भारतवर्ष को फिरंगियों ने नहीं खोजा था,, इसका इतिहास सनातन है इसके साक्ष्य भी हैं मोजूद..

मित्रो एक झूठ हमेशा से फैलाया गया कि भारत वर्ष को अंग्रेजो ने जलमार्ग/स्थलमार्ग से खोजा जबकि सत्य ये है की भारतवर्ष को अंग्रेजों ने नहीं खोजा था यह सनातन है और इसके साक्ष्य भी हैं.

इतिहास हमेशा विजेता द्वारा लिखा जाता है और वह इतिहास नहीं विजेता की गाथा होती है भारत के साथ भी यही हुआ है पहले इस्लामिक आक्रमण और उनका 800 वर्षों तक शासन करना फिर अंग्रेज़ो के 200 वर्ष तक के शासन ने इस देश के इतिहास लेखन को इस तरह से प्रभावित किया कि आज भी लोगों को यही लगता है कि India को ब्रिटिश ने बनाया.

लोगों के मन में यह हीन भावना बैठी हुई है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत था ही नहीं हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता और अपने आप को ‘History Buff’ कहने वाले सैफ अली खान ने ये कह दिया कि मुझे नहीं लगता है India जैसा कोई कान्सैप्ट ब्रिटिश के आने से पहले था.

यह कोई हैरानी की बात नहीं है पिछले 70 वर्षों में जिस तरह से इतिहास को उसी इस्लामिक और ब्रिटिश को केंद्र में रख कर पढ़ाया गया है ये उसी का परिणाम है ब्रिटिश काल के इतिहासकारों ने अपने हिसाब से ही इतिहास को लिखा जैसा एक विजेता लिखता है यानि अपने ही गुणगान में लिखना.

उनके द्वारा किताबों में यह जानबूझकर लिखा गया जिससे पढ़ने वालों को यह लगे कि उनके आने से पहले भारत नाम का कोई देश ही नहीं था और जो भी बनाया गया वह सिर्फ और सिर्फ ब्रिटिशर्स की देन है उनके बाद हमारे देश के चाटुकार इतिहासकारों ने भी उसी को आधार बनाकर उनका गुणगान किया.

इस वजह से आज हमारे देश में जो भी इतिहास पढ़ाया जाता है उसे पढ़ कर यही भावना आती है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत था ही नहीं आज के लगभग 80 प्रतिशत बच्चे यही समझते हैं कि, ब्रिटिश के आने से पहले भारत (india) का कोई अस्तित्व ही नहीं था आज के बच्चे महाभारत के बारे में कम और हैरी पॉटर के बारे में अधिक जानते है उनको ‘Lord of the Rings’ के बारे में अधिक पता है बजाए रामायण के यह विडम्बना है कि यही युवा वर्ग हीन भावना में इस तरह से ग्रसित है कि इन दोनों कि इतिहास को काल्पनिक मानती है.

आज की इस पीढ़ी को न तो वेदों के बारे में पता है न ही महाग्रंथों के बारे में और न ही पुराणों के बारे में उपनिषदो का तो नाम भी मुश्किल से ही सुना होगा. भारत कोई 70 वर्ष पुराना देश नहीं है यह हजारों वर्षों पुरानी एक सभ्यता है जिसकी पहचान भौगोलिक अवस्थिति से होती है भारत के रहने वाले इतने पुराने है कि इसे सनातन यानि जो सदा से अविरल समय से चला आ रहा है.

  विष्णु पुराण में स्पष्ट लिखा है:

उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।
वर्ष तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

अर्थात- “समुद्र के उत्तर से लेकर हिमालय के दक्षिण में जो देश है वही भारत है और यहाँ के लोग भारतीय हैं”

सबसे पहले बात करते हैं पृथ्वी के भूगोल यानि ज्योग्राफी की आज हमे वर्तमान की ज्योग्राफी में यह पढ़ाया जाता है कि पैंजिया पृथ्वी का पहला महाद्वीप या यूं कहे सुपर महाद्वीप था.

अन्य सभी नवीन महाद्वीप (एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, अंटार्कटिका एवं ऑस्ट्रेलिया) का जन्मदाता भी यही महाद्वीप है, टेकटोनिक प्लेट्स के Movement के कारण पैंजिया महाद्वीप में खंडन हुआ और यह टूटकर इन 7 महाद्वीपों में बंट गया.

गोंडवाना पैंजिया के दक्षिणी भाग को कहते हैं, गोंडवाना भूमि में प्रायद्वीप भारत, दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और अंटार्कटिका समाहित है. अंगारा पैंजिया के उत्तरी भाग को कहते हैं, अंगारा भूमि में एशिया (प्रायद्वीपीय भारत को छोड़कर), उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप समाहित है.

