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जुबानी जमा खर्च, सियासत-धर्म और सेवा का मर्ज़

सार

ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब किसी ना किसी की निरर्थक बात पर कोई विवाद ना पैदा होता हो. विवाद तो सियासत की बुनियाद कहे जा सकते हैं. आजकल धर्म की बात करने वाले भी शांति की नहीं बल्कि अशांति की बात करने में ज्यादा फायदा देखते हैं. बिना खर्चा अगर चर्चा चाहिए तो जुबानी बखेड़ा उसका सबसे सस्ता साधन है.

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विस्तार

सुप्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास सरकारी खर्चे पर मध्यप्रदेश में राम कथा कहने आए थे लेकिन अनपढ़ और कुपढ़ की ऐसी कथा उन्होंने बांची कि अब उनके पोस्टरों पर कालिख पोती जा रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस ने जुबानी बखेड़ा खड़ा कर रखा है. पवन खेड़ा के जुबानी बखेड़ा ने कईयों की भावनाएं आहत की तो उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया रची गई. विमान पर चढ़ते हुए उन्हें रोका गया फिर अदालत में पेश किया. कांग्रेस भी एक्शन करने वाली एजेंसियों से तेज निकली और सुप्रीम कोर्ट से जमानत ले ली. 

खेडा का बखेड़ा तो निश्चित रूप से निंदनीय कहा जाएगा उन्होंने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री के नाम के साथ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जो सियासत में सामान्यता नहीं होता. कुमार विश्वास के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयं संघ के कार्यकर्ता सड़कों पर आ गए हैं. उन्होंने वामपंथियों को कुपढ़ तो संघ को अनपढ़ कहने का दुस्साहस किया है. 

चाहे नेता हो चाहे अभिनेता हों, चाहे धर्म के विक्रेता हों, चाहे सेवा का पुरोधा हों, सब के सब फेम के लिए ही जीवन खपा रहे हैं. टीआरपी का जमाना है. सियासत में भी टीआरपी उसी की है जो बोलना जानता है. हमें सिखाया जाता है कि वाणी ऐसी बोलना चाहिए जो सभी को अच्छी लगे. किसी को बुरी लगने वाली बात करने से हर व्यक्ति को बचना चाहिए लेकिन आज समाज में इसके विपरीत खुलेआम आचरण हो रहा है. ऐसा नहीं है कि कोई एक आदमी कर रहा है, हर तरफ ऐसा ही बोलबाला है.

थोड़े समय पहले की बात है. जब आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के जाति से जुड़े बयान पर विवाद पैदा हो गया था. पंडितों की ओर से गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त की गई थी. धीरे-धीरे यह विवाद शांत हुआ और अब कवि कुमार विश्वास ने नया विवाद पैदा कर दिया है. अंधे को अंधा नहीं कहना हमारी संस्कृति है. हम उसे सम्मान से सूरदास कहते हैं. किसी को अनपढ़ या कुपढ़ का प्रमाण पत्र देने वाला कोई भी कौन हो सकता है? कुमार विश्वास प्रसिद्ध कवि हैं. उनमें अपनी बात कहने और लोगों तक अपनी भावनाओं को पहुंचाने की कला है. प्रकृति की इस देन का सदुपयोग तो समझा जा सकता है लेकिन उनकी इस तरह की टिप्पणियां उसके दुरुपयोग की श्रेणी में ही आएंगी.

शब्द और भाषा ही विचारों को प्रकट करने का माध्यम है. सियासत में आज ऐसा दौर चल रहा है कि कौन ऐसे शब्दों और भाषा का उपयोग करे जो पहले कभी किसी ने उपयोग न किया हो. ऐसे-ऐसे डायलॉग चुनकर दिए जाते हैं जो मीडिया में प्रमुखता पा सकें. राजनेताओं के भाषणों के लिए विशेषज्ञ नियुक्त किए जाते हैं. ऐसे विशेषज्ञ नेताओं को हर दिन ऐसे डायलॉग उपलब्ध कराते हैं कि जिनको बोलने से मीडिया में अच्छा स्पेस मिल सके. 

