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पॉलिटिक्स बन गई पाखंड की पहली पाठशाला

सार

किसी राजनेता को कट्टर ईमानदार बताते हुए भारत रत्न दिए जाने की मांग शायद देश में पहली बार सामने आई है। यह मांग भी आम जनता की ओर से नहीं बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की ओर से अपने उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के लिए उठाई गई है। यह डिमांड भी ऐसे समय उठाई गई है जब शराब नीति में घोटाले के आरोपों में केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने उपमुख्यमंत्री सिसोदिया के घर छापा डाला है। 

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विस्तार

न्याय की हमारी अवधारणा ऐसी है कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए। ऐसी अवधारणा राजनीति में ईमानदारी के लिए भी है। जब तक कोई पकड़ा नहीं जाए तब तक हर व्यक्ति ईमानदार है। राजनीति में ईमानदारी एक धोखा सा है। राजनीति की प्रारंभिक ईकाई राजनीतिक दल का गठन और उसका संचालन ईमानदारी से किया जा सकता है, ऐसा सोचना भी शायद सही नहीं होगा। 

आज ईमानदारी एक पाखंड सा बन गई है, ईमानदार होने का परसेप्शन बनाने में जो भी सफल हो गया, वह सत्ता तक पहुंच जाता है। लड़ाई ईमानदार होने की नहीं है बल्कि लड़ाई ईमानदार होने के परसेप्शन की है। आज यही भारतीय राजनीति में खुलेआम हो रहा है। ईमानदारी का परसेप्शन जनता को एक मृग मारीचिका सा दिखाया जाता है लेकिन सच तो यह है कि पॉलिटिक्स पाखंड की पहली पाठशाला बन चुकी है। 
 
किसी नेता का व्यक्तिगत नाम लेकर कुछ भी कहना सही नहीं होगा लेकिन जो भी राजनीति में हैं, वे सब एक जैसा ही आचरण और व्यवहार करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। एक दूसरे को बेईमान बताने के लिए आरोप-प्रत्यारोप लगाना आम बात है। हमारी राजनीति आज ऐसे दौर में पहुंच गई है कि ईमानदारी की बात सुनकर जनता को चिढ़ होने लगती है।

राजनीति की शुरुआत सबसे पहले दल के अंदर अपना स्थान मजबूत करते हुए चुनाव के लिए टिकट प्राप्त करने की हिमालयीन चुनौती से होता है। पैसे के बदले टिकट, पैसे के बदले वोट और पैसा लेकर ही समर्थन, हमारे लोकतंत्र की पहचान बन गई है। जनता की जनता द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार आज पैसे की, पैसे द्वारा और पैसे के लिए काम करने लगी है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है और किसी भी राजनीतिक नेता को लोकतंत्र का यह स्वरूप ना दिखाई पड़ रहा है और ना परेशान कर रहा है। 

ईमानदार और बेईमान होने के विभिन्न दलों और नेताओं के अपने-अपने तर्क हैं। चुनाव में जीत अथवा जोड़-तोड़ से सरकार में बने रहना राजनीतिक सफलता की कसौटी बन गई है। सत्ता-सुख की सौदागिरी की आज दुकानें सजी हुई दिखाई पड़ती हैं। जितने खरीदार नहीं है उससे ज्यादा बिकने वाले तैयार दिखाई पड़ते हैं। 

आम आदमी पार्टी जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन से पैदा हुई थी आज स्वयं करप्शन के भंवर में उलझी दिखाई पड़ रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री जो करप्शन के खिलाफ जंग के लिए राजनीति में आये थे, वह आज जेल में बंद मंत्री के मंत्रिमंडल के लीडर बने हुए हैं। दिल्ली के एक मंत्री हवाला मामले में जेल में बंद हैं। भले ही अभी आरोप ही हों लेकिन अभी तक तो ऐसी परंपरा रही है कि जेल में जाने के बाद व्यक्ति मंत्री पद पर नहीं रह सकता।

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार में ऐसे दो मंत्रियों को लंबे समय तक मंत्री बनाये रखा गया जो जेल में थे और अब दिल्ली के मुख्यमंत्री भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं। जब तक आरोपी अदालत से दोषमुक्त नहीं हो जाते तब तक किसी व्यक्ति को मंत्री कैसे बनाए रखा जा सकता है? इसके लिए तर्क कुछ भी दिए जाएं लेकिन राजनीतिक नैतिकता तो यही कहती है कि ऐसे व्यक्ति को मंत्री पद से हटाया जाना चाहिए।  

