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राजनीति का पत्ता तेंदूपत्ता, बोनस में 500 करोड़ कमी, खर्चे में 250 करोड़ की वृध्दि?

सार

2019 संग्रहण कुल 21 लाख मानक बोरा खर्च 617 करोड़(अप्रत्याशित)|  क्या राजनीती का पत्ता, तेंदुपत्ता का धंधा दम तोड़ रहा हैं|  संग्रहण का खर्चा अप्रत्याशित रूप से क्यों बढ़ रहा है? तेंदुपत्ता से जुड़े सिस्टम में क्या कोई पोल है?  आदिवासियों को बोनस में 500 करोड़ की कमी हुयी है जबकि संग्रहण खर्चे में 250 करोड़ रूपये की बेतहाशा वृद्धि हुयी है|  तेंदूपत्ता का व्यवसाय आदिवासियों के लिए जीवन यापन का बड़ा जरिया रहा है| तेंदूपत्ता तुड़ाई की मजदूरी के साथ ही, उन्हें  प्रोत्साहन पारिश्रमिक बोनस के रूप में राशि मिलती रही है|

janmat

विस्तार


आंकड़ों का चौकाने वाला हाल, अदिवासियों के कल्याण और समृद्धि के साथ उठते सवाल!

संग्रहण घटता रहा, खर्चा बढ़ता रहा? 

2017 संग्रहण 23 लाख मानक बोरा, खर्च 356 करोड़|

 

पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भोपाल में आदिवासियों को बोनस वितरण की शुरुआत की| जानकारी के अनुसार 2020-21 के लिए आदिवासियों को 67 करोड़ का बोनस वितरित किया जा रहा है| ये आंकडा बताता है कि आदिवासियों की बोनस की राशि लगातार कम होती जा रही है| 4 साल पहले 2017 में 596 करोड़ का बोनस आदिवासियों को वितरित किया गया था| 2018 में 282 करोड़,  2019-20 में 125 करोड़ करोड़ का बोनस आदिवासियों में वितरित किया गया है जबकि 2020-21 में कुल 67 करोड़ का बोनस आदिवासियों में वितरित हो रहा है| बोनस में यह कमी अलार्मिंग है|


 

  संग्रहण/तुड़वाई वर्ष 

प्रोत्साहन राशि

  2016 

208 करोड़ 

  2017

596 करोड़

  2018

282 करोड़

  2019

125 करोड़

  2020

  67 करोड़

 

इन्हीं वर्षों में तेंदूपत्ता का कुल संग्रह क्रमशः 23.35, 19.15, 21.6 एवं 15.88 लाख मानक बोरा रहा है| लघु वनोपज संघ के पोर्टल के अनुसार 1989 में जब सहकारीकरण प्रारंभ हुआ था उस समय 21.31 लाख तेंदूपत्ता संग्राहक थे| इन्हीं आंकड़ों में बताया गया है कि 2012 में 12.17 लाख संग्राहक थे| इसके बाद के वर्षों के संग्राहकों  का आंकडा पोर्टल पर नहीं दिया गया है|

यह जानकर चौंकना स्वाभाविक है कि जहां एक ओर आदिवासियों को बोनस की कुल राशि घट रही है| वहीं संग्रहण कार्य का एक्सपेंडिचर अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है| मजदूरी से ज्यादा तुड़ाई पर खर्चा किया जा रहा है| वर्ष 2017 में तेंदूपत्ता संग्राहको को मजदूरी के रूप में 292 करोड़ दिए गए थे और तुड़ाई का खर्चा लगभग 357 करोड हुआ था| इसी प्रकार 2018 में मजदूरी के रूप में 383 करोड और तुड़ाई का खर्चा 452 करोड किया गया| 2019 में मजदूरी के रूप में आदिवासियों को 526 करोड रुपए दिए गए और लघु वनोपज संघ द्वारा तुड़ाई  पर खर्चा 617 करोड रुपए  किए गए|

आंकड़े http://www.mfpfederation.org/ के अनुसार 

आदिवासियों को तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए दी जाने वाली मजदूरी और तुड़ाई के खर्चे  की तुलना करने पर पाया गया कि 2005 में लगभग एक सौ सात करोड़,  2006 में 100 करोड़ और 2007 में तुड़ाई के खर्च के लिए लगभग 137 करोड रुपए खर्च किए गए|

