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“भय” से निबटने के एक वैश्विक दर्शन की जरूरत 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 23 May

सार

प्रयास दिखावटी नहीं होना चाहिए , जैसे वर्ष २०२० में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सभी मुस्लिम देशों को पत्र लिखा था और उसके बाद ही वर्ष २०२१ में पाकिस्तान की पहल पर इस्लामोफोबिया विरोधी दिवस १५ मार्च को मनाया गया था।

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विस्तार

कितनी विचित्र बात है एक ओर वैश्विक स्तर पर धार्मिक कट्टरता और भय के खिलाफ अभियान चलाने और एक विशेष दिवस मनाने के निर्णय हो रहे हैं |वही बंगलादेश और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जो कुछ घटा वो विश्व की भावना के विपरीत है | भोपाल में एक युवक से जबरन नारे लगवाने और बंगला देश में एक धार्मिक स्थल पर हमले और तोड़फोड़ की खबर है, मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम जिले में एक धार्मिक स्थल का रंग बदलने का विवाद चर्चा में रहा |प्रश्न यह है कि ऐसी मानसिकता क्यों बन रही है? और जो प्रयास हो रहे हैं उनमें कहाँ कोई कमी है ?विचार का विषय है|

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए १५ मार्च को अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया , तो इस पर न केवल बहस तेज हो गई है, बल्कि अन्य धर्मों की भी चर्चा प्रारम्भ की गई । जबकि १९३ सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह प्रस्ताव इस्लामिक सहयोग संगठन ने ही पेश किया था। इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य रूप से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, इंडोनेशिया, ईरान, इराक, कुवैत जैसे देशों का सर्वाधिक सहयोग है। सबसे बड़ी बात कि जिस देश में सहज धार्मिक आजादी नहीं है, ऐसे देश चीन ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। भारत और फ्रांस जैसे चंद देश हैं, जो इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे। भारतीय प्रतिनिधि ने देश के स्थाई विचार के अनुरूप महासभा में खुलकर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि किसी भी धर्म विशेष के लिए ऐसा विशेष दिन नहीं होना चाहिए। 

भारत के स्थायी प्रतिनिधि टी एस तिरुमूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि भारत समझता है, पारित प्रस्ताव कोई मिसाल कायम नहीं करता है। इसका नतीजा यह होगा कि कई अन्य धर्मों से संबंधित फोबिया के प्रस्ताव भी संयुक्त राष्ट्र में आएंगे और संयुक्त राष्ट्र धार्मिक खेमों में बंट जाएगा। भारत ने उचित ही यह भी याद दिलाया कि २०१९ में ही यह तय हो चुका था कि धार्मिक हिंसा के शिकार लोगों के साथ सहानुभूति जताने के लिए हर साल २२ अगस्त को अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाएगा।वैसे तो, 2019 के फैसले के बाद किसी धर्म विशेष के संरक्षण के लिए दिवस घोषित करने की जरूरत नहीं थी। काम सबसे निचले बिंदु पर करने की जरूरत है, जो विश्व में फैल रही उन्मादी मानसिकता पर रोक लगाये | 

सरे विश्व को संयुक्त राष्ट्र से मिलकर धर्म संबंधी घृणा का समग्रता में उपचार करना चाहिए। अभी दुनिया में पचास से अधिक विशेष धर्म आधारित देश हैं, इनमें से ज्यादातर देशों में दूसरे धर्मों का विरोध सामान्य रूप से देखा जाता है। आज दुनिया में जहां इस्लाम के प्रति नफरत बड़ा खतरा है, वहीं गैर-इस्लामी पंथों के प्रति घृणा को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इस फैसले या विचार को समता भाव के साथ न्यायपूर्ण नजरिये से देखना चाहिए। इस तरह की प्रवृत्ति को रोका जाता है, तो इससे भी दुनिया में शांति व सद्भाव को बल मिलेगा। 

प्रयास दिखावटी नहीं होना चाहिए , जैसे वर्ष २०२० में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सभी मुस्लिम देशों को पत्र लिखा था और उसके बाद ही वर्ष २०२१ में पाकिस्तान की पहल पर इस्लामोफोबिया विरोधी दिवस १५ मार्च को मनाया गया था। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है, और तो और, इसी महीने पाकिस्तान में पुलिस ने हाफिजाबाद शहर में अहमदिया मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित ४५ कब्रों को नष्ट किया है। पाकिस्तानी संविधान आधिकारिक तौर पर इस्लाम के अहमदिया संप्रदाय को काफिर मानता है। दूसरे समाजों, संप्रदायों के प्रति द्वेष का भाव जब वहां संविधान में है, तो इस्लामोफोबिया के प्रति शिकायत कितनी जायज है? 

पाकिस्तान को अपने यहां सद्भाव की कोई चिंता नहीं है, पर कथित रूप से गैर-मुस्लिम देशों में बढ़ते इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने के लिए वह कार्य करना चाहता है। दुनिया को सांप्रदायिकता के मामले में ज्यादा ईमानदार होना चाहिए। अगर कोई देश धर्म के आधार पर किसी भी तरह की प्राथमिकता का इजहार कर रहा है या दूसरे धर्म के लोगों के प्रति भेदभाव बरत रहा है, तो उसे ईमानदारी से इंसानियत के दायरे में सोच लेना चाहिए। इस काल में रोज महात्मा गाँधी और उनका दर्शन याद आता है | यही दर्शन विश्व को दिशा दे सकता है |