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भारत में सर्वोच्च अदालत जिंदा हैं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 14 Apr

सार

र्वोच्च अदालत ने अपने फैसले के जरिए यह संदेश पूरे देश को दिया है। मेयर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह को ‘कदाचार’ का दोषी भी करार दिया गया है। अब उनके खिलाफ मुकदमा चलेगा और 3 से 7 साल तक की सजा भी दी जा सकती है..!!

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विस्तार

यह बात अब प्रमाणित हो गई है कि भारत में सर्वोच्च अदालत और उसके जरिए न्यायपालिका जब तक जिंदा हैं, तब तक इंसाफ जरूर मिलेगा। चंडीगढ़ नगर निगम के मेयर चुनाव पर सर्वोच्च न्यायिक पीठ ने जो न्याय किया है, वह ऐतिहासिक और क्रांतिकारी है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च अदालत ने, चुनाव जैसे मुद्दे पर, जिस विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया है, वह अभूतपूर्व है। यह ऐसा फैसला है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। 

न्यायपालिका ने लोकतंत्र और उसमें निहित जन-शक्ति को बचाकर मिसाल कायम की है। वोट की लूट नहीं मचाई जा सकती और न ही चुनाव प्रक्रिया में धांधलियां कामयाब हो सकती हैं। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले के जरिए यह संदेश पूरे देश को दिया है। मेयर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह को ‘कदाचार’ का दोषी भी करार दिया गया है। अब उनके खिलाफ मुकदमा चलेगा और 3 से 7 साल तक की सजा भी दी जा सकती है। 

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों ने पहली बार अदालत में ही किसी चुनाव के वोट जांचे और नतीजा घोषित किया। न्यायाधीशों ने कहा कि चुनावी लोकतंत्र की प्रक्रिया को धोखाधड़ी से नाकाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जहां असाधारण स्थितियां बनती हैं, वहां अदालत को दखल देना पड़ता है, ताकि बुनियादी जनादेश को संरक्षित किया जा सके। अनुच्छेद 142 के तहत अदालत का यह पहला ‘सुप्रीम फैसला’ है। इससे पहले भोपाल गैस त्रासदी कांड के पीडि़तों को राहत पहुंचाने और उन्हें मुआवजा दिलाने, राजीव गांधी के हत्यारे पेरारिवलन को जेल में 30 लंबे साल की सजा काटने के बाद रिहाई दिलाने और अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि के संदर्भ में अनुच्छेद 142 के तहत फैसले सुनाए गए थे।

बेशक चंडीगढ़ मेयर चुनाव का मुद्दा अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन इसके प्रभाव व्यापक होंगे, क्योंकि यह आम चुनाव के कुछ दिन पहले ही सामने आया है और अदालत ने 19 दिनों में हस्तक्षेप कर फैसला सुनाया है। अब चुनावी साजिशों और मंसूबों पर लगातार सवाल उठाए जाएंगे। न्यायिक पीठ ने 30 जनवरी को घोषित मेयर का चुनाव खारिज कर दिया और अवैध मतपत्रों को ‘वैध’ करार दिया और उन्हीं के आधार पर आम आदमी पार्टी (आप) एवं कांग्रेस के साझा प्रत्याशी कुलदीप कुमार को चंडीगढ़ का मेयर घोषित कर दिया। 

भाजपा के रणनीतिकार, पैरोकार दलीलें देते रहे कि चुनाव दोबारा कराया जाए। चूंकि भाजपा ने ‘आप’ के तीन पार्षदों को तोड़ कर बहुमत का जुगाड़ कर लिया था, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने उन दलीलों को खंडित कर कइयों को बेनकाब किया है। अकेला पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह इतनी बड़ी धांधली का ‘मसीहा’ नहीं हो सकता, जाहिर है कि इस साजिश में बड़ी मछलियां भी संलिप्त होंगी। अदालत के फैसले में उन्हें पर्दाफाश नहीं किया जा सका, लेकिन मसीह पर जो मुकदमा चलेगा, संभवत: उसके दौरान साजिशकार बेनकाब हों! 

अब सवाल उठता है कि आखिर भाजपा और उसके छोटे-बड़े नेता 370 सीटें जीतने के प्रति इतने विश्वस्त क्यों हैं? चिंता वाजिब है, क्योंकि आम चुनाव में देश के 90 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। केजरीवाल आज खुश और उत्तेजित हैं कि भाजपा के चंगुल से जीत छीन कर लाई भी जा सकती है। बहरहाल इस संदर्भ को राष्ट्रीय व्यापकता में आंकना उचित नहीं है, क्योंकि 10 लाख से ज्यादा ईवीएम के जरिए जनादेश दिया जाता है। बहरहाल इस गड़बड़ी के लिए चुनाव आयोग बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि यह चुनाव उसके दायरे में नहीं था। चंडीगढ़ के उपायुक्त ने मनोनीत पार्षद मसीह को निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करके शायद गलती की।