कर्म का ईश्वरीय नियम.. क्रियमाण, संचित कर्म और प्रारब्ध का विज्ञान … P ATUL VINOD

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हमारा पूरा सिस्टम एक्शन(क्रिया), एक्टिविटी(गतिविधि), प्रैक्टिस(अभ्यास) और वर्क(कार्य) बेस्ड है|हम “वर्क इज़ वरशिप” पर बिलीव करते हैं|गीता का कर्म का सिद्धांत भी “वर्क इज़ वरशिप”  ही नजर आता है| स्वामी रामसुखदास ने इस सिद्धांत की  विस्तार से व्याख्या की है|

जो लोग सरफेस(सतह) पर ही जीना चाहते हैं,  उनके लिए ये  फार्मूला फिट है|  “नो कन्फ्यूजन” जमकर काम करो, मेहनत, लगन, इमानदारी से  और  उससे मिलने वाले रिजल्ट के साथ खुशी से जियो| प्रोब्लम खड़ी होती है तब व्यक्ति मेहनत करने के बाद भी Proper और Expected रिजल्ट हासिल नहीं करता|  फिर वो कर्म के सिद्धांत को लेकर कंफ्यूज हो जाता है|

स्पिरिचुअलिज्म के रास्ते पर भी कर्म का ये फार्मूला फिट नहीं बैठता वहां भी डाउट क्रिएट हो जाते हैं|ये जो कर्म है  इसके पीछे गूढ़ विज्ञान है| ये सिर्फ  हमारे क्रिया (एक्शंस) और कार्य (WORK) तक सीमित नहीं है|“कर्म” कार्य, क्रिया से बहुत आगे जाता है| आज हम इस “कर्म” को थोड़ा डीपली समझने की कोशिश करेंगे|अध्यात्म की नजर से हम देखें तो हम दो ताकतों से मिलकर बने हैं, पहली ताकत हमारी चैतन्य है  जो दिखता नहीं और दूसरी ताकत  है  ये मैटर (प्रकृति) जो दिखती है|

ये चैतन्य अध्यात्मिक की दृष्टि में पुरुष है,  विज्ञान इसे गॉड पार्टिकल इनविजिबल मैटर या डार्क मैटर कहता है|दूसरी ताकत Normal  मैटर है,  उसे सनातन धर्म में प्रकृति  कहते हैं|साइंस कहता है कि हम “डार्क मैटर” और “नॉर्मल मैटर” से मिलकर बने हैं स्प्रिचुअल साइंस कहता है कि हम  पुरुष और प्रकृति से मिलकर बने हैं|अब ये जो इनविजिबल मैटर(पुरुष) है जिसे हम पुरुष कहते हैं वो कभी बदलता नहीं ,  वो दुनिया में हमेशा से था है और रहेगा|  यही पुरुष(चैतन्य),  गॉड पार्टिकल है और  नॉर्मल मैटर (प्रकृति) से मिलकर  जीव, जंतु और मनुष्य का निर्माण करता है|

पुरुष+प्रकृति =मनुष्य और अन्य जलचर, थलचर, नभचर ,पुरुष = परम आत्म तत्व, चैतन्य, गॉड पार्टिकल, डार्क मैटर,इनविजिबल मैटर, नार्मल मैटर, हिग्स बोसॉन, सूक्ष्म तत्व प्रकृति= नेचर,नोर्मल मैटर, भौतिक तत्व, मैसिव, जब भी नॉर्मल मैटर में गॉड पार्टिकल का प्रवेश होगा वो नॉर्मल मैटर एक लिविंग एंटिटी में तब्दील हो जाएगा|वो नार्मल मैटर निर्जीव से जीवित दिखाई देने लगेगा| क्यूंकि पुरुष के मिलने से उसमे मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आ गया|

वैसे तो  ये पुरुष(परमात्म तत्व, आत्मा, पुरुष) मूल रूप में अपरिवर्तनीय(Immutable) है लेकिन परिवर्तनशील(mutable) मैटर के संपर्क में आने से ये अपने मूल स्वभाव को भूल कर मैटर के साथ होने वाली गतिविधियों से अटैच हो जाता है|

