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सांसद: क्या संस्कार पाए हैं? 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 19 Jun

सार

संसद के नए भवन में, ऐतिहासिक विधेयक पारित करने के बाद, इस सांसद ने लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली पर धब्बे छाप दिए थे..!

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विस्तार

ग़ज़ब बात है संसद में अपशब्दों का प्रयोग करने वाले सांसद रमेश बिधुड़ी ने अपनी हिमाक़त का औचित्य भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  जगत प्रकाश नड्डा के सामने बखान आए और उन्होंने सुन भी लिया। संसद के नए भवन में, ऐतिहासिक विधेयक पारित करने के बाद, इस सांसद ने लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली पर धब्बे छाप दिए थे । संसद पर ही सांप्रदायिक कलंक चस्पा कर दिया गया। भाषा और संवाद की मर्यादा को तार-तार हो गई।राजनीति की विविधता को नष्ट हुई।लोकसभा के भीतर अपने पूर्वाग्रह और भद्दे अपशब्दों का इस्तेमाल कर साबित किया है कि एक सांसद, सदन के भीतर ही, साथी सांसद के प्रति कितना असहिष्णु हो सकता है और उसकी जुबान किस हद तक बेलगाम हो सकती है! 

दक्षिण दिल्ली के भाजपा सांसद रमेश बिधुड़ी ने अमरोहा (उप्र) के बसपा सांसद दानिश अली के लिए जिन अपशब्दों का प्रयोग किया है, वह व्यवहार पूरी तरह अक्षम्य है, क्योंकि समूची संसदीय प्रणाली और संसद को परोक्ष गाली दी गई है। भाजपा सांसद को सदन में ही, ऐसे अपशब्दों के लिए, स्पीकर को तुरंत रोकना चाहिए था। उन्हें बोलने के लिए रोका जा सकता था। रिकॉर्ड से ऐसे शब्दों को हटाना ही पर्याप्त नहीं है। बहरहाल आसन पर अध्यक्ष के बजाय पीठासीन अधिकारी मौजूद थे, तो उनके पास भी स्पीकर वाले संसदीय और संवैधानिक अधिकार थे। अलबत्ता भाजपा सांसद को स्पीकर की चेतावनी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करना और स्पष्टीकरण के लिए 15 दिन की अवधि देना कार्रवाई के नाम पर लीपापोती ही तो है। इससे गलत और कुरूप परंपराओं को प्रश्रय मिलता है। संविधान के अनुच्छेद 105 (2) के मुताबिक, संसद में कही गई बात को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

इस निरंकुशता में भी संशोधन किया जाना चाहिए। हो सकता है स्पीकर इस मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजें, लेकिन ऐसे गालीबाज सांसद को तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए था। जब कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी और विपक्ष के अन्य सांसदों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई, तो तुरंत फैसला लिया गया। क्या रमेश बिधुड़ी को सत्ता पक्ष का सांसद होने के नाते ढील दी गई है और मुद्दे को शांत और ठंडा होने दिया जा रहा है? किसी गली-मुहल्ले, सडक़ या चुनावी जनसभा के दौरान गालियां नहीं दी गई हैं। यह आचरण लोकतंत्र के सर्वोच्च, पावन मंदिर लोकसभा में किया गया है, लिहाजा सांसद ने संसद को भी अपमानित किया है। 

एक सांसद लाखों मतदाताओं का प्रतिनिधि होता है, लिहाजा उन अनाम, लाखों चेहरों को भी गाली दी गई है। कुछ बड़े, अखबारों और सोशल मीडिया पर ये शब्द छपे हैं। भाजपा सांसद ने लोकसभा में बोलते हुए बसपा सांसद के लिए ‘भड़वा’, ‘कटवा’, ‘मुल्ला उग्रवादी’ और ‘आतंकवादी’ आदि अपशब्दों का इस्तेमाल किया। क्या लोकसभा की शालीन, भद्र और संसदीय भाषा का व्यवहार यही है? इन अपशब्दों के प्रयोजन और संदर्भ क्या थे?

क्या भाजपा सांसद के संस्कार यही हैं और वे परिवेशजन्य कुंठाओं से ग्रस्त हैं? कारण कुछ भी हो, संसद के भीतर ये गालियां स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। देश के प्रधानमंत्री मोदी के लिए कांग्रेस नेताओं ने अनेक गालियों का इस्तेमाल किया है और वे अपशब्द इनसे भी ज्यादा अभद्र और अश्लील रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इधर भाजपा सांसद ने बसपा सांसद को गालियां दीं, उधर हरियाणा के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उदयभान ने अकारण ही प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री के लिए घोर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। क्या राजनीति इसी आधार पर की जा सकती है? दरअसल हमारी राजनीति में हिंदू-मुसलमान करने की नेताओं की आदत पड़ गई है। इस हम्माम में कुछ केंद्रीय मंत्री भी डूबे हैं। उनके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, लिहाजा शक होता है कि बिधुड़ी के खिलाफ भी कुछ किया जाएगा।