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सियासत में पद पाने की काबिलियत और पसंद पर उठते सवाल

सार

कांग्रेस में वैसे तो संगठन केवल नाम की वस्तु है, कांग्रेस के अतीत, वर्तमान और भविष्य में नेताओं की पसंद और पट्ठेबाजी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, कांग्रेस पार्टी में बिखराव इस बारीक धारा को और मजबूत करता जा रहा है. जिस भी राज्य में चुनाव नजदीक आने लगते हैं उस राज्य के क्षत्रप अपनी पसंद और सुविधा की दृष्टि से मोहरे फिट करने लगते हैं..!

janmat

विस्तार

मध्यप्रदेश में चुनाव की आहट के साथ ही कांग्रेस संगठन में कसावट लाने के लिए नए-नए प्रयोग किए जाने लगे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने सबसे पहला प्रयोग कांग्रेस में हार की शोभा को कई मोर्चों के गले का हार बनाने के साथ किया है। बूढ़े नेता ने उम्रदराज नेता को युवा संगठनों का जिम्मा सौंप कर न मालूम संगठन में कसावट लाने का प्रयास किया है या पार्टी में सजावट और शोभायमान चेहरों को परंपरा अनुसार स्थापित करने की कोशिश की है?

सियासत में कोई भी नेता तब तक ही महत्वपूर्ण होता है, जब तक उसके साथ जनसमर्थन होता है या उसकी उम्मीद होती है। साल 2003 के बाद मध्यप्रदेश में जैसे कांग्रेस को ग्रहण सा लग गया है। तब से लेकर 2018 तक जितने चुनाव हुए, हर चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई और पराजय का ठीकरा राज्य के कांग्रेस अध्यक्षों पर डालते हुए उन्हें पदों से हटाया गया। शोभायमान चेहरों के रूप में स्थापित कांग्रेस के नेताओं को हमेशा पद और महत्व किस काबिलियत के आधार पर मिलता रहा, यह बात कांग्रेसजनों को आज तक समझ में नहीं आ सकी है। 

शायद यही कारण है कि कांग्रेस के जन समर्थन में गिरावट देखी गई है। जनादेश के संकेतों को भी दरकिनार करते हुए कांग्रेस में युवा संघर्षशील चेहरों से ज्यादा शोभायमान चेहरों को वरीयता मिलती दिखाई पड़ी है। इस बार भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। हार का रिकॉर्ड बनाने वाले ऐसे ही नेताओं को नौजवान नेताओं की क्षमता और प्रतिभा को आंकने का दायित्व देकर कांग्रेस के भविष्य को दांव पर लगाने वाले नेता न मालूम किस सफलता की संभावना पर काम कर रहे हैं?

मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार के समय जब चुनाव हुआ था, तब कांग्रेस अध्यक्ष राधाकिशन मालवीय थे। चुनाव परिणामों के बाद उन्हें बदला गया।  2008 के चुनाव के समय सुरेश पचौरी राज्य कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे। कांग्रेस की हार के बाद उन्हें भी पद से हटाया गया था। उसके बाद के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कांतिलाल भूरिया ने किया था, उनके नेतृत्व में भी कांग्रेस को राज्य में हार मिली थी और उन्हें भी अपना पद गंवाना पड़ा था। 

कांतिलाल भूरिया के बाद अरुण यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था। उन्हें चुनाव के पहले ही पद से हटा दिया गया था। यह बात आज तक समझ में नहीं आ सकी है कि पिछड़े वर्ग के एक नेता को चुनाव के पहले क्यों हटाया गया था? कमलनाथ ने जब राज्य में कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था उसके बाद पार्टी अल्पमत के साथ सरकार में जरूर आ गई थी लेकिन उसके बाद तो पार्टी ही टूट गई। 

यहाँ तक कि सरकार गंवाने के बाद राष्ट्रपति चुनाव में भी कांग्रेस के दर्ज़न भर से ज्यादा विधायकों को कमलनाथ क्रॉस वोटिंग से नहीं रोक सके थे। जयस के साथ कांग्रेस का टकराव भी इसी दौर में बढ़ा। जो नेता पार्टी को ही संभालने में सक्षम नहीं है वह जनादेश को पार्टी के पक्ष में खड़ा करने में कितना सक्षम हो सकते हैं यह बड़ा सवाल है? 

