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सोचेगी-जिएगी भारतीयता तो बदले बिना चमकेगा भारत

सार

संविधान सभा से प्रारंभ 'इंडिया बनाम भारत' का संघर्ष एक बार फिर ‘प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत’ के आमंत्रण पत्र के साथ शुरू हो गया है. अब तो 'प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत' और 'ऑफिशियल ऑफ़ भारत' के सरकारी दस्तावेज भी सामने आ गए हैं. इस सरकारी दस्तावेज के सामने आते ही कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन ने तूफान सिर पर उठा लिया कि बीजेपी सरकार उनके गठबंधन से डरकर देश का नाम बदल कर इंडिया से भारत करने जा रही है..!

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विस्तार

इंडिया गठबंधन के हर दल के नेता के ऐसे बयान लगातार आ रहे हैं जबकि सरकार की ओर से ऐसी कोई मंशा अभी तक सामने नहीं आई है कि इंडिया का नाम संविधान से हटाकर केवल भारत ही रखने के लिए कोई कार्यवाही की जा रही है. सबसे पहला सवाल है कि ‘प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत’ और ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत’ सरकारी दस्तावेजों में लिखना क्या संविधान की भावनाओं के विरुद्ध और अवैधानिक है? 

सरकारी दस्तावेजों में इंडिया के स्थान पर अगर कोई सरकार भारत के उपयोग को प्रोत्साहित करती है तो इसमें आपत्ति का क्या विषय है? इसमें तो नाम बदलने का कोई विषय ही नहीं है. क्या देश में ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन्हें संविधान में होते हुए भी इंडिया के स्थान पर भारत लिखने पर कोई आपत्ति हो सकती है? इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तो राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का भी विरोध किया जाता है.

अंग्रेजों ने भारत को जब आजादी दी तब ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट’ जारी किया. इसका मतलब अंग्रेज भारत को इंडिया ही स्वीकार करते थे. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सहित भारतीय नेताओं और विद्वानों ने अंग्रेजों द्वारा दिए गए इंडिया नाम को अगर स्वीकार किया होता तो भारतीय संविधान में सीधे-सीधे यही लिखा गया होता कि 'इंडिया दैट इज यूनियन आफ स्टेट्स’. संविधान सभा ने इसके विरुद्ध प्रस्ताव देश के नाम के लिए पारित किया कि ‘इंडिया दैट इज भारत’.

यानी अंग्रेजों का दिया इंडिया नाम तो डॉक्टर अंबेडकर और संविधान सभा के द्वारा ही स्वीकार नहीं किया गया था. जब भी ट्रांजीशन का दौर होता है तब टकराव की बजाय समन्वय से नई व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं. इसीलिए संविधान सभा ने बीच का रास्ता अपनाया था.

अब भारत आजादी के अमृत काल में आ गया है. देश को भौगोलिक आजादी तो मिल गई थी लेकिन वैचारिक गुलामी से आजादी के निर्णायक काल की देश को लगातार तलाश रही है. ‘इंडिया बनाम भारत’ की राजनीतिक लड़ाई देश के अमृत के लिए समुद्र मंथन जैसी हो रही है. यह भी खुशी की बात है कि इस समय देश में भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व में दो राजनीतिक गठबंधन प्रमुखता से राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. 

यह देश अब इंडिया और भारत इन दोनों गठबंधन की विचारधारा, सोच, मानसिकता के बीच में विभाजित हो गया है. कांग्रेस सेकुलर सोच और देश की बहुलता-अनेकता में विभाजन के विस्तार को अपनी राजनीति के लिए शुभंकर मानती है तो बीजेपी सनातन और हिंदुत्व विचारधारा पर भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कार के साथ मजबूत राष्ट्र में अनेकता और बहुलता को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने का विचार रखती है.

राजनीतिक दृष्टिकोण से देश अब ‘इंडिया और भारत’ में विभाजित होने की कठिन प्रक्रिया से गुजर रहा है. केवल नाम बदलने के द्वंद से समस्या का समाधान नहीं होगा. यह समस्या देश के सामने केवल भौतिक स्वरूप में नहीं खड़ी हुई है बल्कि यह वैचारिक भावनात्मक और आस्था की समस्या है. इसका समाधान देश स्वयं राजनीतिक मंथन से निकालने के लिए सक्षम है.

आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने क्या कभी सोचा होगा कि उनके द्वारा सोचे और बनाए गए सेक्युलर इंडिया में सनातन हिंदुत्व की विचारधारा की सरकार कभी स्थापित हो सकेगी? भारतीय जनमानस द्वारा राजनीतिक समुद्र मंथन के बाद यह संभव हुआ है. अगर राजनीतिक बदलाव देश में नहीं आया होता तो आज इंडिया और भारत की विचारधारा पर संघर्ष की स्थिति कैसे निर्मित होती? फिर सरकारी दस्तावेजों में ‘प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत’ और ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ़ भारत’ लिखने का साहस कौन करता?

