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भारत के कारोबार में बड़े घरानों का दबदबा 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 19 Jun

सार

देश का कारोबार चुनिंदा बड़े घरानों के हाथों में सिमटता जा रहा है। मुकेश अंबानी, कुमार मंगलम बिड़ला और टाटा समेत विभिन्न कारोबारी घरानों द्वारा एक ही राज्य (उत्तर प्रदेश) में 3.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।

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विस्तार

-राकेश दुबे 

देश का कारोबार चुनिंदा बड़े घरानों के हाथों में सिमटता जा रहा है। मुकेश अंबानी, कुमार मंगलम बिड़ला और टाटा समेत विभिन्न कारोबारी घरानों द्वारा एक ही राज्य (उत्तर प्रदेश) में 3.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।

ऐसी घोषणाओं से यह लगता है कि आखिर भारत के बड़े कारोबारी घरानों का कितना दबदबा है? यह प्रश्न आम तौर पर पूछा जाने लगा है क्या देश की महत्त्वाकांक्षाएं इन कारोबारी समूहों की सफलताओं पर निर्भर हैं? इसी कड़ी में टाटा के स्वामित्व वाली एयर इंडिया की 470 यात्री विमानों की खरीद के ऑर्डर देने तथा 370 अन्य विमानों की खरीद का विकल्प रखने की घोषणा की है। यह 840 विमानों का संयुक्त आंकड़ा विमानन कंपनियों के 700 विमानों के मौजूदा बेड़े से भी अधिक है।

एक आंकड़े के मुताबिक गौतम अदाणी की कंपनियां देश के कुछ सबसे बड़े बंदरगाहों का संचालन करती हैं, जो देश के 30 प्रतिशत अनाज का भंडारण करती हैं, देश के कुल बिजली पारेषण के पांचवें हिस्से को संभालती हैं, देश के कुल वाणिज्यिक हवाई यातायात के चौथाई हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं और देश के कुल सीमेंट का पांचवां हिस्सा उत्पादित करती हैं। सिंगापुर की एक कंपनी के साथ उसके संयुक्त उपक्रम को देश की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी माना जाता है। इस सूची में सोलर पैनल, बिजली उत्पादन, हरित हाइड्रोजन, राजमार्ग, तांबा, कोयला खदानें, पेट्रोकेमिकल्स, डेटा सेंटर और क्लाउड सेवाएं शामिल नहीं हैं।

इसी समूह के सीएफओ ने कुछ महीने पहले कुल 120-140 अरब डॉलर (9.6 से 11.2 लाख करोड़ रुपये) मूल्य की परियोजनाओं का उल्लेख किया था। समूह का लक्ष्य एक लाख करोड़ डॉलर का मूल्यांकन हासिल करने का था जिसके बारे में सीएफओ ने कहा कि ऐप्पल और सऊदी अरामको जैसी चुनिंदा कंपनियां ही यह लक्ष्य हासिल कर सकी हैं। यह पूरा वाकया हिंडनबर्ग खुलासों के पहले का है। वर्ष 2022 में समूह का शुद्ध मुनाफा 2.9 अरब डॉलर (0.23 लाख करोड़ रुपये) रहा।

इनमें अधिक मुनाफा कमाने वाले टाटा समूह के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने हाल ही में अगले पांच वर्षों में 90 अरब डॉलर (7.2 लाख करोड़ रुपये) की निवेश योजनाओं का जिक्र किया। अदाणी और मुकेश अंबानी की विभिन्न घोषणाओं से तुलना की जाए तो यह राशि काफी कम नजर आती है। दोनों ने मिलकर 10 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने की घोषणाएं की हैं।