20 सालों में कांग्रेस में काफी बदलाव हुए। बहुत सारे नेता पदों पर आए और पार्टी को जिता नहीं पाने पर अपने पद से हटाए गए लेकिन पार्टी में शोभायमान नेता लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में पद दिया गया, राज्य स्तर पर पद दिया गया। विधानसभा के चुनाव लड़ने का मौका दिया गया, यहां तक कि महापौर का चुनाव लड़ने का मौका भी दिया गया। हर बार हार का मुंह देखना पड़ा। हारे हुए नेताओं को पार्टी की जीत के लिए मोर्चे पर लगाना पार्टी नेतृत्व की या तो व्यक्तिगत पसंद हो सकती है या युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की बजाय पराजित मानसिकता के नेताओं को पदों पर आगे लाकर अपने व्यक्तिगत हित साधने की कोशिश हो सकती है। 

कांग्रेस नेतृत्व क्या इस बात का जवाब दे सकता है कि लगातार महत्वपूर्ण पदों पर रहने और अनेक चुनाव लड़ने के बाद भी जनादेश द्वारा नकारे जा चुके नेताओं को पार्टी फिर से महत्व क्यों दे रही है?  शोभायमान नेता को मध्यप्रदेश कांग्रेस की ओर से हाल ही में बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई है। युवाओं के संगठनों का नेतृत्व उम्र दराज नेताओं को सौंपकर कांग्रेस क्या हासिल करना चाहती है?

कांग्रेस और मीडिया के बीच नकारात्मक वातावरण फैलाने में किसकी भूमिका थी? कांग्रेस के शोभायमान नेता पर मीडिया को बीजेपी और कांग्रेस के बीच में विभाजित करने का आरोप लगा था। 15 महीने के इस दौर में मध्यप्रदेश के मीडिया में जो विभाजन पैदा किया गया था, उसे आज भी देखा और महसूस किया जा सकता है। कांग्रेस को उसका आज भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। 

मध्यप्रदेश कांग्रेस में K-20 समूह सभी सूत्रों को नियंत्रण में किए हुए है। यह समूह सामूहिक रूप से कांग्रेस और मध्यप्रदेश के हित में विचार करता नहीं दिखाई पड़ता। कांग्रेस में राजा पटेरिया के मामले में कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बीच विचारों में ही मतभिन्नता है। नेता प्रतिपक्ष जहां राजा पटेरिया के वक्तव्य को गलती मानते हुए राजनीतिक रूप से उनके साथ खड़े दिखाई पड़ रहे हैं वहीं K-20 समूह राजा पटेरिया पर भाजपा से अधिक आक्रामक दिखाई पड़ रहा है। 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के दो ही गुट मुख्यतः सक्रिय हैं। इन दोनों के बीच में राजनीतिक गुटबाज़ी समय-समय पर दिखाई पड़ती रहती है। दिग्विजय सिंह का खेमा जहां जनाधार वाले नेताओं को प्रमुखता देता है वहीं कमलनाथ का खेमा शोभायमान और हारे हुए नेताओं को गले का हार बनाने में सिद्धहस्त दिखाई पड़ता है। 

मध्यप्रदेश में साल के भीतर विधानसभा के चुनाव होने हैं। K-20 समूह ऐसा दिवास्वप्न देख रहा है कि सत्ता विरोधी रुझान के कारण उन्हें सरकार बनाने का मौका मिल ही जाएगा। इसीलिए पार्टी में उनके समर्थक नहीं माने जाने वाले नेताओं को पहले से ही नियंत्रित करने के तरीके अपनाए जा रहे हैं। 

गूगल पर शोभा शब्द के पर्यायवाची छवि, प्रभा,कांति और सौंदर्य बताए गए हैं। कांग्रेस पार्टी को ''अपनी छवि, अपनी प्रभा, अपनी कांति और अपने सौंदर्य'' के लिए शोभायमान चेहरों से कितनी नजदीकी और कितनी दूरी रखना है, इस पर सजग रहने की जरूरत है। जरा सी भी फिसलन पार्टी के लिए अगले विधानसभा चुनाव में संकट का कारण बन सकती है।