पुरुष की प्रकृति के साथ मिलकर होने वाली क्रियाएं ही कर्म कहलाती हैं|“कर्म” अकेला क्रिया, एक्टिविटी, एक्शन या वर्क नहीं है| कर्म, कार्य(Work) और उसके साथ जुड़े भाव(feelings), मोह(attachment) और आकांक्षा (requirement, ambition, aspiration, desire, intention) का कॉम्बिनेशन है| अध्यात्म में कर्म को बंधन का कारण बताया गया है लेकिन कर्म से कैसे दूर रहा जा सकता है क्यूंकि जब तक शरीर है उसकी ज़रूरतें हैं|

इसका समाधान भी दिया गया है,  व्यक्ति जब अपने मूल स्वरूप,  चैतन्य को  जान ले और  कार्य और क्रियाओं डिटैच होकर, बिना  आकांक्षा (requirement, ambition, aspiration, desire, intentin) के करे तो वो फिर कर्म नहीं बनते| इसी को निष्काम कर्मयोग कहा जाता है| दरअसल हमे जो आज मिल रहा है वो उन क्रिया और कार्यों का नतीजा भी है जिन्हें हमने पहले कभी इस या पूर्व जन्म में इच्छा, मोह और आकांक्षा के चलते किया था|

ये वो फल है जो पहले स्टोर(संचित) हो चुके कर्म के कारण मिल रहा है| ये स्टोर्ड कर्म जब फल देना शुरू करते हैं तब उन्हें प्रारब्ध(fate,Predetermination, DESTINY, CHANCE)  कहा जाता है| प्रजेंट में हम जो भी क्रिया और कार्य इच्छाओं के कारण कर रहे हैं वे   भविष्य में फल देंगे| कर्म तीन प्रकार के हो गए पहले वो जो स्टोर रूम में रखे हुए हैं (संचित)| दूसरे वो  जो इस पर रूम से बाहर आकर  हमारी लाइफ को डायरेक्शन दे रहे हैं( प्रारब्ध) तीसरे वो जो हम प्रेजेंट में कर रहे हैं( क्रियामाण) |

अब जो प्रजेंट में हम कर रहे हैं उनके ऊपर जो स्टोर रूम में रखे हुए कर्मफल  हैं उनका असर पड़ रहा है, ये जो असर है यही संस्कार हैं,  संचित कर्मफल के कारण ही संस्कार बनते हैं|  घर में जैसे लोग रहते हैं वैसे ही उस घर का अत्मोस्फियर होगा ऐसे ही व्यक्ति  में जैसे कर्म फल रह रहे हैं वैसे ही संस्कार रुपी वाइब्रेशन होंगे|संस्कारों का असर हमारे कामों पर दिखाई देता है|  दूसरा जो संचित “कर्म” फल देने लगे हैं वो RESULTS  हमारे वर्तमान कर्म को प्रभावित कर रहे हैं  अच्छी और बुरी परिस्थिति के रूप में सामने आ रहे हैं|  हमारे कर्म पर देश, काल और परिस्थिति का भी प्रभाव पड़ रहा है|

जैसे वर्तमान में पूरी दुनिया  कोरोनावायरस से  जूझ रही है तो  ये काल हमारे कार्य पर असर डालेगा,  इस काल में देश की स्थिति और परिस्थिति भी हमारे कार्य पर प्रभाव डालेगी|जो कर्म हम करेंगे या कर रहे हैं  उन कर्मों का  हल हमें  तुरंत दिखाई देगा | जैसे हमने रेस्टोरेंट में अच्छा खाना खाया तो तुरंत हमें उसका स्वाद फल के रूप में मिलेगा|  इस खाने का  कुछ “कर्म फल” स्टोर रूम में सेव हो जाएगा|  समय आने पर वो फल बाहर आ जाएगा और हमारी जिंदगी को प्रभावित करेगा|  किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती करने पर उसके तात्कालिक फल मिलते हैं वो अच्छा है या बुरा इसके आधार पर उस कर्म के फल हमारे स्टोर रूम में भी संचित हो जाएंगे|

स्टोर रूम में सेव हो चुके कर्मफल प्रारब्ध के  रूप में या तो इसी जिंदगी में सामने आ जाएंगे या अगले किसी जन्म में वो सामने आयें|ये कर्म फल ऊर्जा के रूप में संचित होते हैं|  जब हम दुनिया छोड़ते हैं तो यही कर्मफल  जिस तरह की ऊर्जा के रूप में होंगे आत्मा उसी तरह का गर्भ प्राप्त करेगी क्यूंकि ये उर्जा आत्मा के साथ ही रहते है|

