भोपाल: मध्यप्रदेश की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। देवेंद्र चौरसिया हत्याकांड में पूर्व विधायक रामबाई के पति गोविंद सिंह सहित सात आरोपियों को दी गई आजीवन कारावास की सजा को हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि सत्ता के संरक्षण, राजनीतिक सौदेबाजी और प्रशासनिक शिथिलता की परतें खोलने वाला फैसला भी है।
यह हत्या कमलनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद हुई थी। उस समय प्रदेश में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था और कांग्रेस सरकार समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी तथा निर्दलीय विधायकों के समर्थन से टिकी हुई थी। इसी अंकगणितीय मजबूरी ने रामबाई जैसी विधायकों को सत्ता संतुलन का केंद्र बना दिया।
देवेन्द्र चौरसिया की निर्मम हत्या के बाद भी तत्कालीन कमलनाथ सरकार के दौरान मुख्य आरोपी गोविंद सिंह पर कोई ठोस और कठोर कार्रवाई नहीं हुई।
राजनीतिक मजबूरियों के चलते आरोपी का “बाल भी बांका नहीं हुआ”। अदालत से लेकर विधानसभा और प्रशासनिक स्तर तक ऐसा माहौल बना रहा मानो सरकार न्याय नहीं, बल्कि सत्ता की स्थिरता को प्राथमिकता दे रही हो। शिवराज सरकार में भी ढिलाई, उलटे मिली सुरक्षा सत्ता परिवर्तन के बाद उम्मीद की जा रही थी कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी लगभग एक वर्ष तक गोविंद सिंह सुरक्षित रहा। हैरानी की बात यह रही कि हत्या के आरोपी को पुलिस सुरक्षा तक उपलब्ध कराई गई, जिसने सरकार की नीयत पर और गहरे सवाल खड़े कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘जंगलराज’
जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तब जाकर सत्ता और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर खुली फटकार लगी। सुनवाई के दौरान- न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने गिरफ्तारी में देरी को “जंगलराज” करार दिया।
न्यायमूर्ति एम.आर. शाह ने टिप्पणी की कि “प्रदेश सरकार संविधान के अनुरूप शासन करने के काबिल ही नहीं है।” उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद ही मजबूरन गिरफ्तारी हुई और बाद में पुनः सुनवाई के दौरान पुलिस महानिदेशक को भी कड़ी फटकार लगाई गई। आंकड़ों की गिनती, सरकार गिराने–बचाने के खेल में रामबाई जैसे विधायक कांग्रेस और भाजपा—दोनों के लिए ‘खास’ बन गए।नतीजा यह हुआ कि हत्या का आरोपी दोनों ही सरकारों में राजनीतिक संरक्षण का लाभ उठाता रहा।
हुक्मरान बदले, हालात नहीं
इस पूरे घटनाक्रम से एक कड़वा सच सामने आता है- सत्ता कांग्रेस की हो या भाजपा की मुख्यमंत्री कमलनाथ हों या शिवराज न्याय और कानून तब तक कमजोर पड़ जाते हैं, जब तक सत्ता का गणित भारी रहता है।
हाईकोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा बरकरार रखना न्याय की जीत जरूर है, लेकिन यह फैसला यह भी उजागर करता है कि अगर शीर्ष अदालतें सख्ती न दिखाएं, तो प्रदेश में कानून किस हद तक राजनीतिक दबाव में कुचला जा सकता है। मध्यप्रदेश में चेहरे बदले, सरकारें बदलीं—लेकिन सत्ता का चरित्र और अपराधियों को मिला संरक्षण नहीं बदला।
डॉ. नवीन आनंद जोशी