हमारे समाज की कुछ प्रवृत्ति ही ऐसी है कि सकारात्मकता को उतना स्थान नहीं मिल पाता जितना नकारात्मकता को मिलता है. नेगेटिव रोल को याद रखा जाता है और पॉजिटिव रोल को भुला दिया जाता है. शायद इसीलिए सभी क्षेत्रों में जुबान और नेगेटिव नेरेटिव सेट करने की प्रवृत्ति हो गई है. 

हेट स्पीच इसका उदाहरण है. विभिन्न समुदायों के बीच हेट स्पीच के मामले कितना गंभीर रूप लेते हैं यह हमने कई बार देखा है. बीजेपी की प्रवक्ता द्वारा इस्लाम के विरुद्ध की गई टिप्पणियों पर न केवल राष्ट्रव्यापी बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी. उसके बाद पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जिस तरह का वातावरण बना था उसको सामान्य बनाने में बहुत लंबा समय लगा है.

कुमार विश्वास पंडित हैं. हो सकता है पंडित होने के कारण ही उन्होंने अनपढ़ और कुपढ़ के अपने ज्ञान को कथा में रखा हो लेकिन अब तो कुमार विश्वास मध्यप्रदेश में ऐसे विवादित हो गए हैं कि सरकारी कार्यक्रम आयोजित करने वाले लोगों की भी खैर नहीं है. सरकार के कार्यक्रम में एक ऐसे संगठन के खिलाफ टिप्पणी की गई है जिसे सरकार का निर्माता माना जाता है. कितनी आश्चर्यजनक स्थिति है कि नफरत और कट्टरता को मुद्दा बनाकर शांति और सद्भाव का संदेश देने की कोशिश करने वाले भी नफरत के जुबानी शोले ही बरसाते देखे जाते हैं.

सियासत के साथ ही धार्मिक जगत से जुड़े लोग भी रास्ते से भटकते हुए दिखाई पड़ रहे हैं. इस तरह के जुबानी दंगों से न सियासत का कोई लाभ होता है और ना ही धर्म को कोई लाभ होता है. इसका इतना ही लाभ होता है कि जुबानी बखेड़ा करने वाले व्यक्ति को नेगेटिव पब्लिसिटी का लाभ मिल जाता है.

निरर्थक बात आम स्वभाव होता है. कोई भी व्यक्ति पूरे 24 घंटे जितनी बातचीत करता है उसका अगर वास्तविक उपयोगिता की दृष्टि से आकलन किया जाए तो उसमें 80% बातचीत निरर्थक ही होती है. अगर यह बातचीत नहीं की जाए तब भी उस व्यक्ति के जीवन में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. बोलने से ऊर्जा का जो नुकसान होता है अगर उसको बचाया जाए और निरर्थक बोलना बंद कर दिया जाए तो जीवन में सार्थकता का विकास होता है. 

निरर्थक बोलने वाला सार्थक कुछ समझ भी नहीं सकता. इसके साथ ही ज्यादा बोलने वाला भी अक्सर निरर्थक ही बोलता रहता है. ज्यादा बोलने वाले को ऐसा लगता होगा कि उसकी बात कोई सुन रहा है लेकिन सामान्यतः सुनने वाला केवल सुनता दिखाई पड़ता है लेकिन वह सुनता कुछ भी नहीं है. अब कमलनाथ को ही देख लीजिए अपनी राजनीति के लिए उन्होंने मध्यप्रदेश को मदिरा प्रदेश का नाम दे दिया है. उनके इस बयान से भी प्रदेश की सियासत में बखेड़ा हो गया है. 

सियासत में जुबानी बखेड़ा तो शायद कम नहीं हो सकेगा लेकिन धर्म से जुड़े लोग जरूर धार्मिक प्रसंगों को विवादों से दूर रखेंगे. ऐसे विवादास्पद वक्तव्य धर्म को ही नुकसान पहुंचाते हैं. जगत की सच्चाई को समझना हो तो पूर्व में उस क्षेत्र की स्थापित शक्तियों और उनके भी नष्ट होने के इतिहास को याद रखने की जरूरत है. आज स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरे को निम्न साबित करने की होड़ मची हुई है. 

यह बात कितनी सारगर्भित है कि-

तुम से पहले जो शख्स यहां तख्तनशी था..!
उसको भी अपने खुदा होने का इतना ही यक़ीं था..!!

सियासत-धर्म और सेवा के क्षेत्र में जुबानी बखेड़े के पीछे यही सोच काम करती है.