मृत्यु के आत्मा के साथ बची रहने वाली ऊर्जा का हमारा स्तर ही हमारे अगले जन्म में मिलने वाली  अमीरी और गरीबी का निर्धारण करता हैं|यदि ऊर्जा का स्तर साधारण से बहुत ऊपर है तो हो सकता है कि अगला जन्म किसी और अच्छे लोक  में हो|जिन कर्मों का फल हमने इसी जन्म में भोग लिया है, उनकी संचित ऊर्जा भोगने के साथ साथ ही न्यूट्रल होती चली जाती है|हमारा जो स्वभाव है वो हमारे संचित कर्म फलों के संस्कार के कारण ही है|  संस्कार हमारे कर्म फल से पैदा हुआ इफेक्ट है जो हमारी लाइफ पर लगातार असर डालता है|

जब हम कहते हैं कि कर्म ही सब कुछ है तब हम ये भूल जाते हैं कि कर्म भी हमारे प्रारब्ध, संस्कार,  संचित कर्म,  देश, काल और परिस्थिति पर डिपेंड करता है ये सब मिलकर “ऊर्जा का स्तर” वाइब्रेशनल फ्रिकवेंसी का निर्माण करते हैं|यानी हम कर्म करने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं|  हम वही कर्म कर सकते हैं जो हमारे ऊर्जा के स्तर से मैच करता हो|दिखने में लगता है कि हम कर्म करने में स्वतंत्र हैं और ऐसा है भी लेकिन इस स्वतंत्रता के बावजूद हमारे ही कर्म फल इस स्वतंत्रता में  प्रभाव डालते हैं|हमारे कर्मों पर हमारे नेचर यानी हमारी प्रकृति का असर पड़ता है ये प्रकृति शुद्ध भी हो सकती है और अशुद्ध भी|  ईश्वर की शरण, परमात्मा की भक्ति और कृपा हमारे स्वभाव (नेचर) को शुद्ध बना सकती है|
हमें कर्म करने में और ज्यादा स्वतंत्रता दे सकती है| जब स्वभाव शुद्ध  हो जाता है तो फिर व्यक्ति अपने लिए कर्म नहीं करता उसके हर कर्म में ईश्वर की बनाई दुनिया के प्रत्येक जीव जंतु का भला छुपा होता है| उसकी सोच यूनिवर्सल हो जाती है|  तब वो देश काल और परिस्थिति से उतना प्रभावित नहीं होता जितना सामान्य व्यक्ति| जो संचित कर्म है वो दो रूप में सामने आते हैं प्रारब्ध और संस्कार|प्रारब्ध दिशा तय करते हैं,  अच्छी बुरी परिस्थिति देते हैं,  संभावनाओं को उज्जवल या खराब बनाते हैं और संस्कार के कारण मोटिवेशन या डीमोटिवेशन आता है| कर्मों का फल  परिस्थितियों( Circumstance) के रूप में सामने आता है|

जैसे हजारों युवा एक ही नौकरी के लिए आवेदन करते हैं लेकिन उनमें से सक्सेस कुछ भी हो पाते हैं|  सक्सेसफुल लोगों  की सफलता में  उनको मिली अच्छी परिस्थितियां भी शामिल हैं| अच्छी परिस्थितियों में उन्हें मिला अच्छा स्वास्थ्य,  अच्छा मन और मस्तिष्क और स्वस्थ आत्मा भी इंक्लूडेड है|जब हम प्रारब्ध  के कारण मिली हुई परिस्थिति को सब कुछ मान लेते हैं तो हम सुख और दुख का शिकार हो जाते हैं|

परिस्थिति हमेशा एक सी नहीं रहती यदि आज परिस्थिति खराब है तो हम अपने आज के अच्छे कर्मों से भविष्य में उसे बदला हुआ पाएंगे| लेकिन हमें धैर्य और भरोसा रखना पड़ेगा| जो मिला है उसको एक्सेप्ट करना पड़ेगा और जो चाहिए उसके लिए उस तरह के कर्म करना | अपने भाग्य के निर्माण के लिए आज किए गए प्रयत्न, कोशिशें, लगन, मेहनत, ईमानदारी, मिलकर पुरुषार्थ कहलाते हैं|