अंबानी की महत्त्वाकांक्षा देश की नवीकरणीय ऊर्जा में पांचवें हिस्से का उत्पादन करने की है। इसके लिए रिलायंस ने गुजरात में 4,50,000 एकड़ जमीन चाही है। यह पूरा इलाका दिल्ली राज्य के भूभाग से भी अधिक है। धातु, ऑप्टिकल फाइबर और ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाले अनिल अग्रवाल की वेदांत के समूह का मुनाफा अदाणी से अधिक है, फिर भी उनकी योजना चार या पांच वर्ष में समूह का आकार 30 अरब डॉलर से बढ़ाकर 75 अरब डॉलर तक ले जाने की है। इस दौरान कंपनी की योजना 20 अरब डॉलर का निवेश करने की है। वेदांत तेल एवं गैस उत्पादक कंपनी के रूप में सरकारी उपक्रम ओएनजीसी की बराबरी करने की उम्मीद कर रही है।

वेदांता की योजना इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले यूनिट तथा सेमीकंडक्टर संयंत्र लगाने की भी है जिसके लिए उसने फॉक्सकॉन के साथ साझेदारी की है। इसके बाद आदित्य बिड़ला समूह जैसी अन्य कंपनियां हैं जो सीमेंट, धातु, टेक्सटाइल्स, उर्वरक, टायर आदि क्षेत्रों में तगड़ा दखल रखती है। उनके मुनाफे भी अदाणी से अधिक हैं लेकिन वह बड़ी घोषणाएं करने में सतर्कता बरतती है।

22 अरब डॉलर का सज्जन जिंदल का जेएसडब्ल्यू समूह इस्पात, ऊर्जा, सीमेंट, बुनियादी ढांचा, पेंट और वेंचर कैपिटल क्षेत्र में है तथा वह भी एक बड़ा निवेशक है। माना जा रहा है कि समूह अपनी सीमेंट क्षमता को तीन गुना करेगा और बंदरगाहों और टर्मिनल की क्षमता में छह गुना इजाफा करेगा।

आँकड़ों के रूप में देखें तो तीन बड़ी कंपनियों द्वारा 30 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा, जो देश के कुल जीडीपी के दसवें हिस्से के बराबर है और इसे चार से 10 वर्षों में अंजाम देना है। देश की 3,250 सूचीबद्ध, गैर वित्तीय कंपनियों के शुद्ध मुनाफे में से 20 प्रतिशत इन्हीं कंपनियों का था। तीन बड़े समूह 10 प्रतिशत अतिरिक्त हिस्सेदारी रखते हैं। 

इन छह कंपनियों को मिलाकर देखें तो नए निजी निवेश में से एक तिहाई इनका ही होने वाला है। जरूरी नहीं कि योजना का सारा निवेश फलीभूत हो। पुराने अनुभवों की बात करे तो अति महत्त्वाकांक्षी कारोबारियों मसलन: अनिल अंबानी, एस्सार के रुइया बंधु, आंध्र प्रदेश की जीएमआर, जीवीके और लैंको आदि कंपनियों ने मनमोहन सिंह के दौर में ऋण आधारित वृद्धि का सहारा लिया जिसका नतीजा बुरा हुआ।मौजूदा दौर में अदाणी का मामला अतिमहत्त्वाकांक्षा का नजर आ रहा है। बड़े निवेश एक जगह इसलिए केंद्रित हो रहे हैं कि उनकी प्रकृति ही गहन पूंजी की है।

इसके बावजूद विविध कारोबारों वाले समूहों का उदय पुराने दौर के केंद्रित, एकल कारोबारों से उलट है जो दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि और वाहन आदि क्षेत्रों में काम करते थे। समूह की शक्ति प्रतिद्वंद्वियों को निचोड़ लेने या उन्हें खरीद लेने में मदद कर सकती है।दक्षिण कोरिया, जापान और रूस के अनुभव ने दिखाया है कि कारोबारी समूह का मॉडल अक्सर राजनीतिक संपर्कों के साथ आता है। परंतु ऐसी तुलनाएं अनावश्यक हो सकती हैं। छह बड़े समूहों का राजस्व देश के जीडीपी के 11 प्रतिशत के बराबर है।