आनंद में है, सब कुछ समाया: डॉ. घनश्याम बटवाल

आनंद में है, सब कुछ समाया
डॉ. घनश्याम बटवाल , मंदसौर 
जब हम कहते हैं , आज तो " आनंद " आगया , अर्थात आपके मन को भा गया , आपकी चाहत के अनुकूल होगया , आपके हृदय को स्पर्श कर गया , मन को पुलकित कर गया , आंतरिक प्रसन्नता को व्यक्त कर गया यही तो " आनंद " का प्रतिरूप है - स्वरूप है ।

आनंद का मूल अर्थ ही यही है , भय रहित , तृष्णा रहित , शोक - चिंता मुक्त शान्ति और प्रसन्नता की अनुभूति हो । जो हृदयस्पर्शी होकर उत्साह - उल्लास और हर्ष को तृप्ति प्रदान करे । वे पल , वे व्यक्ति , वे समाज जन आनंद निमग्न रहते हैं , विशिष्ट अनुभूति करते हैं ।

समग्रता से परिस्थितियों को समदृष्टि से समझते - महसूस किया करते हैं , आनंदमयी संसार रचते हैं । हालांकि यह कतई आसान नहीं है परन्तु असम्भव नहीं ।

हम और आप , मनुष्य मात्र जीव - जंतुओं सभी के दिल धड़कते हैं तो सभी भिन्न - भिन्न रूप से महसूस करते हैं । इन परिस्थितियों में जो अपने नैसर्गिक और प्राकृतिक गुणों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं , वे आनंदित जीवन जीते हैं ।

सच तो यह है कि मन का सुख आनंद देता है , मन के आधीन मानव मात्र है , मन चंचल अवश्य है पर सृजनशीलता और सकारात्मकता के साथ व्यक्ति समाज जीवन में कैसे संयोजन करता है उसी आधार पर आनंद प्राप्त कर नया संसार रचनात्मक बनाता है ।

मानव के मूल स्वभाव में प्रेम और मुक्ति प्रमुख है , बाकी संवेदना , करुणा , ईर्ष्या , विषाद , तृष्णा , क्रोध , मोह , काम आदि अनुषांगिक भाव हैं जो परिस्थितियों अनुसार प्रत्येक में विद्यमान रहकर चलते - बदलते रहते हैं । इन्हीं के बीच स्थितप्रज्ञ आनंद प्राप्त करते हैं ओर आनंदमयी रचना संसार विस्तारित करते हैं ।

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इसे यूं भी समझा जा सकता है , अमुक संत - महात्मा , वैज्ञानिक , साहित्यकार , राजनेता , अभिनेता , नर्तक , गायक , खिलाड़ी , महापुरुष , ईश्वरीय अवतार , उपदेशक , प्राध्यापक आदि अधिक लोकप्रिय है , अपने - अपने क्षेत्रों में दक्ष हैं ।

उनके चाहने वाले या समर्थक कहें असंख्य हैं अर्थात उनकी विशेषता , उनके गुण , उनका व्यवहार , आचरण , भाषा , दृढ़ता , प्रदर्शन बहुसंख्य को प्रेरित करता है , संतुष्ट करता है , प्रकारांतर में तृप्ति देता है , जिससे हमें या चाहने वालों को खुशी मिलती है यह आनंद प्रदान करता है । आनंद के इस प्रकार में समर्थकों को प्रेरणा मिलती है , आदर्श मानते हैं तो तदनुसार आगे बढ़ सकते हैं यह भी आनंद का ही मार्ग है ।

विज्ञजनों की व्याख्या के मुताबिक मूल रूप से पंच आनंद माने गए हैं , यथा - विषयानंद , योगानंद , विदेहानंद , अद्वेतानंद और ब्रह्मानंद इनकी विशद व्याख्या नहीं जायेंगे पर सहजरूप से यह चरणबद्ध प्रक्रियाएं
हैं जो विषयानंद से ब्रह्मानंद - परमानंद तक पहुंचाती है ।

हर व्यक्ति की चाहत है , सब मुझे अच्छा कहें ओर चाहता है कि सब अच्छा हो लोग और समाज अच्छा हो,
पर जब सब अच्छा ही चाहते हैं तब भी विकृतियां बढ़ रही , मनोमालिन्य आकार लेरहा , तृष्णा - ईर्ष्या - क्रोध - लालच , शंका - अविश्वास , अपराध - प्रतिस्पर्धा , विषाद और भी चीजें हैं जो फ़न फैला रही हैं ये समाज जीवन के आनंद में बाधक बन रही हैं । इन विषमताओं पर नियंत्रण , इन पर विजय ही आनंद का मार्ग प्रशस्त करेगा । 
यह करना होगा , समझना होगा , व्यवहारिक धरातल पर जीवन में उतारना होगा , सच्चा आनंद आपकी प्रतिक्षा कर रहा है ।

