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गरीबी-घटने-का-चित्र-और-बढती-जनसँख्या-की-चुनौती

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 19 May

सार

 विश्व और भारत में बहुआयामी गरीबी के घटने से संबंधित दो रिपोर्टें मेरे सामने से गुजरी..!

janmat

विस्तार

बीती 19  जुलाई के बाद के बाद आज “प्रतिदिन विचार” फिर प्रस्तुत है | मेरे ये दिन बीमारी के कारण अस्पताल और अब घर में बीत रहे हैं,परन्तु  इन दिनों पढने का आनन्द भी है |  विश्व और भारत में बहुआयामी गरीबी के घटने से संबंधित दो रिपोर्टें मेरे सामने से गुजरी । पहली- नीति आयोग द्वारा 17 जुलाई को जारी की गई राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) प्रगति समीक्षा रिपोर्ट 2023 और दूसरी - 11 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओपीएचआई) के द्वारा वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) की रिपोर्ट 2023। ये भारत की खुबसूरत तस्वीर तो प्रस्तुत करती है , परन्तु  बढती जनसँख्या के परिमाण में बड़ी  चुनौती भी  प्रस्तुत करती है |

अभी तो  दोनों रिपोर्टें भारत में बहुआयामी गरीबी घटने का सुकूनदेह परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए दिखाई दे रही हैं, परन्तु अप्रैल 2023 में भारत 142.86 करोड़ लोगों की आबादी के साथ चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बना गया है, अतएव देश की नई आबादी के लिए रोजगार के नए अवसरों का निर्माण करना जरूरी होगा। रोजगार के ऐसे नए अवसर गरीबी नियंत्रण में सहायक होंगे। निश्चित रूप से देश में बहुआयामी गरीबी अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। देश में करीब 23 करोड़ लोग अभी भी गरीब हैं।

राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में बहुआयामी गरीब लोगों की हिस्सेदारी वर्ष 2015-16 के 24.85 फीसदी से घटकर वर्ष 2019-21 में 14.96 फीसदी हो गई है। यह सूचकांक आय गरीबी के आकलन की पूरक है। यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में सुधार को बताता है, जो इसके सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के अनुरूप है। इसके तहत पोषण, बाल एवं किशोर मृत्युदर, खाना बनाने में उपयोग होने वाले ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, मांओं के स्वास्थ्य, स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति जैसे आधारभूत संकेतक शामिल हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत एसडीजी लक्ष्य 1.2 प्राप्त करने की राह पर निकल गया, जिससे वर्ष 2030 के लिए तय की गई मियाद से बहुत पहले बहुआयामी गरीबी को कम से कम आधा करने में मदद मिलेगी। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहुआयामी गरीबों के अनुपात में सबसे अधिक कमी उत्तरप्रदेश में देखी गई, जहां 3.43 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं ।

इसके बाद बिहार में 2.25 करोड़, मध्यप्रदेश में 1.35 करोड़, राजस्थान में 1.08 करोड़ और पश्चिम बंगाल में 92.6 लाख लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। उल्लेखनीय है कि यूएनडीपी की रिपोर्ट 2023 में कहा गया कि भारत में पिछले 15 वर्षों में गरीबी में उल्लेखनीय रूप से कमी आई है। भारत में 2005-2006 से 2019-2021 के दौरान कुल 41.5 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। 2005-2006 में जहां गरीबों की आबादी 55.1 प्रतिशत थी वह 2019-2021 में घटकर 16.4 प्रतिशत हो गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2005-2006 में भारत में लगभग 64.5 करोड़ लोग गरीबी की सूची में शामिल थे, यह संख्या 2015-2016 में घटकर लगभग 37 करोड़ और 2019-2021 में कम होकर 23 करोड़ हो गई। खास बात यह है कि भारत में सभी संकेतकों के अनुसार गरीबी में गिरावट आई है। सबसे गरीब राज्यों और समूहों, जिनमें बच्चे और वंचित जाति समूह के लोग शामिल हैं, ने सबसे तेजी से प्रगति हासिल की है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में पोषण संकेतक के तहत बहुआयामी रूप से गरीब और वंचित लोग 2005-2006 में 44.3 प्रतिशत थे जो 2019-2021 में कम होकर 11.8 प्रतिशत हो गए। इस दौरान और बाल मृत्यु दर 4.5 प्रतिशत से घटकर 1.5 प्रतिशत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार जो खाना पकाने के ईंधन से वंचित गरीबों की संख्या भारत में 52.9 प्रतिशत से गिरकर 13.9 प्रतिशत हो गई है।

वहीं स्वच्छता से वंचित लोग जहां 2005-2006 में 50.4 प्रतिशत थे उनकी संख्या 2019-2021 में कम होकर 11.3 प्रतिशत रह गई है। पेयजल के पैमाने की बात करें तो उक्त अवधि के दौरान बहुआयामी रूप से गरीब और वंचित लोगों का प्रतिशत 16.4 से घटकर 2.7 हो गया। बिना बिजली के रह रहे लोगों की संख्या 29 प्रतिशत से 2.1 प्रतिशत और बिना आवास के गरीबों की संख्या 44.9 प्रतिशत से गिरकर 13.6 प्रतिशत रह गई है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत सहित 25 देशों ने भी अपने यहां गरीबों की संख्या में कमी की है। रिपोर्ट के अनुसार भारत उन 19 देशों की लिस्ट में शामिल है जिन्होंने 2005-2006 से 2015-2016 की अवधि के दौरान अपने वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) मूल्य को आधा करने में सफलता हासिल की। देश में  23 करोड़ लोग अभी भी गरीब हैं, जन संख्या की जो चुनौती सामने है, इस चित्र को और गहरे रंगों से रंगना होगा |