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कर्नाटक की अल्पसंख्यक सब्सिडी योजना, कांग्रेस की निश्चेतना

सार

कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए वाहन खरीदी सब्सिडी योजना जारी की है. इस योजना में मुस्लिम सहित धार्मिक अल्पसंख्यक पात्र होंगे. बहुसंख्यक हिंदुओं को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा. राजनीतिक रूप से मूर्छित कांग्रेस को सरकार विरोधी रुझानों के कारण कुछ राज्यों में सरकारों में आने का जनादेश भी जगाने के लिए पर्याप्त नहीं हो रहा है.

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विस्तार

भारतीय राजनीति में बहुत लंबे समय के बाद ऐसी योजना सामने आई है जिसमें धर्म के आधार पर हितग्राहियों के तुष्टिकरण का प्रयास किया जा रहा है. दूसरी तरफ बहुसंख्यक हिंदुओं को योजना का लाभ लेने से महरूम किया जा रहा है. सब्सिडी योजना अगर सभी जातियों समुदायों के लिए लाई जाती तो कांग्रेस की सरकार पर वित्तीय बोझ शायद बहुत अधिक नहीं बढ़ता लेकिन एक के साथ मोहब्बत और दूसरे के साथ नफरत के जरिए राजनीतिक दुकान चलाने का अवसर जरूर कम हो जाता.

अल्पसंख्यक भी इस देश के अभिन्न अंग हैं. उनका कल्याण और बेहतरी सरकारों का दायित्व है लेकिन सरकारी योजनाओं में धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देना स्वीकार योग्य नहीं है. इस तरह के सियासी समीकरण वाली सरकारी योजनाओं से वास्तव में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के हितग्राहियों के जीवन में बेहतरी नहीं आती लेकिन उनको लेकर समाज में विभाजन की खाई सरकारों के कारण बढ़ने का खतरा जरूर बन जाता है. सरकारी योजनाओं में धार्मिक समुदायों का तुष्टिकरण बहुसंख्यकों के प्रति नफरत का प्रगटीकरण नहीं तो और क्या कहा जाएगा?

कांग्रेस का राजनीतिक एजेंडा बीजेपी पर नफरत फैलाने का आरोप लगाकर वोट बैंक को मजबूत करना बन गया है. यह कभी नहीं बताया जाता कि नफरत के कौन से कदम बीजेपी सरकार द्वारा उठाए गए? बीजेपी धार्मिक मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में जरूर रखती दिखती है लेकिन सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक हितग्राहियों में भेदभाव की योजनाएं अब तक तो नहीं देखी गईं हैं. बीजेपी सरकार की जनहित से जुड़ी महत्वपूर्ण योजनाओं में सब के स्वास्थ्य की आयुष्मान योजना सभी समुदायों को बराबरी का लाभ पहुंचा रही है. किसानों को सम्मान निधि के मामले में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के रूप में किसान की पहचान योजना का उद्देश्य नहीं है. पीएम आवास योजना पात्रता के लिए किसी समुदाय का होना आधार नहीं है बल्कि उपलब्धता और पात्रता सबके लिए समानता के साथ उपलब्ध है. प्रधानमंत्री जन धन योजना के खाते भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक देखकर नहीं खोले जाते. प्रधानमंत्री उज्जवला योजना में गैस के प्रदाय भी किसी एक समुदाय के लिए नहीं हैं.

कांग्रेस अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति चमकाने की अभ्यस्त रही है. क्षेत्रीय दलों के विकास और विस्तार के कारण कई राज्यों में कांग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक की पहुंच से बाहर हो गई है. भारत जोड़ो यात्रा भी सभी वर्गों को समानता के साथ सरकारी योजनाओं का लाभ देने का आधार नहीं बन पाई. आज जब दुनिया इंसान के प्रतीक चिन्हों से जाति और धार्मिक पहचान को प्रतिबंधित करने के विचार पर आगे बढ़ रही है तब कांग्रेस सरकारी योजनाओं में एक से मोहब्बत और दूसरे से नफरत की धार्मिक राजनीति का अपना पुराना रवैया छोड़ नहीं पा रही है. यह मामला राजनीतिक लाभ या नुकसान से ज्यादा समाज के लाभ और नुकसान से जुड़ा हुआ है.

राजनीति में प्रगतिशीलता की अपेक्षा कांग्रेस से ज्यादा की जानी चाहिए. यह पार्टी आजादी और देश के नवनिर्माण को अपनी विरासत मानती है. सरकारी योजनाओं में तुष्टिकरण और नफरत के प्रतीकों पर कर्नाटक सरकार का मॉडल क्या देश के नव निर्माण के नजरिए से किया जा रहा है या पार्टी निर्माण के लिए वोट बैंक की मजबूरी के नासूर को बढाया जा रहा है?

राहुल गांधी कहते हैं कि उन्होंने गीता पढ़ी है, उपनिषद पढ़े हैं. इनमें हिंदू नेशनलिस्ट कोई शब्द नहीं है. कांग्रेस को हिंदू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद शब्द तो दिखाई पड़ जाते हैं उनका राजनीतिक उपयोग समझ आ जाता है लेकिन हिंदू नेशनलिस्ट समझ नहीं आता है. राहुल गांधी जिन महान ग्रंथों की बात कर रहे हैं वे सनातन हिंदू संस्कृति के ही ग्रंथ और शास्त्र हैं. इन शास्त्रों में कहीं भी ऐसी मोहब्बत और नफरत का उल्लेख नहीं है जो कांग्रेस की सरकारें अपनी योजनाओं में दिखाने के लिए मजबूर हुई हैं.

अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों में देश को बांटना बंद नहीं किया गया तो यह राजनीति विनाशकारी रूप ले सकती है. राजनीति ही देश में जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के नासूर के लिए जिम्मेदार है. चुनावी राजनीति तक ही इन गंभीर बीमारियों को सीमित रखा जाए तो ज्यादा अच्छा होगा. सरकारी योजनाओं में कम से कम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद की विभीषिका को बढ़ाने का काम नहीं किया जाना चाहिए. जिस बीजेपी को अल्पसंख्यक विरोधी कहा जाता है उस बीजेपी ने भी सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद कभी नहीं किया है तो फिर कांग्रेस की क्या मजबूरी है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग से सब्सिडी योजना लाना पड़ा?

सोशल मीडिया पर यह बताया जा रहा है कि कर्नाटक सरकार की इस योजना में केवल मुस्लिम नहीं बल्कि जैन, सिख, ईसाई और पारसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में शामिल हैं. वैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों में बड़ी जनसंख्या मुस्लिमों की है लेकिन फिर भी कितने भी समुदाय उसमें शामिल हो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के रूप में सरकारी धन से योजनाओं के माध्यम से विभाजनकारी वोट बैंक की राजनीति को बढ़ाना राजनीतिक आत्मघात ही साबित होगा.