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वंश निषेध नियम.... भतीजा स्वीकार्य, बेटों से परहेज !

आशीष दुबे आशीष दुबे
Updated Tue , 20 Jul

सार

मप्र विस चुनाव 2023: चौथी टिकट सूची में झलकी भाजपा की दुविधा, राजनीतिक तकाजे उधर दिग्गजों का धैर्य..!

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विस्तार

विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की चीथी सूची में मप्र में चौंकाने वाला फैक्टर होना ही था, सो फिर है। यह बहुत बारीक कसीदाकारी की तरह 57 नामों में खामोशी से कढ़ा हुआ है। भाजपा हाइकमान ने परिवारवाद के प्रति अपनी घोषित 'वितृष्णा' को इस सूची में 'जीत की तृष्णा' की आंतरिक बेचैनी के तौर पर जाहिर किया है। उसने करीब दो महीने पहले भोपाल मध्य सीट से ध्रुवनारायण सिंह का टिकट तय किया था तो अब चौथी सूची में सिंह के भतीजे विक्रम सिंहको रामपुर बघेलान से टिकट का ऐलान कर दिया गया। भाजपा के अंदरखानों में यह सरगोशी है कि बेटों से परहेज और भतीजों से प्यार का भी कोई सबब है या संयोग या मजबूरी ?

शायद परिवारवाद पर पहले समझौते की इबारत पहली सूची में ही लिखी जा चुकी थी, इसीलिए भाजपा ने दस साल से सियासी भंवर में फंसे पूर्व विधायक चाचा ध्रुवनारायण को टिकट देकर उबारा, फिर उनके विधायक भतीजे का नाम जाहिर किया। इस फैसले के बाद पार्टी में अंदरूनी खलबली इसलिए भी है क्योंकि भाजपा में नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्र, गोपाल भार्गव, विजय शाह, कैलाश विजयवर्गीय समेत खुद शिवराज सिंह ने भी अपने बेटों को । राजनीति के रास्तों पर आने से रोका नहीं, और बीते दस वर्ष में इनके बेटों ने ही पिता के राजनीतिक क्षेत्र की देखभाल के जरिये खुद की स्वीकार्यता के जतन बड़े करीने से किए हैं। इस पूरे समयकाल में पुत्रों • के साथ पिताओं का भी 'राजनीतिक धैर्य भी काबिलेगौर रहा है। मगर इनकी हसरतों पर हाईकमान का रुख भारी रहा। अपवादस्वरूप सिर्फ कैलाश के पुत्र ही एक बार विधायक बन पाए तो पार्टी ने उन्हें सत्ता की सीढ़ियों से उतारकर संगठन में खपाया।

प्रकारांतर से भाई-भतीजावाद की मुखालफत करती रही भाजपा ने मप्र में भतीजावाद को तरजीह देने का नया संकेत दिया है। भाजपा हाइकमान ने कुछ समय से 'न्यू भाजपा' गढने के लिये मप्र में ही नये चेहरों पर दांव लगाया था, इस प्रयोग को नगरीय निकाय में ज्यादा सफलता नहीं मिली थी। हालांकि राजनीति में नई पीढ़ी के लिए रास्ते तैयार करना दूरगामी निर्णय ही है, लेकिन वंशवाद की की जड़ों को एक झटके में समाप्त करना भी उतना ही मुश्किल है, जितना नई पौध को स्थापित करना। संयोग से कांग्रेस भी इसी दुविधा से जूझ रही है, लेकिन उसने मप्र में परिवारवाद पर सीधे अंकुश की बजाए जयवर्धन सिंह, उमंग सिंघार, हनी बघेल के बाद अब ओंकार सिंह मरकाम, कमलेश्वर पटेल व विक्रांत भूरिया जैसे प्रयोग किए हैं। तो क्या भाजपा की आगामी सूची में सियासी वारिसों की गुंजाइश बन गई है?