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ईवीएम प्रलाप से पहले यह बात 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sun , 23 May

सार

दल चुनावी दौड़ में शामिल हैं, उनके सांसद और विधायक चुने जाने हैं, लेकिन वे ईवीएम पर अब भी उनका संदेह बरकरार हैं..!!

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विस्तार

    और देश के 17 राज्यों और 7 संघशासित क्षेत्रों की 102 लोकसभा सीटों पर प्रथम चरण का मतदान हो चुका है। जनादेश का एक हिस्सा उन ईवीएम में ही दर्ज हो चुका है, जिस  पर अधिकतर विपक्षी दल प्रलाप कर रहे हैं। वे दल चुनावी दौड़ में शामिल हैं, उनके सांसद और विधायक चुने जाने हैं, लेकिन वे ईवीएम पर अब भी उनका संदेह बरकरार हैं। 

    कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने यहां तक दावा किया है कि यदि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं की गई है, तो भाजपा को 180 से कम सीटें मिलेंगी। मतलब  विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ मुगालते में है कि ईवीएम के जरिए ही जो मतदान होगा, उससे जनादेश उन्हें ही मिलने वाला है। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और पंजाब आदि राज्यों में गैर-भाजपा दलों की आज भी सरकारें हैं, जो ईवीएम के जरिए ही बनी हैं। चुनावी पराजय से पूर्व राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी 2018 में कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई थी। तब भी मतदान ईवीएम के जरिए ही हुआ था। 

    एक बार फिर यह मामला सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है। दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा है। दरअसल सवाल यह है कि विपक्ष इतना दोगला क्यों है? संवैधानिक व्यवस्थाओं के ही खिलाफ क्यों है? ईवीएम का इस्तेमाल छोड़ कर मतपत्रों वाले मतदान के पाषाणकाल की ओर लौटना क्यों चाहता है? हालांकि बूथ छापने, लूटने और फर्जी मतदान के उस दौर को सर्वोच्च अदालत खारिज कर चुकी है।

    याद कीजिए ईवीएम की शुरुआत कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के ही दौरान हुई थी। 2004 के उस दौर से लेकर आज तक करीब 340 करोड़ मतदाता अपने संवैधानिक मताधिकार का इस्तेमाल कर चुके हैं और 4 लोकसभा चुनाव ईवीएम के जरिए सम्पन्न कराए जा चुके हैं। 26 विधानसभा चुनावों और एक लोकसभा चुनाव में वीवीपैट पर्ची का भी इस्तेमाल किया जा चुका है। एक आम चुनाव में 55 लाख से अधिक ईवीएम का इस्तेमाल किया जाता है और करीब 1.5 करोड़ चुनावकर्मी मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। सभी एक विशेष पार्टी के पक्षधर हो जाएं या ईवीएम का प्रोग्राम एक ही पार्टी के पक्ष में तय कर दिया जाए और इतने चुनावकर्मी एक साथ ‘भ्रष्ट’ हो जाएं, यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। ईवीएम किसी लैपटॉप, कम्प्यूटर अथवा इंटरनेट नेटवर्क से जुड़ी हुई नहीं है, उसे हैक करना या छेड़छाड़ करना भी संभव नहीं है, अलबत्ता मशीन में तकनीकी खराबी जरूर आ सकती है।

    उस स्थिति में ईवीएम बदलने की पारदर्शी व्यवस्था है। चुनाव आयोग ने अदालत में अपना समूचा पक्ष रखा है। वीवीपैट पर्ची और वोटिंग के आपसी मिलान पर भी स्पष्टीकरण दिया है। पर्ची 7 सेकंड के लिए दिखती है। उसके बाद पर्ची मशीन में ही चली जाती है। न्यायिक पीठ को बताया गया कि पर्ची को मतदाता को देना जोखिम का काम है। इससे गोपनीयता भंग हो सकती है और बाहर निकालने पर पर्ची का दुरुपयोग भी किया जा सकता है। 

    याचिकाकर्ता एडीआर ने मतदान और पर्ची की 100 फीसदी क्रॉस चेकिंग की मांग की है। अब चुनाव की निष्पक्षता, ईमानदारी बरकरार रहे, मतदाताओं के जेहन में लेशमात्र भी संदेह नहीं होना चाहिए और आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता भी बनी रहे, उस संदर्भ में अदालत को निर्णय देना है। ईवीएम को लेकर अक्सर प्रलाप मचाया जाता रहा है और चुनाव आयोग को भी कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है, यह प्रवृत्ति दुराग्रहपूर्ण है। आयोग ने ईवीएम को हैक करने या उसके सिस्टम से छेड़छाड़ करने के मद्देनजर सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया था, कुछ दल गए भी, लेकिन कोई भी आपत्ति नहीं उठा सका या गड़बड़ी को साबित नहीं कर सका। अपने पक्ष के विजयी जनादेशों को विपक्ष शानदार हुंकार के साथ स्वीकार भी करता रहा। क्या एक संवैधानिक व्यवस्था ऐसे काम कर सकती है? न्यायिक पीठ के सामने चुनाव आयोग ने खुलासा किया कि 4 करोड़ ईवीएम वोट और वीवीपैट पर्चियों के मिलान कराए गए हैं। बहरहाल अदालती फैसले की प्रतीक्षा है।