पुनर्जन्म का सबसे बड़ा प्रमाण है, इस प्रमाण को कोई नहीं झुठला सकता -दिनेश मालवीय

पुनर्जन्म का सबसे बड़ा प्रमाण है
इस प्रमाण को कोई नहीं झुठला सकता

-दिनेश मालवीय

पुनर्जन्म को लेकर अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग मान्यताएँ हैं. भारत में उत्पन्न तीनो धर्मों- सनातन, जैन और बौद्ध, में पुनर्जन्म को माना गया है. इस्लाम और ईसाई सहित अन्य धर्मों में इसे नहीं माना जाता.

मान्यताएँ अपनी जगह, लेकिन कुछ ऐसे तथ्य हैं जो पुनर्जन्म की अवधारणा की पुष्टि करते हैं. इससे जुड़े कुछ सवालों पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाये, तो बात बहुत स्पष्ट हो सकती है.

पहला सवाल यह है कि हर बच्चा अपने साथ कुछ प्रवृत्तियां लेकर जन्म लेता है. एक ही माँ-बाप के बच्चों की परवरिश एक ही माहौल में होती है. संस्कार भी एक जैसे ही डाले जाते हैं, उनका डीएनए भी एक ही होता है, फिर भी हर बच्चे का स्वाभाव और प्रकृति अलग-अलग क्यों होती है.

दूसरा सवाल यह है कि कोई बच्चा किसी ख़ास जगह, किसी ख़ास परिवार में और किन्हीं ख़ास स्थितियों में ही  क्यों पैदा होता है. हाल ही में मुकेश अम्बानी के यहाँ पोता हुआ, जो जन्म लेते ही खरबों की दौलत का हकदार हो गया. इसके विपरीत कुछ बच्चे ऐसे घर-परिवार में पैदा होते हैं, जहाँ खाने के भी लाले होते हैं.

Punarjanam

तीसरा सवाल यह कि एक ही स्कूल की एक ही कक्षा में एक की शिक्षक द्वारा एक विषय को पढ़ाने के बाबजूद सभी बच्चे एक सामान योग्य क्यों नहीं होते? उनकी ग्रहण क्षमता अलग-अलग क्यों होती है.

इस सब बातों का कोई पूर्व सम्बन्ध और सन्दर्भ अवश्य होना चाहिए.

मरने के बाद इंसान का क्या होता है? मरने से पहले वह कहाँ और क्या था? शरीर का अंत होते ही जीवन में सबकुछ समाप्त हो जाता है या यह किसी न किसी रूप में जीवित रहता है? इस तरह की बहस न जाने कब से छिड़ी हुयी है. जो लोग इस बात को मानते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति फिर से किसी न किसी रूप में जन्म लेते है, उनके ऐसा सोचने का एक बड़ा कारण उनके शास्त्रों का विवरण है. जो लोग ऐसा सोचते हैं कि पुनर्जन्म नहीं होता, उनकी इस सोच का आधार भी उनके धर्म-ग्रंथ ही हैं.

इस विषय पर बहुत कम लोग स्वतंत्र रूप से सोच-विचार कर उसे व्यक्त करने की हिम्मत जुटा पाते हैं. कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो तर्कपूर्ण दृष्टि से सोचकर इस निष्कर्ष पर पहुँच भी जाते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति का फिर से किसी न किसी रूप में जन्म होता है, लेकिन वह इस डर से उसे व्यक्त नहीं कर पाते कि उनके धर्म-शास्त्र में ऐसा नहीं लिखा है और अगर वह इसके विपरीत अपने निष्कर्ष को व्यक्त कर देंगे तो उन्हें बहुत परीशानियों का सामना करना पड़ेगा.

वैसे देखा जाय तो इस विषय में दोनों तरह की सोच रखने वालों में से अधिकतर के विश्वास का आधार उनके धर्म-शास्त्र ही हैं. यह बात सही भी है. बुजुर्गों ने कहा है कि जबतक आपको प्रत्यक्ष ज्ञान न हो जाए, तब तक शास्त्र ही प्रमाण हैं. लेकिन अधिकतर लोग उनमें जो बातें लिखी हैं, वे उन्हें पत्थर की लकीर मानते हैं. वे इस बात को भूल जाते हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान हो जाता है, वह जब कोई शास्त्र लिखता है या मौखिक रूप से कुछ कहता है, तब वह इस बात का खासतौर पर ध्यान रखता है कि उसको सुनने वाले कौन लोग हैं. यदि वह बहुत सूक्ष्म और गूढ़ बात कहेगा तो वे लोग समझ उसे भी पाएँगे कि नहीं. उनकी सोचने-समझने की क्षमता को देखते हुए ही वह बहुत-सी बातें कहने से रह जाता है. वह जानता है कि जब इनमें पर्याप्त समझ विकसित हो जायेगी, तो वे ख़ुद ही इस बात को समझ जायेंगे.

पुनर्जन्म के विषय में तो स्थिति बहुत नाजुक है. भारत में जन्में धर्म इस बात को एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुनर्जन्म होता है, जबकि जिन धर्मों की उत्पत्ति भारत के बाहर हुयी है, वे इसके विपरीत धारणा रखते हैं.