अब शराब नीति घोटाले को ही देख लीजिए। जांच के बाद तो सच्चाई सामने आएगी ही लेकिन इतना तो स्पष्ट ही दिखाई पड़ रहा है कि दिल्ली सरकार ने शराबनीति में जो बदलाव किए हैं उससे शराब ठेकेदारों को लाभ होता है। 

शराब का व्यवसाय राज्य की सरकारों का पसंदीदा विषय होता है। सरकार हर साल शराबनीति बनाती है। इन नीतियों को बनाने के पीछे सरकार के राजस्व को बढ़ाने का एक लक्ष्य जरूर बताया जाता है लेकिन वास्तविक लक्ष्य ठेकेदारों को लाभान्वित कर उनसे चंदे के रूप में बड़ी राशि हासिल करना होता है। इस तरह की प्रक्रिया सभी राज्य सरकार अपनाती हैं। दिल्ली सरकार ने भी ऐसा ही किया है। दुकानों की संख्या बढ़ाई गई। 

मध्यप्रदेश में भी देशी-विदेशी मदिरा की दुकानें एक साथ खोलकर दुकानों की संख्या को बढ़ाया गया। तकनीकी रूप से यह कहा जा सकता है कि संख्या तो दुकानों की उतनी है लेकिन जहां देशी दारू दुकान पर विदेशी नहीं मिलती थी। वहां विदेशी दारू मिलने लगी, ऐसे ही विदेशी दारू की दुकानों पर देशी दारू मिलने लगी। बिक्री के केंद्र बढ़ने से ठेकेदारों को लाभ होना स्वाभाविक है। लाभ के बंटवारे के बिना कोई ठेकेदार दुकान कैसे चला पाएगा? 

आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के आरोपों का राजनीतिकरण कर रही है। एक ओर जहां वह आरोपी मंत्रियों को बचा रही है वहीं अपने राजनीतिक विरोधी बीजेपी को इसके लिए जिम्मेदार बता रही है। साथ ही यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि भाजपा दिल्ली में उनकी सरकार को गिराना भी चाह रही है।  

यह घटनाक्रम केवल एक दल का सवाल नहीं है। प्रत्येक राज्य में जो भी दल या नेता फंसता है, वह इसके लिए दूसरे को जिम्मेदार बताता है। आजादी के समय से ही ऐसी स्थिति चलती आ रही है और राजनीति में ईमानदारी का पाखंड देश देखता रहा है। 

जिन राज्यों में शराबबंदी है वहां पर शराब सहजता से उपलब्ध हो जाती है। यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन किसी को दिखता भी नहीं है। बांध टूट जाते हैं। सड़कें बह जाती हैं। नियुक्तियों में योग्यता को दरकिनार कर रिश्वतखोरी के जरिए अपात्र लोगों को नियुक्तियां मिल जाती हैं। किसी भी सरकारी दफ्तर में सेवा प्राप्त करने के लिए आम आदमी को कितनी कठिनाइयां भुगतनी पड़ती हैं, यह सर्वविदित है लेकिन किसी को भी दिखाई नहीं पड़ता। 

संसदीय लोकतंत्र छीना-छपटी तंत्र के रूप में बदलता जा रहा है। इसे तानाशाही लोकतंत्र कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राज्य सत्ता का दुरुपयोग आम बात है। शासन की सुविधाओं की बंदरबांट होती है। दिल्ली-भोपाल और जहां भी मिलना संभव हो हर जगह सरकारी बंगले कब्जाना राजनेताओं का पहला लोकतांत्रिक अधिकार बन गया है। कोई राजनीतिक दल या नेता चुनाव सुधार की बात नहीं करता। 

जनता को मिलने वाली मुफ्तखोरी के लाभ पर तो सवाल उठाए जाते हैं उठाया जाना भी चाहिए लेकिन राजनीतिक तंत्र ने जो अपने लिए फ्रीबीज की व्यवस्थाएं कर ली हैं। उन पर सवाल कब उठाए जाएंगे? सरकारी नौकरियां पेंशनभोगी नहीं रह गई हैं। अब तो केवल सांसद और विधायक का पद ही पेंशनभोगी रह गया है। पब्लिक इंस्टीट्यूशंस अपनी मर्यादा खो रहे हैं और राजनीतिज्ञ सो रहे हैं। 

अब वक्त मतदाताओं के जागने का है। राजनीति के लिए आने वाला दौर कठिन हो सकता है क्योंकि जनता में जागरुकता बढ़ रही है और राजनीति की नैतिकता लगातार घट रही है। राजनीति आज शासन को चूसने की नीति तक सीमित हो गई है।