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सबसे बड़ा बोझ, आंतरिक असंतोष

सार

एमपी की राजनीति में आशीर्वाद के हकदार और जनाक्रोश के पैरोकार के रथ राज्य को रौंद रहे हैं. आशीर्वाद के आकांक्षियों को सत्ता का आशीर्वाद मिलेगा या रथ पर सवार आक्रोश सत्ता के शिखर पर पहुंचेगा, इस पर चर्चाओं का बाजार गर्म है. राजनीति के बाजार में जनता अभी मौन है..!

janmat

विस्तार

खानाबदोश राजनेताओं के एक दल से दूसरे दल में जाने की दौड़ में कांग्रेस आगे दिखाई पड़ रही है. भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में आंतरिक असंतोष के बोझ का आकलन और तुलना का तराजू बीजेपी के पक्ष में झुका दिखाई पड़ रहा है. बीजेपी से ज्यादा नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं. प्रत्याशियों के चयन की प्रसव पीड़ा से दोनों दल गुजर रहे हैं. बीजेपी 39 विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियों की घोषणा करके इस मामले में कांग्रेस से आगे निकल गई है.

मध्यप्रदेश में राजनीतिक हालात यही इशारा कर रहे हैं कि दोनों दलों के बीच कड़ी टक्कर है. बीजेपी के लिए यह प्रसन्नता की बात हो सकती है कि 20 साल की सरकार के बाद भी चुनाव में सत्ता विरोधी रुझान ऐसा नहीं है कि उसके प्रतिद्वंदी को चुनाव में बढ़त की स्पष्टता महसूस की जा सके. दोनों दलों की चुनावी संभावनाओं पर पार्टी के नेताओं और कैडर में आंतरिक असंतोष के असर पड़ने की ज्यादा संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं. जो पार्टी अपने आंतरिक असंतोष को नियंत्रित करने में तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावी और सफल रहेगी उसकी चुनावी संभावनाएं ज्यादा उज्जवल हो सकती हैं.

कांग्रेस का जहां तक सवाल है, उसने तो आंतरिक आक्रोश के कारण ही अपनी सरकार गवाई है. सरकार जाने के बाद पार्टी नेताओं और कैडर में आक्रोश को दूर करने के लिए कोई प्रयास किए गए हैं ऐसा तो दिखाई नहीं पड़ता है. एमपी कांग्रेस का नेतृत्व करने वाले कमलनाथ की कार्यशैली से विधायकों में आक्रोश  पनपा था और सरकार का पतन हो गया था. कांग्रेस द्वारा सरकार के पतन के पीछे हुई गलतियों पर ना तो चिंतन किया गया है और ना ही उन्हें दूर करने के लिए कोई प्रयास किया गया है. जिस आक्रोश के कारण पार्टी का विभाजन हुआ उसके लिए जिम्मेदार कारणों को दूर किए बिना सत्ता  की कुर्सी हासिल करने के सपने देखना जनादेश के साथ न्याय तो नहीं कहा जाएगा. 

जब पहले जनादेश दिया गया था तो फिर पार्टी को सरकार से क्यों हटना पड़ा? जो विधायक टूटे उनके लिए कौन जिम्मेदार है? जो कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं उनको दूर करने के लिए क्या प्रयास किया गया? गलतियों पर जनता से क्षमा याचना क्यों नहीं की गई?

जनता के सामने कांग्रेस के लिए भ्रम की स्थिति है कि जब उनके जनादेश के मान की रक्षा पार्टी पहले नहीं कर सकी थी तो फिर उन्हीं कंधों पर जनादेश का विश्वास कैसे किया जा सकता है? कांग्रेस को स्पष्टता के साथ जनता को बताना चाहिए कि पार्टी में विभाजन के लिए क्या परिस्थितियां जिम्मेदार थीं? और भविष्य में अब ऐसा नहीं होगा, कांग्रेस के बड़े नेता इस सवाल पर चुप्पी साधे हुए हैं. एक और सवाल पैदा हो रहा है कि जब बीजेपी में शामिल कांग्रेस के नेताओं के कारण बीजेपी में शिवराज भाजपा, नाराज भाजपा और महाराज भाजपा का आरोप लगाया जाता है तो फिर उसी तरह  बीजेपी नेताओं को पार्टी में शामिल करने की गलती के बाद क्या कांग्रेस ऐसे आरोपों से बच सकेगी? क्या कांग्रेस में भाजपा के आयातित नेताओं से नाराजगी नहीं बढ़ रही होगी?