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यह ध्यान रहे कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता पर ईश्वरीय ओर दैवीय शक्ति से प्रत्येक में कोई न कोई गुण विद्यमान रहता है अब यह व्यक्ति , वातावरण , शिक्षा - दीक्षा ,समाज पर निर्भर करता है कि उन विशिष्ट गुणों को कैसे परिभाषित करे , किस प्रकार परिमार्जित करे , कैसे उन्नत करे , कैसे शिखर प्राप्त करे यह समुचित प्रक्रिया भी आनंददायी है ।

व्यक्ति - व्यक्ति में आनंद या ख़ुशी प्राप्त करने का लक्ष्य और पैमाना पृथक है । रुचि अनुसार मनोनुकूल कार्य अलग होंगे । 
खिलाड़ी अपने फ़ील्ड में श्रेष्ठता सिद्ध कर आनंद और सन्तुष्टि प्राप्त करता है 
वहीं संगीतज्ञ - नर्तक अपने कौशल से सुर - ताल - आलाप - लय और कदमताल से लेते हैं आनंद । अभिनेताओं को अपने अभिनय से पात्रों की जीवंत प्रस्तुति से आनंद अनुभूति होती है , विद्वानों - संत - महात्माओं - उपदेशकों को प्रेरक मार्गदर्शन - तात्विक ज्ञान - आध्यात्मिक प्रसंगों की संदर्भित व्याख्या समाज को देने से आनंद मिलता है । वैज्ञानिकों द्वारा नित नये शोध - अनुसंधान नई रचना - नये प्रकल्पों में निमग्न रहने में असीम आनंद अनुभूति होती है । 
राजनेता - प्रशासन के लोग हर वर्गों की बुनियादी चिंताओं , समस्याओं ,आपदाओं पर नियंत्रण हेतु सतत जुटे रहते हैं यह उनके आनंद का विषय होता है । लेखक - कवि - साहित्यकार नवसृजित रचनाओं में वास्तविक चित्रण रत रहकर आनंद प्राप्त किया करते हैं । अर्थात प्रत्येक का अपना - अपना आनंद है ।

आनंद में भी आराम के उत्कृष्ट आध्यात्मिक श्रेष्ठ उदाहरण हमारे सम्मुख उपस्थित हैं । 
आ + नंद = आनंद , अर्थात नन्दलाल ( श्री कृष्ण ) यह निच्छल प्रेम को परिभाषित करता जीवन चरित्र है तो
आ + राम = आराम , अर्थात श्रीराम , यह समाज जीवन में प्रत्येक के प्रति कर्तव्यों की पराकाष्ठा को प्रतिबिंबित करता है । दोनों ही चरित्रों के गुणानुवाद में आनंद मिलता है , जो शाश्वत रूप से प्रेरित करता है ।

विकास की गति जारी है । पीढियां बदली , लक्ष्य बदले आज विश्व संदर्भों में बात करें तो चन्द्र - मंगल व अन्य ग्रहों पर जीवन अस्तित्व की खोजबीन चल रही है । भारत भी अछूता नहीं है । इसके पहले के परिपेक्ष्य में देखें तो सन 1857 में सुलगी स्वतंत्रता की चिंगारी सन 1947 तक आते - आते मशाल बन विकराल बन गई , हर वर्ग - हर धर्म - हर नागरिक का लक्ष्य परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्ति प्राप्त करना होगया था । तत्कालीन समय उनके और देशवासियों के लिये वही आनंद बन गया । 
जब तिरंगा लालकिले की प्राचीर से फहराया गया तब संतुष्टि भाव और राष्ट्रीय स्वाभिमान से मस्तक ऊंचा होगया । असंख्य जनों के आनंदातिरेक में खुशी के आंसू छल छला उठे । यह भी तो आनंद ही था । आनंद को शब्दों में नहीं बांधा जासकता , यह हृदयस्पर्शी होकर तृप्ति भाव बोध प्रदान करता है ।

आनंद तो जीवन के हर पल में , हर क्षेत्र में , हर परिस्थितियों में , हर सुख - दुःख में प्राप्त किया जासकता है । 
आनंद मतलब आत्मसंतोष जो सबसे बड़ा सुख है । यह किसी अचल या स्थूल वस्तु पर निर्भर नहीं रहता । 
सुख - दुःख प्रत्येक के जीवन का हिस्सा है । इन हालातों में भी सच्चे स्वरूप दर्शन से आनंद की प्राप्ति होसकती है । 
विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि प्रसन्नता और आनंद का संबंध मन - मस्तिष्क से है । हंसने और मुस्कुराने से जहां पॉजिटिव वाइब्रेशन के साथ ख़ुशी और आनंद मिलता है वहीं क्रोध और विषाद दुःख और पछतावे के कारण बनते हैं ।

