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बताइए, तरक्की के दावों की सार्थकता क्या है?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 14 Jul

सार

समाज के कमजोर वर्ग को संसाधन व आर्थिक रूप से ऐसी मदद की जानी चाहिए ताकि वे स्वावलंबी बन सकें,फिर आत्मनिर्भर बनकर देश की उत्पादकता में योगदान कर सकें। 

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विस्तार

आख़िर सरकार चाहती क्या है? कोरोना काल में तीन महीने के लिये शुरू हुई मुफ़्त राशन योजना  अब तक छह बार अवधि बढ़ाई गई है, लेकिन इस बार इसे सीधे पांच साल तक के लिये बढ़ाया गया है।क्या कहे इसे? ऐसे वक्त में जब पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हैं और देश आम चुनावों की ओर बढ़ रहा है छत्तीसगढ़ के चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि देश के 80 करोड़ लोगों को दिया जाने वाला मुफ्त राशन अगले पांच साल तक मिलता रहेगा।इस बार इसे सीधे पांच साल तक के लिये बढ़ाया गया है। निस्संदेह, जरूरतमंदों व समाज के वंचित लोगों को सरकार की ओर से संबल मिलना चाहिए ताकि भूख व कुपोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके। 

ऐसे प्रयास महज राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भी नहीं होना चाहिए। यह घोषणा तब हुई जब छत्तीसगढ़ में चुनाव के चंद दिन बाकी हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि समाज के आर्थिक दृष्टि से सक्षम लोग इस योजना का दुरुपयोग न करें। विगत में ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं जब समाज के सक्षम व आर्थिक दृष्टि से बेहतर लोग व्यवस्था की विसंगतियों का लाभ उठाकर मुफ्त राशन ले रहे थे। जाहिर है इस चुनावी वेला में इस दिशा में जांच-पड़ताल की संभावना कम ही होगी क्योंकि इस घोषणा के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की तार्किकता को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह घोषणा विपक्षी दलों की गारंटी योजना व मुफ्त की योजनाओं के मुकाबले के लिए है?

इस साल दिसंबर में पूरी हो रही योजना के अगले पांच सालों तक जारी रहने का बड़ा दबाव देश के अन्न भंडारण पर पड़ सकता है। दरअसल, यह योजना 2020 में तब शुरू हुई थी जब कोरोना संकट के चलते उत्पन्न विषम स्थितियों में एक बड़ी आबादी के सामने खाने-पीने का संकट पैदा हो गया था। लेकिन सामान्य स्थिति में इस योजना को लगातार आगे बढ़ाने की तार्किकता भी होनी चाहिए। उल्लेखनीय है योजना में हर माह पांच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल मुफ्त दी जाती है।

सहज आशंका जतायी जा रही है कि कहीं इस योजना के चलते देश में एक बड़ी आबादी में अकर्मण्यता की सोच विकसित न हो जाए। कहा जा रहा है कि हाल के दिनों में मनरेगा जैसी योजनाओं में पंजीकरण में कमी आई है। निस्संदेह, मुफ्त की प्रवृत्ति व्यक्ति की क्रियाशीलता को प्रभावित करती है। तार्किक बात तो यह है कि समाज के कमजोर वर्ग को संसाधन व आर्थिक रूप से ऐसी मदद की जानी चाहिए ताकि वे स्वावलंबी बन सकें। फिर आत्मनिर्भर बनकर देश की उत्पादकता में योगदान कर सकें। 

भारत युवाओं का देश है। इस देश की युवा शक्ति, चाहे वह वंचित समाज या कमजोर वर्ग से हो, श्रमशील बननी चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अस्सी करोड़ की आबादी एक बड़ी संख्या होती है, जो दुनिया के दर्जनों देशों की आबादी के बराबर होगी। सवाल यह भी है कि आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी यदि हमें अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देना पड़ रहा है तो तरक्की के दावों की सार्थकता क्या है?