नरेंद्र मोदी की सरकार हमेशा से नीतिगत बदलाव के लिए ऐसे कदम उठाती रही है कि विपक्ष सहित राजनीतिक पर्यवेक्षक संसद के प्रस्तावित विशेष सत्र के एजेंडे पर अटकलें लगा रहे हैं. देश के सामने जो भी नीतिगत समस्याएं दशकों से हैं उनके संबंध में विशेष सत्र में विधेयक लाने की चर्चाएं चल रही हैं. इनमें 'वन नेशन-वन नेम' ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ महिला आरक्षण, समान नागरिक संहिता जैसे अनेक अनुमान लगाए जा रहे हैं.

मोदी सरकार न मालूम किन विषयों पर कानून बनाने के लिए विशेष सत्र में विधेयक ले आए. सरकारें बनती इसीलिये हैं कि आवश्यकता के अनुसार कानूनों में बदलाव करें. स्थिर सरकार और मजबूत नेतृत्व ही मजबूत फैसले लेने का साहस कर सकता है. गठबंधन की राजनीति तो जुगाड़ और जमावट में ही समय बर्बाद करती है. 

इंडिया नाम हटाकर केवल भारत का ही सरकारी स्तर पर उपयोग किया जाएगा इसके लिए कोई संशोधन पेश किया जाएगा या नहीं यह तो अभी तक स्पष्ट नहीं है लेकिन जी-20 के सम्मेलन में इंडिया को गायब कर दिया गया है. इस ऐतिहासिक आयोजन में इंडियन गवर्नमेंट के बजाय  सरकार खुद को भारत राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर रही है.

भारत नाम को उभारने के किसी प्रयास को ना तो असंवैधानिक और ना ही अवैधानिक कहा जा सकता है. अगर सरकार इंडिया शब्द हटाए बिना भी भारत का ही उपयोग सरकारी दस्तावेजों में करती है तो इसके लिए किसी संशोधन की जरूरत नहीं होगी.

सवाल केवल इंडिया बनाम भारत का नहीं है बल्कि इंडिया की सोच और भारत की सोच और संस्कृति का है. इंडिया की सोच यह मानती है कि आजादी के समय देश के धर्म स्थलों का जो स्वरूप था उसे बदला नहीं जा सकता. भारत की सोच और संस्कृति इसके विपरीत धार्मिक स्थलों पर नए विकास और विस्तार कर रही है. काशी कॉरिडोर, महाकाल लोक और सभी देवी देवताओं के स्थलों पर नए-नए विकास हुए हैं. इंडिया की राजनीतिक सोच भगवान राम के जन्म स्थान को बाबरी मस्जिद मानती है और भारतीय संस्कृति की सोच जन्म स्थान पर मंदिर बनाने के लिए जीवनदानी संघर्ष करती है. राम मंदिर का निर्माण भारत की वैचारिक सोच के जीवित प्रतीक के रूप में सनातन का दुनिया को संदेश और मार्गदर्शन देगा.

संविधान से इंडिया हटेगा या नहीं हटेगा लेकिन भारतवासियों के मन में तो भारत बसा हुआ है और भारत ही रहेगा. अंग्रेजी मानसिकता का इंडिया आज राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बन गया है तो मुकाबले में भारत को भी राजनीतिक ध्रुवीकरण का दंश झेलना पड़ेगा.

गुलामी के प्रतीकों को धीरे-धीरे हटाना किसी भी देश की भविष्य के प्रति बहुत बड़ी सेवा होती है. भारत भी इस दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है. राजपथ कर्तव्य पथ में बदल चुका है. नई संसद बनकर तैयार हो गई है. जॉर्ज पंचम की मूर्ति के स्थान पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्वतंत्र भारत की गरिमा और गर्व को परिलक्षित कर रही है. छोटे-छोटे न मालूम कितने प्रयास हुए हैं जिनमें उन प्रतीकों को खत्म किया गया है जो अंग्रेजी शासन काल से जुड़े हुए थे. देश के प्रधानमंत्री तो देश के विकास के लिए अपने पंचप्रण में गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति को राष्ट्र के प्रण के रूप में स्थापित और प्रेरित कर रहे हैं.

इंडिया की सोच तो काफी पीछे छूट गई है. अब तो भारत की सोच लगातार उभरती और स्थापित होती जा रही है. चांद पर चंद्रयान शिव शक्ति पर चहल कदमी के बाद आराम कर रहा है. भारत का आदित्य एल-1 सूर्य मिशन सूर्य को परखने की कोशिश कर रहा है. संविधान से इंडिया को चाहे हटाया जाए चाहे नहीं हटाया जाए, भारत तो इंडिया की औपनिवेशिक मानसिकता से बहुत आगे निकल गया है. भारत अब भारतीयता में सोचता है. भारतीयता में जीता है. भारतीयता हर चेतना में गूंजेगी तब भारत अपने आप चमकेगा, इंडिया छुप जाएगा और भारत सूरज-चांद पर तिरंगा फहरायगा.