हकीकत तो यही है कि आनंद तन - मन और हृदय से जुड़ा संतुष्टि या तृप्ति भाव है । जो उल्लास , हर्ष और प्रसन्नता से भर देता है । यह व्यापक मानसिक स्थितियों की व्याख्या भी करता है । जिसका अनुभव मानव मात्र , पशु - पक्षी सकारात्मक , मनोरंजक मानसिक स्थिति के रूप में करते हैं । ये विशिष्ट स्थिति यथा - सुख
मनोरंजन , खुशी , परमानंद और उल्लासोन्माद की होसकती है ।  आनंद स्थायी भाव है पर मज़ा तात्कालिक और क्षणिक होसकते हैं । आनंद प्राप्ति में हृदयस्पर्शी अनुभूति निहित होती है जो दीर्घकालिक और शाश्वत मानी गई है ।

विश्व के अरबों और देश के करोड़ों लोगों की अपनी - अपनी आस्थाएं हैं ।
भिन्न - भिन्न धर्म और पंथ को मानने वाले असंख्य लोग हैं । मोटेतौर पर यह बताया - समझाया गया है कि मनुष्य जीवन के अपने कर्म परमात्मा के प्रति जवाबदेह बनाते हैं ।
सद्कर्मों की सभी ने शिक्षा दी है । परन्तु साहित्य सृजन तो मनुष्यों के प्रति जवाबदेह है , साहित्य का आनंद ऊंचा माना है क्योंकि इसका आधार सत्य और सुंदर है उसी को दर्शाना सच्चा आनंद है ।

ईर्ष्या - तृष्णा और शक के कारण आज आनंद और खुशियों को ग्रहण लग रहा है । शंका - कुशंका में अस्तव्यस्त समाज , ईर्ष्या कर स्वयं सब कुछ पा लेने की चाह वास्तविक आनंद भाव को तिरोहित कर रहा है । 
धारणा है कि शंकालु लोग जन्मजात स्वभाव के होते हैं या यह व्यक्ति के स्वभाव का अंग है लेकिन शोध में मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बात - बात पर शंका करना ,ईर्ष्यालु प्रवृत्ति होना व्यक्ति की मानसिक जटिलताओं का सूचक है । यह परवरिश , समाज - परिवार के वातावरण और संस्कारों पर निर्भर करता है । कमजोर मानसिकता के लोग जल्दी गिरफ़्त में आते हैं और आनंद से कोसों दूर चले जाते हैं , अवसाद और मानसिक रुग्णता के शिकार बन जाते हैं । 
इन परिस्थितियों में निपटने के लिये रूचि अनुसार विधा में जुटना , अपने पसंदीदा कार्य में निमग्न रहकर निपुणता प्राप्त करना आनंददायक होगा ।

आनंद हमारे समाज जीवन में आसपास ही बिखरा पड़ा है । इसे जीवन में समेटें संतोष भाव धारण कर आनंद प्राप्त करें ।
आनंद हो या प्रेम , ख़ुशी हो या उल्लास अमीर - गरीब में भेद नहीं करता । आनंद सिर्फ़ आनंद जो स्वयं महसूस कर प्राप्त किया जासकता है 
किसी शायर की पंक्तियां मौजूं हैं - - 
प्रेम ( आनंद ) की धारा बहती है
जिसके दिल ( हृदय ) ,में
चर्चा उसकी होती है , हर महफ़िल में

प्रेम की ज्योति जीवित रखें और जीवन आनंद लेते रहें ।
आनंद नैसर्गिक गुण है जो प्रकृति प्रदत्त है । रूचि अनुसार जल - जंगल और ज़मीन कहीं भी , किसी भी समय किसी के भी साथ प्राप्त किया जासकता है , महसूस किया जासकता है , हृदय में अंकित होसकता है ओर इसके लिये अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना पड़ता यह जीवन का सार है । 
आनंदमयी संसार है ,आनंद का हृदय में संचार है , प्रकृति का उपहार है , ईश्वरीय उपकार है तो क्यों ना हम सब आनंद प्राप्त करें । 
सबको आनंद दें और सबसे आनंद लें

भाव भक्ति प्रार्थना आनंद के साथ 
आनंद में प्रेमाश्रु धारा
बहती हो तब याद में ।

कंठ गदगद होय के गुणगान 
का रस लीजिए 
हे प्रभु यह योग तेरा नित्य 
हमको दीजिए 
पद पदम् में मकरंद मन को
मुग्ध प्रेमी कीजिए

ओम आनंदम - ओम आनंदम

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संप्रति - 
डॉ . घनश्याम बटवाल 
पत्रकार / लेखक 
मंदसौर ( मध्यप्रदेश )

Priyam Mishra



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