खैर, शास्त्रों की बातें अपनी जगह; आप एक छोटी-सी बात पर विचार करके देखिये कि बच्चा कुछ विशेष प्रवृतियाँ लेकर ही पैदा होता है. अपने आपको नास्तिक कहने वाले प्रसिद्ध लेखक और शायर जावेद अख्तर तक ने एकबार कहीं यह बात कही थी कि बच्चा कुछ प्रवृत्तियाँ अपने साथ लेकर पैदा होता है. हालाकि उन्होंने पुनर्जन्म की बात नहीं कही थी, लेकिन कोई उनसे ही पूछे कि ये प्रवृत्तियाँ आखिर आती कहाँ से हैं?

एक ही घर में, एक ही माता-पिता से अनेक संतानें होती हैं. सबकी परवरिश एक जैसी होती है. उनकी शिक्षा भी लगभग एक जैसी होती है. एक जैसे ही परिवेश में सब रहते हैं. लेकिन उन सबकी प्रवृत्तियाँ, सोच-समझ और बहुत-सी आन्तरिक बातों में इतनी भिन्नता होती है कि विश्वास नहीं होता कि ये एक ही माता-पिता की संतानें हैं. बालपन से ही किसीकी रुचि कुछ सीखने की होती हिया, कोई झगड़ालू होता है और बिना किसी बात के दूसरों से झगड़ता रहता है. किसीको बहुत क्रोध आता है, तो कोई बहुत शांत प्रकृति का होता है. किसीकी चाल अलग तरह की होती है, तो किसी के चहरे के भाव एकदम अलग होते हैं..

अलबत्ता, बड़े होकर बाहर के परिवेश का कुछ असर होने से इंकार नहीं किया जा सकता. कई लोगों का कहना है कि बच्चा जिस परिवेश में रहता है, उसी के अनुरूप उसका विकास होता है. लेकिन यह बात भी एक सीमा तक ही सही है. यह कहना बहुत ही असंगत है कि व्यक्ति का निर्माण परिवेश से ही होता है. बहुत ख़राब परिवेश में रहने वाले बच्चों को भी बहुत अच्छा बनते देखा जाता है और बहुत अच्छे परिवेश वाले बच्चों को बहुत अधम बनते देखा जाता है.

ऎसी स्थति में क्या बच्चे के स्वभाव, गुण-धर्म और व्यक्तित्व के पूर्वापर सम्बन्ध के विषय में स्वतंत्र रूप से नहीं सोचा जा सकता. शास्त्रों और ज्ञानियों द्वारा लिखी-कही गयी बातें अपनी जगह सही हैं. इसमें कोई विरोध नहीं है. लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि वे लोग श्रोताओं और पाठकों की सूझ-समझ और बौद्धिक क्षमता को ध्यान में रखकर बहुत-सी बातें छुपा जाते हैं और कई बातें इस तरह से करते हैं जिन्हें बेहतर समझ वाले ही समझ पाते हैं.

होने को तो ऐसे प्रमाणों की बातें भी बहुत सामने आयी हैं, जिनमें कोई बच्चा अपने पिछले जन्म के बारे में बताता है. अनेक बार इन बातों का गहरा परीक्षण किया गया और उनके सच होने का दावा किया गया. ऐसे सैंकड़ों उदाहरण देखने को मिलते हैं और मीडिया में आते ही रहते हैं. कुछ लोगों का तो दावा है कि उन्हें अपने अनेक पूर्व जन्म याद आते है. Brian L. Weiss की  “Many Masters Many Lives” नामक विश्वपसिद्ध पुस्तक इस विषय को समझने में बहुत मददगार सिद्ध हो सकती है. भगवान बुद्ध की जातक कथाएँ भी बहुत उपयोगी हैं.

लेकिन ये बातें अपनी जगह, हम सिर्फ जन्मजात प्रवृत्ति के तथ्य को ही पकड़कर उसपर मौलिक रूप से सोचें, तो हमें स्पष्ट हो जाएगा कि जन्म लेने वाले हरएक बच्चे का एक पिछला  जीवन रहा है और उसका उसके इस जीवन से सम्बन्ध है.  आप एक ही समय, एक ही ग्रह-नक्षत्र और मुहूर्त में जन्म लेने वाले दो बच्चों को अलग-अलग रखकर देख लीजिये. दोनों के व्यवहार और आचरण में आप बहुत अधिक अंतर महसूस करेंगे.

भारत के ऋषियों ने पुनर्जन्म की बात कोई वैसे ही तो नहीं कह दी. उन्होंने इसे अनुभव किया. वे लोग इस बात को कहने का साहस इसलिए जुटा पाए कि यहाँ के लोगों में इस सूक्ष्म विषय को समझने की क्षमता थी.

यह और बात है कि कोई तथ्यों को न समझने की कसम ही खाकर बैठा हो और “बाबा वाक्यं प्रमाणम” के सिद्धांत पर चल रहा हो, तो उसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. लेकिन जो भी इस विषय को समझना चाहते हैं, उनके लिए बच्चे की जन्मजात प्रवृत्ति के विषय पर मौलिक रूप से सोचना बहुत सहायक हो सकता है. इससे बढ़कर कोई बेहतर सबूत नहीं हो सकता.

dinesh


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