अब देखते है कि हमारे वेद-पुराणों में क्या लिखा है:

मत्स्य महापुराण में सभी सात प्रधान महाद्वीपों के बारे में बताया गया है सात द्वीपों में जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप,शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंच द्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप का वर्णन है. जम्बूद्वीप का विस्तार से भौगोलिक वर्णन है आज जिसे एशिया कहा जाता है वही जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता था.

जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है. जम्बू (जामुन) नामक वृक्ष की इस द्वीप पर अधिकता के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था.

‘जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्‌,
हरिवर्षं तथैवान्यन्‌मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्‌,

उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्‌,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।

एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।– (विष्णु पुराण)

भारतवर्ष का अर्थ है राजा भरत का क्षेत्र और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम सुमति था ! इस विषय में वायु पुराण कहता है—

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।

प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरंनृपम्।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।|

ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।|

ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को ‘सप्तसिंधु’ प्रदेश कहा गया है ऋग्वेद के नदी सूक्त (10.75) में आर्य निवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्‍य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा. उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे इसके अलावा महाभारत में पृथ्वी का वर्णन भी आता है.

‘सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।

वेदव्यास, भीष्म पर्व, महाभारत अर्थात: हे कुरुनन्दन!  सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है. इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है.

अर्थात : दो अंशों में पिप्पल का अर्थ पीपल के दो पत्तों और दो अंशों में शश अर्थात खरगोश की आकृति के समान दिखाई देता है. आप कागज पर पीपल के दो पत्तों और दो खरगोश की आकृति बनाइए और फिर उसे उल्टा करके देखिए, आपको धरती का मानचित्र दिखाई देखा.

ब्रह्म पुराण, अध्याय 18 में जम्बूद्वीप के महान होने का प्रतिपादन है-

तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥

पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।।
यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥

अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने।।
यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥

अर्थात- भारत भूमि में लोग तपश्चर्या करते हैं, यज्ञ करने वाले हवन करते हैं तथा परलोक के लिए आदरपूर्वक दान भी देते हैं. जम्बूद्वीप में सत्पुरुषों के द्वारा यज्ञ भगवान् का यजन हुआ करता है यज्ञों के कारण यज्ञ पुरुष भगवान् जम्बूद्वीप में ही निवास करते हैं इस जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है. यज्ञों की प्रधानता के कारण इसे (भारत को) को कर्मभूमि तथा और अन्य द्वीपों को भोग- भूमि कहते हैं.

इसी तरह अगर शक्तिपीठों का भौगोलिक स्थिति देखे तो वे बलूचिस्तान से लेकर त्रिपुरा,कश्मीर से कन्याकुमारी / जाफना तक फैले हुए हैं यह एक बनावटी स्थिति नहीं है. इतना ही नहीं जब हम अपने घरों में पुजा अर्चना के दौरान संकल्प लेते है तो उस दौरान प्रयोग में लाया जाने वाला मंत्र भी यही कहता है, जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते। इस पंक्ति में मनुष्य के रहने के स्थान तथा उसके बारे में जानकारी दी जाती है जो पूजा करा रहा है.

इससे स्पष्ट होता है कि भारत भूमि 70 वर्ष पहले नहीं बल्कि हजारों वर्ष पुरानी है अंग्रेजों ने 1947 में इसी भूमि को 2 टुकड़ों में बाँट दिया था जिससे सभी को यह लगता है कि अंग्रेजों ने भारत को बनाया आधिकारिक तौर भारत का नाम “भारत गणराज्य” या “रिपब्लिक ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है.

संविधान के अनुच्छेद 1(1) में स्पष्ट लिखा है कि India, that is Bharat, shall be a Union of States. यह एक मात्र ऐसा अनुच्छेद है जो भारत के नाम के बारे में उल्लेख करता है इसी तरह 13 वीं शताब्दी के बाद, “हिंदुस्तान” शब्द का प्रयोग भारत के लिए एक लोकप्रिय वैकल्पिक नाम के रूप में किया जाने लगा, जिसका अर्थ है “हिंदुओं की भूमि”.

वेद संस्कृतिलेकिन जितने भी आक्रमणकारी भारत आए सभी एक अलग संस्कृति से थे इसलिए उन्होंने हमारी सनातन संस्कृति को “हिन्दू धर्म” कहने लगे तब से इस सनातन धर्म को हिन्दू धर्म के रूप में प्रचारित किया जाने लगा.

वास्तविकता देखें तो पता चलता है कि जो भी सिंधु नदी के पार रहते हैं वे सभी हिन्दू हैं और ये कोई संप्रदाय नहीं है अंग्रेजो ने जो लिखा वही लगातार पढ़ाये जाने से यह बात भारत के लोगों के मन में कि भारत को अंग्रेजों ने बानया है. अब लोगों को इन कपोलकल्पित इतिहास से ऊपर उठ कर वास्तविकता को जानना चाहिए और अपने महान मातृभूमि पे गर्व करना चाहिए.

 

 

साभार:

सूर्य वर्धन सिंह


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