एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम से जूझते पेरेंट्स, अध्यात्म से निकलेगा रास्ता..अतुल विनोद  

 एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम से जूझते पेरेंट्स, अध्यात्म से निकलेगा रास्ता..अतुल विनोद 
“मलाइका अरोरा” चर्चित अभिनेत्री पीड़ित हैं, “एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम” से..

जब ग्लैमर की दुनिया में रहने वाले पेरेंट्स इससे परेशान हो सकते हैं तो आम माता-पिता क्यों नहीं? मां-बाप के जीवन की कठोर सच्चाई है “एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम”|


आज के दौर में ज्यादातर मां-बाप की जिंदगी में वह समय आता है जब वह “एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम” का शिकार हो जाते हैं|यह वह स्थिति है जब मां-बाप दुख और अकेलेपन से गुजरते हैं| यह स्थिति तब बनती है जब उनके बच्चे पहली बार घर छोड़ते हैं| बच्चे कई कारणों से घर छोड़ देते हैं पढ़ाई या जॉब उनमे प्रमुख हैं|

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ज्यादातर बाप की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चों के पालन पोषण तक सीमित रह गई है| शुरुआती एजुकेशन मां-बाप के साथ होता है उसके बाद हायर एजुकेशन के लिए बच्चों को घर से दूर जाना पड़ता है| इस स्थिति में मां बाप उद्देश्यहीन हो जाते हैं| बच्चों से दूरी वे बर्दाश्त नहीं कर पाते| बच्चों से उनका इतना लगाव होता है उनके दूर जाने पर उन्हें चिंता सताने लगती है|

“एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम” कोई मानसिक बीमारी नहीं है। यह माता-पिता के “मन” की स्थिति है। जब बच्चे छोटे होते हैं तो मां अपना सारा समय बच्चों के आसपास ही बिताती हैं। बच्चे क्या चाहते हैं और क्या नहीं, यह देखने में मां पूरी तरह लीन रहती है। यदि वह एक कामकाजी महिला है, ज्यादातर गृहणियों के लिए बच्चों के अलावा कोई भाईचारा नहीं होता। 

ये बच्चे जब पहली बार पढ़ाई या नौकरी के लिए घर से बाहर जाते हैं तो मां को खालीपन महसूस होने लगता है। अपने बच्चों के इर्द गिर्द भटकती मां इस समय हताश और अकेली हो जाती है। मां या माता-पिता की इस स्थिति को एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम कहा जाता है।

ऐसा ही हाल बॉलीवुड एक्ट्रेस और ग्लैमरस मॉडल मलाइका अरोड़ा का देखने को मिला। मलाइका के बेटे अरहान पहली बार उन्हें पढ़ाई के लिए छोड़कर विदेश जाने का मौक़ा आया। मलाइका इस वक्त बेहद इमोशनल हो गई और उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर कर अपनी भावनाएं जाहिर की| इसमें उन्होंने अपनी और अपने बेटे अरहान की एक फोटो शेयर की। मलाइका इसमें जो कुछ भी कहती हैं, ऐसा विचार किसी भी मां के दिमाग में आ सकता है, जिसका बेटा पढ़ाई या नौकरी के लिए विदेश गया हो। 

अगर आपने कभी ऐसे अकेलेपन का अनुभव किया है, तो सबसे पहले याद रखें कि एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम कोई मानसिक बीमारी नहीं है। यह हर माता-पिता के मन की स्थिति है। अधिकांश माता-पिता को किसी न किसी समय इस अवस्था से गुजरना पड़ता है। अगर आप ज्यादा मानसिक परेशानी के बिना इस अवस्था से जल्दी बाहर निकलना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। 

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न केवल माता-पिता बल्कि बच्चे भी “खाली घोंसला सिंड्रोम” का अनुभव कर सकते हैं, कुछ शोधकर्ताओं ने कहा है। माता-पिता के बच्चे जिन्हें काम के लिए स्थायी रूप से घर से बाहर रहना पड़ता है, उन्हें यह मानसिक कष्ट हो सकता है। 

खाली घोंसला सिंड्रोम क्या है:

इस अवस्था में माता-पिता या बच्चे बहुत अकेलापन महसूस कर सकते हैं। उनके मन में यह भावना पैदा होती है कि जीवन में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। समय पर इससे बाहर न निकल पाने के कारण डिप्रेशन हो सकता है।