तुड़ाई(संग्रहण) पर खर्चे की राशि बढ़कर 617 करोड रुपए होना न केवल चौंकाता है बल्कि लघु वनोपज संघ की व्यवस्थाओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है|

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तेंदूपत्ता संग्राहक आदिवासियों के प्रति कितने संवेदनशील और प्रतिबद्ध हैं कि उन्होंने तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए पैरों में जूते चप्पल और पानी की कुप्पी देने की योजना चलाई| तेंदुपत्ता व्यवसाय में आदिवासियों को उपलब्ध कराई गयी मजदूरी और बोनस की राशि में हो रही कमी के कई कारण हो सकते हैं| या तो तेंदूपत्ता का संग्रहण सही ढंग से लघु वनोपज संघ नहीं करा रहा है| या तो तेंदूपत्ता के पेड़ों की संख्या में कमी आ गई है|

यह भी हो सकता है कि तेंदूपत्ता पेड़ों का प्रॉपर ढंग से रखरखाव नहीं हो रहा हो| तेंदूपत्ता का उपयोग मुख्यतः बीड़ी बनाने में किया जाता है| बीड़ी निर्माण का धंधा लगातार कम हो रहा है| इसलिए तेंदूपत्ता का समुचित विक्रय मूल्य नहीं मिल रहा हो| तेंदूपत्ता व्यवसाय में आ रही कमी के कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं| आदिवासियों को बोनस के रूप में जो राशि पहले मिलती थी वह अब नहीं मिल रही है|

इसके साथ ही तुड़ाई का खर्चा अप्रत्याशित ढंग से बढ़ गया है| खर्चों में यह बेतहाशा वृद्धि कई तरह के सवाल खड़े कर रही है| तेंदुपत्ता संग्रहण, भंडारण और व्यापार से जुड़े सिस्टम में निश्चित ही कुछ ना कुछ कमी है| जिससे कि खर्चा तो बढ़ रहा है लेकिन तुलनात्मक रूप से मजदूरी और बोनस घट रहा है|

आदिवासियों को रिझाने के लिए सभी राजनीतिक दलों द्वारा तेंदूपत्ता का उपयोग किया जाता रहा है| तेंदूपत्ता के सहकारीकरण की शुरुआत ही राजनीति से हुई थी| तब से लेकर आज तक राजनीति का यह पत्ता बिचौलियों को जहां व्यवसाय से बाहर किए हुए है| वहीं प्रदेश के जनजातियों की  आय का एक महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है| तेंदूपत्ता का व्यवसाय क्या दम तोड़ रहा है? क्या भविष्य में यह व्यवसाय आदिवासियों के लिए उतना उपयोगी नहीं होगा? जितना अब तक रहा है| 

मजदूरी और बोनस की ऐसी स्थिति तब है जब संग्रहण की दर दो हजार प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर 2019 में ढाई हजार प्रति मानक बोरा कर दी गई और अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस दर को बढ़ाकर ₹3000 प्रति मानक बोरा करने का ऐलान किया है|                                                                        

तेंदूपत्ता मध्यप्रदेश में शुरू से ही राजनीति का “पत्ता” बना हुआ है| तेंदूपत्ता के राष्ट्रीयकरण की शुरुआत भी राजनीति के कारण ही हुई थी| तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जब खरसिया से चुनाव लड़ा था तब तेंदूपत्ता किंग लखीराम अग्रवाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे| उन्हें राजनीतिक रूप से झटका देने के लिए अर्जुन सिंह ने तेंदूपत्ता नीति का सहकारीकरण किया था| वर्ष 1988 में लघु वनोपज के संग्रहण, भंडारण एवं व्यापार से बिचौलियों को पूरी तरह समाप्त करने के लिए वास्तविक संग्रहकर्ताओं की त्रिस्तरीय सहकारी संस्थाओं का गठन किया गया| प्राथमिक स्तर पर वास्तविक संग्राहकों की सदस्यता से 1072 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियां, जिला स्तर पर 60 जिला वनोपज सहकारी संघ, शीर्ष स्तर पर मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज, व्यापार एवं विकास सहकारी संघ कार्यरत है|  

तेंदूपत्ता व्यवसाय में आ रही इस कमी को देखते हुए सरकार को इस व्यवस्था से जुडी सारी प्रक्रियाओं को एक बार फिर समीक्षा करने की आवश्यकता है, ताकि जनजातियों का सबसे बड़ा सहारा, उनके लिए भविष्य में भी सम्बल बनी रहे|