साथ यह कहा गया है कि ‘भव्य राम मंदिर बनकर हो रहा है तैयार, फिर इस बार भाजपा सरकार’.

राम मंदिर के आंदोलन में बीजेपी एक बार अपनी सरकार गंवा चुकी है. अब जब प्राण प्रतिष्ठा का शुभ अवसर आया है तो निश्चित रूप से बीजेपी इसको भुनाने में कोई कमी नहीं छोड़ेगी. मध्यप्रदेश में पहले से ही चुनाव हिंदुत्व की पिच पर ही दिख रहा है. कांग्रेस तुष्टिकरण की अपनी पुरानी शैली को कायम रखते हुए सॉफ्ट हिंदुत्व का चोला ओढ़ने की कोशिश में है. 

अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता. अयोध्या आंदोलन का अतीत कांग्रेस का कभी भी पीछा नहीं छोड़ेगा. राजनीतिक सहूलियत के लिए कोई भी नया चोला ओढ़ा जा सकता है लेकिन नए चोले से पुराने चोले की वास्तविकता छिपाई नहीं जा सकती है.

मध्यप्रदेश की चुनावी तासीर सामान्य तौर पर शांतिप्रिय और विकास उन्मुख रहती है. कांग्रेस की अंदरूनी बगावत के कारण सरकार जाने के बाद एमपी में राजनीतिक कटुता बढ़ी है. मुफ्तखोरी की योजनाओं में एक दूसरे को पीछे धकेलने की कोशिशें लगातार चल रही हैं. कर्नाटक के बाद कांग्रेस हिंदुत्व को अपना चुनावी चेहरा बनाने की पूरी कोशिश में है. एमपी में तो कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सीरियल में हनुमान की भूमिका निभा चुके अभिनेता को चुनाव मैदान में उतार दिया है. इसके पीछे भी यही भावना काम कर रही है कि कांग्रेस हिंदुत्व की आस्था में किसी से कम नहीं है. हालाँकि, पार्टी में ही इस पर अंतर्विरोध है. 

सिद्धांत और विचारधारा सुविधा के हिसाब से बदली नहीं जा सकती है. सोशल मीडिया के इस दौर में पॉलीटिकल अवेयरनेस का लेवल लगातार बढ़ता जा रहा है. इजराइल-हमास युद्ध में फिलिपींस का समर्थन और हमास की निंदा नहीं करने के कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव पर भी तुष्टिकरण की जनचर्चा को रोका नहीं जा सका. 

भारत में तो राजनीति ना मालूम किन-किन मुद्दों पर निर्णायक रूप ले लेती है. कभी प्याज के दाम सरकारें बदल देते हैं, कभी आतंकवाद और तुष्टिकरण राजनीतिक दलों को पतन के रास्ते पर धकेल देते हैं. कभी मुफ्तखोरी की योजनाएं जनादेश को प्रभावित कर देती हैं. कभी सिद्धांत और विचारधारा छोटे-छोटे हितों पर कुर्बान हो जाती हैं.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तो भारत की आत्मा है. अब जब श्रीराम मंदिर बनकर तैयार हो गया है तो मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की खुशी सनातन और हिंदू प्रेमियों को अपनी राजनीतिक ताकत मजबूत करने की प्रेरणा दे सकती है. सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो देखकर तो धर्म और आस्था पर विभाजन के वीभत्सकारी विचार कंपकंपी छुड़ाने लगते हैं. सनातन और हिंदू हमेशा सहिष्णुता की राजनीतिक भूमिका निभाता रहा है. कट्टरता उसका डीएनए नहीं है. सनातन के खिलाफ कट्टर विचार और एक्शन भी राष्ट्र की एकता को प्रभावित करने में सफल नहीं हो पाए हैं तो इसके पीछे सनातन सोच सबसे बड़ा कारण है.

यूपी में चुनाव के समय सपा और राष्ट्रीय लोकदल के साथ जब गठजोड़ हुआ था तब ऐसे राजनीतिक संकेत दिखाये जा रहे थे कि हिंदुत्व के खिलाफ संप्रदाय और जातीय ध्रुवीकरण भारी पड़ सकता है. चुनाव परिणामों ने उन संकेतों को गलत साबित किया था. बिहार की जातीय जनगणना को राहुल गांधी ने चुनावी राज्यों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया है. कांग्रेस ने जातिगत जनगणना कराने का वायदा किया है. जातिगत जनगणना के कांग्रेस के प्रयास को हिंदुत्व और सनातन को कमजोर करने का आरोप भाजपा ने लगाया है. 

राममंदिर का निर्माण सनातन हृदय का सनातन भाव रहा है. जो सदियों बाद पूरा हो रहा है. जिन कारसेवकों ने अपने प्राण दिए हैं, वे नए जन्म में जहां भी होंगे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का शुभ अवसर उन्हें भी आनंद और शांति जरूर प्रदान करेगा.

जाति और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ाकर तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए जनादेश की कोशिशें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के शुभ संकल्प से चुनावी मुद्दों को नए सिरे से निर्धारित कर सकते हैं. ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण के समीकरण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के पावन प्रकाश में बदल सकते हैं. चुनावी नतीजे अपनी जगह हैं लेकिन सनातन के लिए श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा सदियों तक भारत की संस्कृति और गौरव की पताका दुनिया में फहराती रहेगी. इस पर राजनीति होनी ही थी जो चालू हो गई है. चुनाव के लिए ही सही अगर हर व्यक्ति रामभक्त होने का प्रयास करता है तो यह सनातन के लिए शुभ संकेत है.