पवित्र भूमि उज्जैन के महाकाल वन में स्थित श्री मुक्तेश्वर महादेव, चौरासी महादेवों में एक ऐसे दिव्य स्वरूप हैं, जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधनों से परे जाने का मार्ग दिखाते हैं..!!
उज्जैन- प्राचीन उज्जयिनी- केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का वह दर्पण है जिसमें मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को देख सकता है। इसी पवित्र भूमि के महाकाल वन में स्थित श्री मुक्तेश्वर महादेव, चौरासी महादेवों में एक ऐसे दिव्य स्वरूप हैं, जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधनों से परे जाने का मार्ग दिखाते हैं।
शिवपुराण में वर्णित मुक्तेश्वर की कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन के गहनतम सत्य का उद्घाटन है- कि मुक्ति वर्षों की तपस्या से नहीं, बल्कि एक क्षण के सच्चे समर्पण से भी संभव है।
प्राचीन काल में ‘मुक्ति’ नामक एक ब्राह्मण ने मोक्ष प्राप्ति के लिए तेरह वर्षों तक कठोर तपस्या की। एक दिन क्षिप्रा के तट पर जप करते समय एक हत्यारा उसे मारने आया, किंतु ब्राह्मण के तपोबल से उसकी चेतना परिवर्तित हो गई। उसने शस्त्र त्याग दिए और उसी क्षण ईश्वर में लीन होकर मुक्त हो गया।
यह दृश्य ब्राह्मण के भीतर प्रश्न बनकर उठ खड़ा हुआ- जब वर्षों की साधना से मुक्ति नहीं मिली, तो इस व्यक्ति को एक क्षण में कैसे मिल गई?
उत्तर उन्हें तब मिला जब एक बाघ, ‘नमो नारायण’ के उच्चारण से मानव रूप में परिवर्तित हुआ। वह पूर्वजन्म का राजा दीर्घबाहु था, जो अपने ज्ञान के अहंकार के कारण पतित हुआ था। उसने ब्राह्मण को मुक्तिलिंग- मुक्तेश्वर महादेव के दर्शन का मार्ग बताया। अंततः दोनों ने उस दिव्य लिंग के दर्शन किए और उसी में लीन होकर मुक्ति प्राप्त की।
जीवन के तीन शाश्वत सत्य अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन
राजा दीर्घबाहु के पास ज्ञान, शक्ति और वैभव था, किंतु अहंकार ने उसे पशु योनि में पहुँचा दिया। आज का युवा भी जब अपनी उपलब्धियों को ही अपनी पहचान बना लेता है, तब वह उसी मार्ग पर अग्रसर होता है।ज्ञान विनम्रता देता है, अभिमान नहीं। दूसरा परिवर्तन का समय ‘अभी’ है,हत्यारे ने न कोई दीर्घ साधना की, न कोई योजना बनाई- उसने केवल एक क्षण में स्वयं को बदल लिया। यही संदेश आज के युवा के लिए है, जो परिवर्तन को भविष्य पर टालता रहता है।
मुक्ति का द्वार वर्तमान क्षण में ही खुलता है। तीसरा दूसरों को मार्ग दिखाना ही आत्ममुक्ति है।
राजा दीर्घबाहु ने ब्राह्मण को मुक्तिलिंग का मार्ग बताया और स्वयं भी मुक्त हो गया। सनातन दर्शन का यह मूल सिद्धांत है कि जो दूसरों को ऊपर उठाता है, वही वास्तव में स्वयं ऊपर उठता है।इसी सत्य की प्रतिध्वनि हमें भगवान गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कथा में भी सुनाई देती है।
अंगुलिमाल- एक भयावह हत्यारा- जब बुद्ध के सामने पहुँचा, तो एक वाक्य ने उसके जीवन को बदल दिया: “मैं रुक चुका हूँ, तू कब रुकेगा?”
यह वाक्य केवल शब्द नहीं था, बल्कि अहंकार पर प्रहार था। उसी क्षण अंगुलिमाल ने शस्त्र त्याग दिए और एक साधक बन गया।
दोनों कथाएँ—मुक्तेश्वर महादेव और बुद्ध—एक ही सत्य को उद्घाटित करती हैं।परिवर्तन समय नहीं, निर्णय माँगता है।मुक्ति साधना नहीं, समर्पण माँगती है।
आज का समाज सफलता को डिग्री, पद और संपत्ति से मापता है। आई आई टी,सिविल सेवा या प्रबंधन संस्थानों से प्राप्त उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण अवश्य हैं, परंतु यदि वे अहंकार को जन्म दें, तो वही पतन का कारण बन जाती हैं।
मुक्तेश्वर महादेव का संदेश स्पष्ट है—ईश्वर को आपकी उपाधियाँ नहीं, आपका विनम्र हृदय चाहिए।मुक्तेश्वर महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक चेतना हैं,जो अहंकार को त्यागने का आह्वान करती है।
क्षिप्रा आज भी बह रही है, महाकाल वन आज भी उतना ही पवित्र है, और मुक्तेश्वर महादेव आज भी उसी दिव्यता से विराजमान हैं।
बस प्रतीक्षा है,उस एक क्षण की,जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर कहे—“अब मैं झुकता हूँ, अब मैं समर्पित हूँ।”
तभी मुक्ति का द्वार खुलता है।
हर हर महादेव।
बुद्धं शरणं गच्छामि।
क्रमशः अगली किश्त