कांग्रेस को सेक्युलर और सॉफ्ट हिंदुत्व के स्टैंड पर भी मुस्लिम विचारकों के आक्रोश पर पक्ष रखने की जरूरत है. पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी बार-बार इस पर सवाल उठा रहे हैं. छिंदवाड़ा में हिंदू कथावाचकों के आयोजन को कमलनाथ हिंदुत्व के प्रति निष्ठा के रूप में बता रहे हैं तो कांग्रेस के अंदर धर्मनिरपेक्ष विचारक इस पर आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं. केवल जनाक्रोश को उभारने से सारी समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा. पार्टी नेताओं की वैचारिक अस्थिरता के प्रदर्शन के कारण जो आक्रोश पनपा है उसको पार्टी कैसे संतुलित करेगी?

प्रत्याशियों का चयन दोनों दलों के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा. इसका सबसे बड़ा कारण है कि राजनीति सत्ता और पैसे से जुड़ गई है. हर विधानसभा क्षेत्र में दोनों दलों में धनाढ्य प्रत्याशियों की कमी नहीं है. प्रतिस्पर्धा के लिए हर विधानसभा क्षेत्र में तीन से पांच प्रत्याशी निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव के टिकट की आकांक्षा लगाए हुए हैं. बीजेपी ने हारी हुई सीटों पर 39 प्रत्याशी घोषित किए तो इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि विधानसभा क्षेत्रों में कई प्रत्याशियों का खुलेआम विरोध सामने आएगा.

संगठन बीजेपी की ताकत मानी जाती रही है. असंतोष की आवाजें जिस तरह से खुलेआम सामने आ रही है उससे यही कहा जा सकता है कि संगठन की पकड़ कहीं ना कहीं ढीली हुई है. चने खा कर पार्टी की सेवा करने वाले नेताओं की विरासत अब न भाजपा में बची है और ना ही कांग्रेस में. अब तो राजनीति में थोड़ा सा भी रसूख रखने वाले नेता पावर और पैसे से मालामाल होने में देर नहीं लगाते. नेताओं के बीच में आपसी टकराहट और सेबोटेज की संभावनाएं दोनों दलों को परेशान कर रही हैं.

एमपी में चुनावी मुद्दे धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं. बीजेपी सरकार ने तिजोरी से भलाई की योजनाओं का ऐसा नजारा पेश किया है कि कांग्रेस के चुनावी वादों की चमक कमजोर पड़ गई है. “भला से लाभ” की आशा पर सरकार ने जनता के लिए खजाना खोल दिया है. शिवराज सिंह चौहान ने ऐसा कोई क्षेत्र नहीं छोड़ा है जिसके भले के लिए योजनाएं घोषित ना की गई हों. पत्रकार बचे थे तो उनके लिए भी सहूलियतों की झड़ी लगा दी है. 

महिलाएं एमपी में आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी. इसमें भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच में कड़ी टक्कर दिखाई पड़ रही है. बीजेपी सरकार की लाडली बहना योजना गेमचेंजर साबित हो सकती है.

राजनीतिक दलों को यह गारंटी देने की जरूरत है कि जिस विधायक को जनादेश मिलेगा वह उसी पार्टी में रहकर जनसेवा करेगा. इस मामले में कांग्रेस का रिकॉर्ड और मॉडल तो ज्यादा खराब है. इसलिए इस बात की क्या गारंटी है कि जनादेश के बाद भी फिर से बगावत के अंकुर नहीं फूट सकते हैं.

सरकार विरोधी रुझान की भी एमपी में चर्चा आम है. सरकार में लंबे समय के कारण ऐसी बातों को शायद ज्यादा हवा मिलती है लेकिन कामकाज की दृष्टि से एंटी इनकंबेंसी पर संतुलन बनाने में बीजेपी कामयाब हो सकती है. एमपी का सियासी समीकरण दोनों पार्टियों के आंतरिक संघर्ष और सेबोटेज पर निर्भर करेगा। तीसरे दल के रूप में जो भी सक्रियता राज्य में बढ़ेगी उसका नुकसान कांग्रेस को ही उठाना पड़ सकता है.