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क्या आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) से कुछ बदलाव होगा ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 14 Jul

सार

यह देखना होगा कि एआई किन उत्पादों या सेवाओं को किफायती बनाएगी और किन नौकरियों को बेमानी बना देगी..!

janmat

विस्तार

सारे देश आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई)  की चर्चा हो रही है। मौजूदा लहर इसकी परीक्षा की घड़ी है। जब भी कोई तकनीकी लहर पहली बार आती है तो हममें से कुछ लोग इसकी तारीफ करने लगते हैं जबकि कुछ लोग यह सोचने लगते हैं कि आखिर ये लोग इन बातों में अपना और हमारा समय क्यों खराब कर रहे हैं। उसके बाद जब वह तकनीकी लहर जोर पकड़ जाती है तो हममें से विचारशील लोगों के मन में एक तरह की चिंता घर करने लगती है।

एआई से जुड़ी तकनीकी लहर (चैटजीपीटी उसका एक आरंभिक उदाहरण है) की बात करें तो इस समय वह दूसरे चरण में है जहां विचारक और नीति निर्माता नीतिगत निर्देश देने और विशेषज्ञ समितियां गठित करने में व्यस्त हैं।ताजा मामला अमेरिका का है जहां कुछ दिन पहले राष्ट्रपति जो बाइडन ने ऐसा ही एक निर्देश दिया। चूंकि यह निर्देश अमेरिका से आया था यानी एक ऐसे देश से जिसे तकनीकी लहरों को अपनाने में अग्रणी माना जाता है, इसलिए उसे प्राथमिकता दी जा रही है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भी कई देशों के समूह को ऐसे ही एक निर्देश पर चर्चा करने के लिए बुलाया है। अमेरिका और ब्रिटेन की चिंताओं में कुछ बातें साझा हैं: एआई का इस्तेमाल आतंकवादियों और साइबर अपराधियों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, ऐसे तरीके निकाले जाने चाहिए ताकि गलत खबरों और फर्जी तस्वीरों को पहचाना जा सके और सबसे बढ़कर उनके देशों को एआई की इस लड़ाई में पीछे भी नहीं छूटना चाहिए। 

ऐसी पहली तकनीकी लहर थी औद्योगिक क्रांति जो सबसे पहले इंगलैंड के मैनचेस्टर में 1750 के दशक में उभरी और फिर अगले 100 वर्षों तक समाज और पूरी दुनिया को प्रभावित किया। इसकी बदौलत ऐसी मशीनें बनीं जिन्होंने धागे की कताई और बुनाई शुरू की तथा मनुष्य तथा जानवरों की मदद से होने वाले काम की तुलना में कई गुना तेजी से कपड़ा बनना शुरू हो गया।इसके अलावा भाप इंजन के रूप में एक नया आविष्कार हुआ। निश्चित तौर पर इनके लिए प्रयास करने वाले उद्योगपतियों ने इसे क्रांति बताते हुए इसकी सराहना की लेकिन अन्य पर्यवेक्षकों मसलन मैनचेस्टर की यात्रा पर गए दो जर्मनों कार्ल मार्क्स और फेडरिक एंगेल्स ने माना कि यह मनुष्यों के समक्ष सबसे बुरी चीज घटित हुई है।

उन्होंने इसके विरुद्ध एक वैश्विक आंदोलन संगठित किया-साम्यवाद। यह आज भी मौजूद है। औद्योगिक क्रांति ने जो कुछ किया उसके लिए उस समय उसकी बहुत कम ने सराहना की। इसने सूती कपड़ों को न केवल अमीरों के लिए सस्ता किया बल्कि पूरी दुनिया के लोगों को यह सहज उपलब्ध कराया। निश्चित रूप से मोहनदास गांधी जैसे राजनीतिक उद्यमियों ने कताई और बुनाई के काम आने वाले उपकरणों का इस्तेमाल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने तथा अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए किया।

उसके बाद आई रासायनिक उद्योग की क्रांति की वजह से कृत्रिम नील जैसी चीजें बनाना संभव हुआ और कपड़ों को आकर्षक रंगों में रंगने की सुविधा मिली और फिर रसायनों के ज्ञान की बदौलत कृत्रिम रासायनिक धागे मसलन नायलॉन और पॉलिएस्टर का निर्माण संभव हो सका जिससे सस्ता कपड़ा बनना आरंभ हुआ। परंतु इन सबकी कीमत चुकानी पड़ी।इसका एक उदाहरण यह भी है कि 1950 के दशक में मुंबई को मध्य भारत का औद्योगिक केंद्र बनाने वाली 80 से अधिक कपड़ा मिलें 1980 के दशक तक बंद होने के कगार पर आ गईं क्योंकि वे अपने यहां निर्मित सूती कपड़े को बेच नहीं पा रही थीं। इसकी वजह से उनके लिए अपने 1.50 लाख कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो गया। इन कर्मचारियों ने हड़ताल की और अंतत: ये मिलें बंद हो गईं।

सभी विश्लेषक मिलों की बंदी के लिए श्रमिक संगठनों को जिम्मेदार ठहराते हैं और आज भी वे इसकी मूल वजह की अनदेखी करते हैं जो थी: रासायनिक क्रांति जिसने कृत्रिम पॉलिएस्टर और नायलॉन को साड़ी, धोती, कमीज, पैंट, चादर आदि के लिए सस्ता और लोकप्रिय विकल्प बना दिया। इसके साथ ही सूती का चलन बंद सा हो गया।ऐसी अन्य तकनीकी लहर भी आई हैं और उनके साथ ऐसे ही लाभ-हानि जुड़े रहे हैं लेकिन फिलहाल उनकी बात रहने देते हैं और देखते हैं कि एआई क्रांति के दौर में हमारा सामना किन चीजों से हो सकता है। यह देखना होगा कि एआई किन उत्पादों या सेवाओं को किफायती बनाएगी और किन नौकरियों को बेमानी बना देगी?

क्या यह संभव है कि सेवाओं का जो पहला समूह सस्ता होगा वह चिकित्सक, अधिवक्ता, बैंकर, लेखक, फिल्मकार और स्कूल-कॉलेज शिक्षकों का समूह हो? क्या ये सेवाएं चैटबॉट के हवाले हो जाएंगी और अगले कुछ वर्षों में इनकी कीमत मौजूदा कीमत से काफी कम हो जाएगी? क्या इसका अर्थ यह होगा कि भारतीय नागरिकों के लिए ऐसी सेवाएं किफायती हो जाएंगी? यदि ऐसा होता है तो क्या इस बात की भी संभावना है कि इन पेशों की आय और आंकड़ों में नाटकीय कमी आएगी जैसा कि बुनाई-कताई करने वालों के साथ हुआ? क्या ये पेशे भारतीय मध्य वर्ग की रीढ़ नहीं हैं और क्या हम उन्हें एआई की क्रांति के खतरे का शिकार होने दे सकते हैं?सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि क्या इस उथलपुथल का भी तगड़ा प्रतिरोध होगा और पिछली तकनीकी क्रांतियों की तरह इसे लेकर भी बगावत होगी? या फिर समझदारी भरी नीतियां हमें यह सुविधा देंगी कि हम एआई की उत्पादकता से लाभ अर्जित कर सकें और शांतिपूर्ण बदलाव की दिशा में आगे बढ़ें।