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम से बाहर निकलने के लिए:

अगर आप इससे जल्दी बाहर निकलना चाहते हैं तो आपको दिमाग में मजबूत करने की जरूरत है। आपका बच्चा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए घर से बाहर गया है। इसलिए माता-पिता को खुद को यह समझाने की जरूरत है कि अपने बच्चों के फैसलों का स्वागत करके खुश रहना जरूरी है। 

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- जीवन में पैदा हुए इस खालीपन को भरने के लिए आपको अपने शौक पूरे करने में समय लगाना चाहिए|

- सकारात्मक सोच ज़रूरी है। 

- बदलाव के लिए इस अवस्था से गुजरने वाले लोगों को एक दो दिन के लिए किसी पर्यटन स्थल पर जाना चाहिए, डॉक्टर भी इसकी सलाह देते हैं। 

- शुरुआत से ही अपने बच्चों को अपने आप से दूर रहने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए|

- मां-बाप खुद भी इस बात को लेकर प्रिपेयर रहें कि ऐसी स्थिति कभी भी बन सकती है जब उन्हें अपने बच्चों से दूर होना पड़े|

भारत में प्राचीन ऐसी मान्यता लड़कियों को लेकर रही है| बेटी के पैदा होते से ही मां-बाप यह मानकर चलने लगते थे कि बेटी पराया धन है| एक ना एक दिन उसे इस घर को छोड़कर जाना है| अब बेटा भी पराया धन होता जा रहा है| जैसे ही वह अपना एजुकेशन पूरा करता है उसके घर लौटने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती हैं| बहुत कम प्रतिशत बच्चे मां बाप के साथ आकर अपने कैरियर को उसी जगह पर सेटल करना पसंद करते हैं जहां उनके पेरेंट्स का घर है|

अध्यात्मिक दृष्टिकोण इस मामले में मदद कर सकता है| हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाथ|

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हम मृत्यु को भी उत्सव मानते हैं| वास्तव में कोई विदाई होती ही नहीं है| सनातन संस्कृति किसी की मृत्यु के बाद श्रद्धांजलि देने और शोक व्यक्त करने को गलत मानती है| वास्तव में ना तो कोई हमेशा हमेशा के लिए मिलता है नहीं हमेशा के लिए जुदा होता है| जो हमारे “आत्मिक समूह” का हिस्सा होता है वह हर हाल में हम से जुड़ा रहता है|

अध्यात्म २
आत्मिक समूह जीवात्मा जगत का वह समूह जिसके सदस्य(जीवात्माएं) आपस में मिल जुल कर रहती हैं| यह पृथ्वी पर बहुत करीबी बन कर जन्म लेती हैं| आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो आत्मिक ग्रुप के मेंबर्स कभी भी हमसे दूर नहीं रहते| ऐसे लोग हमारे मित्र रिश्तेदार परिचित आदि के रूप में हमें मिल ही जाते हैं| आत्मिक जीवात्मायें जो हमारे खून के रिश्ते में नहीं भी है तब भी वह आजीवन हमारे साथ रहती हैं|

यदि बच्चे हमारे आत्मिक ग्रुप के सदस्य हैं तो वह हमसे कभी दूर नहीं हो सकते| वो चले भी गये हैं तो भी आपके आत्मिक ग्रुप का कोई न कोई सदस्य आपके आसपास होगा जो आपको रस्ता दिखाता है, आपका भला चाहता है जिसकी मौजूदगी आपको अच्छी लगती है| वैसे भी अध्यात्म में मोह को बंधन का कारण बताया है|

यदि आप अकेले हैं तो अपना ध्यान अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करने पर लगाए| बच्चों का पालन-पोषण आपकी जिम्मेदारी थी क्योंकि किसी ने आप का भी पालन पोषण किया था|

अब आपको यह देखना है कि आप इस दुनिया में क्यों आए हैं? सृष्टि आपको इस जन्म के माध्यम से क्या सिखाना चाहती है? क्या वह अकेलेपन के माध्यम से आपको धैर्य सिखाना चाहती है? या आपको जन्म मृत्यु के वास्तविक स्वरूप को बताना चाहती है? हर जन्म के कुछ पाठ होते हैं जो जीवात्मा को सीखने होते हैं|

अतुल विनोद 

 


 

 

 

 

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