मनोवृत्ति और कर्म से ही वीभत्स थे राक्षस …………….रावण की त्रैलोक्य विजय- 82

मनोवृत्ति और कर्म से ही वीभत्स थे राक्षस 
                                        रावण की त्रैलोक्य विजय- 82

Ramesh Tiwari
नरभक्षी होने से राक्षसों की मनोवृत्ति दुर्दांत थी। वे स्वभाव से ही दुष्ट होते थे। मनुष्यों को जीवित पकड़ कर अग्नि में डाल कर होले (हरे गेंहूं, चना) जैसा भूनना। फिर भालों बरछियों से उलट पलट कर मांस निकाल कर खा जाना, उनका रोज का काम था। वे हैवान होते थे। घनघोर वनों में पर्वतों की अंधेरी गुफाओं में रहते। सिर पर सींग, मुंह पर लाल धारियां, नाक और मुंह में लकडी़ की पिंच्चियां (खपच्ची) लगाते। वस्त्र के नाम पर कमर पर एक चमडे़ का छोटा सा फटका। बस। और हां...! उनके हाथों में भयंकर किस्म के भारी फल बाले, भाले और बरछी अवश्य होते। गुफाओं से बाहर जब वे रहते तो बडे़,बडे़ और सघन वृक्षावलियों के मध्य, ऊंचे पेडो़ पर झोंपडी़नुमा मकान बना लेते। 

राक्षस की हैसियत के अनुसार यह मकान तीन तीन माला भी होते। इसमें सुरक्षा और शत्रुओं पर प्रहार करने की सुविधा का ध्यान भी रखा जाता था। युद्ध करने की उनकी अपनी नीति थी। असभ्य और बर्बर। उस नीति का सभ्य समाज के व्यवहार में कहीं कोई साम्य ही नहीं बैठता था। राक्षसों के युद्ध करने के विकट उदाहरण देवासुर संग्रामों में भी मिलते हैं। एक देवासुर संग्राम में तो लंका से गये माल्यवान,सुमाली और माली ने श्री विष्णु हरि को अकेला ही घेर लिया था। परन्तु पराक्रमी और त्रिलोकी नाथ विष्णु ने उनको इतना पीड़ित किया कि माली तो, जो सेनापति भी था,युद्ध में मारा गया। और दोनों भाई ऐसे भागे कि फिर लौट कर लंका आये ही नहीं। एक अन्य देवासुर संग्राम में राक्षसेन्द्र निऋतिदेव का उल्लेख आया है। तब राक्षसों का यह राजा देवताओं की ओर से निशाचरों, दैत्यों और दानवों के खिलाफ युद्ध कर रहा था। -

'तथागतं तु तं दृष्टवा धनेशं नरवाहनम्।

खड्गास्त्रो निऋतिर्देवो निशाचरबलानुगः।।

यह युद्ध इतना भयानक था कि इसमें श्रीहरि, इंद्र, चंद्रमा, कुबेर और सभी देवगण बुरी तरह पराजित हो गये थे। तारक नामक महान योद्धा दैत्य ने सभी प्रतिष्ठित देवताओं को बंदी बना लिया था। (मेरी पुस्तक "क्षीरसागर शयनम् "विष्णु की आत्मकथा, में मैं यह लिख चुका हूँ।) यह युद्ध बहुत ही रोचक और रोमांचकारी था।

                             रावण की त्रैलोक्य विजय- 82

अब हम महाभारत के युद्ध में राक्षसों की भागीदारी और उनकी युद्ध विभीषिका को देखते हैं। हमारे पाठकों को संक्षेप में यह भी जान लेना चाहिये कि राजस्थान में स्थापित "श्याम खाटू जी का मंदिर राक्षस घटोत्कच के पुत्र "बर्बरीक" के सम्मान में निर्मित किया गया था। घटोत्कच के संबंध में इतना भर कहना ठीक है! कि युद्ध में वह मारता कम घसीटता ज्यादा था। महाभारत युद्ध में कौरवों और पांडवों, दोनों की ओर से राक्षस युद्ध कर रहे थे। भीम पुत्र घटोत्कच ने तो जानबूझ कर श्रीकृष्ण की कूटनीति का मोहरा बनना स्वीकार कर लिया। कर्ण की वैजयंती शक्ति से अर्जुन के प्राण बचाने के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। किंतु मृत्यु के पूर्व उसने कर्ण और कौरव सेना का जो हाल किया, वह राक्षसीय प्रवृत्ति को भलीभांति दर्शाता है।

युद्ध में राक्षस राज घटोत्कच के अलावा ऐसे पांच और राक्षस राजा युद्ध कर रहे थे, जिनका पांडवों से कहीं न कहीं से कोई बैर भाव था। यद्यपि ऐसे राक्षस राजाओं को स्वयं दुर्योधन ने भी आमंत्रित नहीं किया था। परन्तु वे सभी राक्षस राजा 'बहती गंगा' में मानों हाथ धोने आ गये थे।वनवास काल में समय समय पर,पांडवों के जीवन की सुरक्षा करने वाले ,भीम के हाथों से पिट चुके इन राजाओं की घटोत्कच ने क्या दुर्दशा की, सुन कर रोंगटे खडे़ हो जायेंगे। एक नीति वाक्य से घटोत्कच की राक्षसी युद्ध कथा को प्रारंभ करते हैं- "राजा, ब्राह्मण और स्त्री के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए"। श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को कह रखा था कि वह किसी भी मूल्य पर कर्ण को अवकाश न लेने दे। ऐसा विकट युद्ध करे कि कौरव सेना एक स्थान पर बंध कर रह जाये। एक छोर का समाचार दूसरे छोर के योद्धा तक न पहुंच सके। उस दिन श्रीकृष्ण बहुत भयानक युद्ध क्रीडा़ कर रहे थे।

श्रीकृष्ण ने ठान लिया था कि आज कर्ण की अजेय बैजयंती शक्ति से अर्जुन के प्राण बचाना ही है। सो उन्होंने युद्ध बलि स्वरूप घटोत्कच को तो कर्ण के सामने खडा़ कर दिया। और पांडवों के लिये घातक हो रहे कौरवों के महासेनापति आचार्य द्रोणाचार्य के सामने महाधनुर्धर अर्जुन को ला खडा़ किया। यह युद्ध कथा बहुत ही रोमांचकारी है। किंतु हम तो केवल राक्षसों की युद्घ कथा पर ही चर्चा करेंगे। (महाभारत की यह कथा विस्तार पूर्वक (श्रीकृष्णार्पणमस्तु में मिलती है)। 

  धन्यवाद।


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