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नाम-उपनाम नहीं, काम बनाता है पहचान

सार

इंडिया में मीडिया की सनसनी बनी पाकिस्तान की सीमा हैदर को सरहद पार हिंदुस्तान में उसका प्यार मिल गया और नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं पड़ी. नाम पहचान के रूप में जरूर आवश्यक है लेकिन काम का नाम से कोई संबंध नहीं है. कई सारे लोगों के नाम नयनसुख मिल जाएंगे लेकिन नजर नहीं होगी. नाम मिठाई लाल लेकिन ज़ुबान पर 24 घंटे कड़वाहट. नाम भगवान राम और कृष्ण पर लेकिन काम से बदनाम. नाम और कम को लेकर ढेरों कविता शायरी और गीत उपलब्ध हैं.

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विस्तार

भारत की सियासत में अभी तक राजनीतिक दल और गठबंधन के नाम को लेकर सियासत नहीं देखी गई थी लेकिन विपक्षी गठबंधन का I.N.D.I.A उपनाम इंडिया की बदनामी का सबब बन गया है. गठबंधन जहां एक ओर I.N.D.I.A को अपना प्रतीक बता रहा है. वहीं, बीजेपी I.N.D.I.A नाम पर अंग्रेजों द्वारा देश में लूट आतंक और मुस्लिम राजनीति से जोड़कर यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि इंडिया नाम को राजनीतिक गठबंधन के लिए उपनाम का गठजोड़ घोषित कर इंडिया के स्वाभिमान का राजनीतिक शोषण नहीं किया जा सकता.

भाजपा संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इंडिया नाम के इस्तेमाल से देश के लोगों को गुमराह नहीं किया जा सकता. अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई थी. इंडियन मुजाहिदीन में भी इंडिया नाम का इस्तेमाल किया गया है. पापुलर फ्रंट आफ इंडिया में भी इंडिया नाम का इस्तेमाल है.

इन तीनों नामों के काम और इतिहास पर नजर डाली जाए तो ईस्ट इंडिया कंपनी के सहारे तो अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया. भारत में आतंकवादी घटनाओं में इंडियन मुजाहिदीन की भूमिका कई बार उजागर हुई है. पापुलर फ्रंट आफ इंडिया भारत में गजवा ए हिंद की स्थापना के लिए किस तरह के कुचक्र रचती है इसके बारे में अनेक बार छापे-गिरफ्तारियां हुई हैं.

जैसे गठबंधन में I.N.D.I.A नाम प्रतीक बनाया गया है वैसे ही देश के स्वाभिमान को खंडित करने वाले इन संगठनों द्वारा भी इंडिया नाम का उपयोग किया गया है. कानूनी रूप से इंडिया नाम के साथ जोड़कर कोई भी प्रतीक नहीं बनाया जा सकता है. ना तो कोई व्यापारिक या अन्य गतिविधियों के लिए इंडिया नाम का उपयोग किया जा सकता है .विपक्षी गठबंधन ने इंडिया का इस्तेमाल करने के लिए अपने गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलाइंस सृजित किया है. अगर व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट है कि इंडिया नाम पर पहुंचने के लिए वर्णमाला के इंडिया में शामिल अक्षरों के अनुरूप शब्द गढ़े गए हैं.

सबसे बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या नाम से काम का कोई संबंध है? नाम प्रारंभिक पहचान हो सकती है लेकिन जीवन में असली पहचान काम ही होता है. बहुत प्रसिद्ध यह गीत राजनीतिज्ञों को याद रखना चाहिए कि ‘नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा मेरी आवाज ही पहचान है’. 

आवाज मतलब जीवन में आपके द्वारा किए गकाम. विपक्षी गठबंधन के I.N.D.I.A नाम ने राजनीतिक हलचल जरूर मचाई है लेकिन यह भी सच है कि ब्रांडिंग के सिद्धांतों में नाम अगर लाभ पहुंचाता है तो गुणवत्ता में कमी होने पर वही सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचाता है.

इंडिया का नाम और स्वाभिमान अभी तक तो राजनीतिक लोगों के काम के कारण खराब होता रहा है. विश्व के सामने इंडिया के नाम पर भारतीय संस्कृति से ज्यादा भ्रष्टाचार, घोटाले, तुष्टीकरण और राजनीतिक कांव-कांव की छवि बनाई गई है. इसके पीछे राजनीति ही दोषी है. अभी तक तो काम और बयान के कारण इंडिया की बदनामी होती थी लेकिन अब तो गठबंधन के उपनाम से ही राजनीतिक विवाद गहराये हुए हैं. 

सरहद से ज्यादा संसद में सरहदें बन गई हैं. संसद राजनीतिक सरहदों का केंद्र बन गई है. जनता के मुद्दे तो संसद में कभी कभार ही सामने आते हैं. राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक हदबंदी के तहत गोलबंदी और गठजोड़ कर मुद्दों को इस्तेमाल करते हैं. भारत की विडंबना है कि आज राजनीतिक दृष्टिकोण से देश विभाजित हो गया है.

सोशल मीडिया पर यदि राजनीतिक नजरिए से लिखी जाने वाली विभाजनकारी टिप्पणियों को दिल से महसूस किया जाए तो ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया वाला इंडिया पूरी तरह से बंट चुका है. इंडिया में बंटवारा सत्ता के लिए न केवल प्रोत्साहित किया जा रहा है बल्कि इसके लिए प्रोफेशनल एजेंसियों को करोड़ों रुपए के भुगतान भी किए जा रहे हैं.

सियासत में सत्ता की लड़ाई स्वीकार्य है लेकिन सत्ता के लिए देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किसी को भी स्वीकार्य नहीं हो सकता. किसी भी गठबंधन द्वारा देश के नाम ‘इंडिया’ को उपनाम के रूप में इस्तेमाल कर अगर यह सोचा जाए कि इससे इंडिया का प्रतीक उनके साथ जुड़ जाएगा तो यह राजनीतिक महाभूल ही होगी. भारत की बुनियादी समस्याओं पर राजनीतिक विमर्श भी राजनीतिक नजरिए में विभाजित हो गया है. आम सहमति के विषयों पर भी केवल राजनीति सामने आ रही है. बेरोजगारी-महंगाई के मुद्दे विपक्षी दल राष्ट्रीय स्तर पर तो उठाते हैं लेकिन राज्यस्तर पर उनकी सरकारों में इन मुद्दों पर चुप्पी साध ली जाती है. 

राजनीतिक पाखंड का क्रूर चेहरा अब इंडिया के स्वाभिमान को ही राजनीति के कुचक्र में खींचने लगा है. सियासत में नाम और उपनाम की राजनीति कहने के लिए तो देश के लिए है लेकिन देश का ऐसी राजनीति से कोई सरोकार नहीं हो सकता. सियासत की सच्चाई इंडिया की सच्चाई नहीं हो सकती. राजनीति के जो भी लाल हैं वे अपने को 'मिस्टर इंडिया' और 'मिसेज इंडिया' कहकर अपनी 'मिस्टर इंडिया' फिल्म को सफल नहीं बना सकते.