पुरुषार्थ ही हमारे हाथ में है| प्रारब्ध का जो असर हमारे पुरुषार्थ पर पड़ रहा है उसको पढ़ने  देना, उस पर ध्यान न देना और लगे रहना  यही हमारे वश में है|हम सब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करते हैं|  कई बार ये बिना पुरुषार्थ किए ही मिल जाते हैं| दरअसल हम इसके लिए पुरुषार्थ या कर्म कर चुके होते हैं और हमें अपने स्टोर कर्मफल  के कारण इन चारों  का लाभ मिलता है| हमारा शरीर सुख और दुख भोगने के लिए नहीं है|  वी आर नॉट हियर टू फेस ट्रबल्स एंड हैप्पीनेस|

मनुष्य के अलावा भी और  प्रजातियां हैं जहां हम सुख और दुख भोगते हैं| मनुष्य का शरीर तो अच्छे कर्म का निर्माण करते हुए ऐसी अवस्था तक पहुंच जाना है जहां सारे कर्म ईश्वर की इच्छा से होने लगे और खुद उन कर्मों से अलग होकर कर्मों के फल को स्टोर करना बंद कर दें| कर्म फल से मुक्ति और नए कर्म फल स्टोर न होने देने से आत्मा हर तरह की उर्जा से मुक्त हो जाती है| न सुख की इच्छा न दुख का त्याग| दुख को भी सहज रूप से झेलना ताकि हमारे स्टोर कर्मों के फल न्यूट्रल हो जाए| सुख की इच्छा का त्याग ताकि नए कर्म फल, संस्कार का निर्माण ना हो|

सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर छोड़कर उसकी विधि और व्यवस्था से स्वाभाविक होने वाले कर्मों में सहज रूप से लगे रहना और अपने जीवन को अंत समय तक सभी तरह की ऊर्जा से मुक्त कर आत्मा को शुद्ध बुद्ध मुक्त रूप में ले आना इस जीवन का लक्ष्य है| इस स्थिति में भी कर्म होंगे लेकिन आप माध्यम होंगे इनसे आत्मा पर उर्जा नही चढ़ेगी| करने वाले आप होंगे लेकिन कराने वाला वो परमात्मा|

एक बहुत इंटरेस्टिंग बात है जब हम अच्छे कार्यों को भगवान की इच्छा मानकर उसे समर्पित कर देते हैं तो अच्छे कार्य के फल या ऊर्जा न्यूटन हो जाती है लेकिन हमारे बुरे कार्य भगवान को समर्पित नहीं होते उनकी ऊर्जा भगवान को समर्पित करने के बाद भी न्यूट्रल नहीं होती|  वो ऊर्जा बुरे कर्मों के फल को भोगने से ही खत्म होती है|

हमारे बुरे कर्मों के फल हमें खुद ही भोगने हैं| यदि हम परिवार, मित्र, समाज के लिए बुरे कर्म कर रहे हैं तो हम गलतफहमी में है| हम किसी और के लिए  भी बुरे कर्म करे तब भी उसका फल हमें ही भोगना पड़ेगा क्योंकि कर्ता हम हैं वो नहीं|हमारे वर्तमान के गलत आचरण के कारण पैदा हुई बीमारियां रोग दोष पीड़ायें, आचरण को ठीक करने से दूर हो जाती है|  लेकिन यदि हमारी बीमारियों के पीछे कारण यदि प्रारब्ध है तो बीमारियां ठीक आचरण के बाद भी तभी खत्म होंगी जब वो पूरी तरह से भोग ली जाएंगी|

हमारी उम्र भी प्रारब्ध के कारण तय होती है| आकस्मिक मृत्यु का कारण भी प्रारब्ध ही है|सृष्टि का  क्रम परमात्मा के विधान के अनुसार कर्म और कर्म फलों के अनुसार चलता जाता है| मनुष्य के अलावा अन्य योनियों में सहज रूप से ईश्वर की व्यवस्था के मुताबिक अपडेशन और अपग्रेडेशन होता रहता है|  मानव के मामले में उसके उत्थान और पतन में उसके कर्म का बहुत बड़ा योगदान रहता है|

भगवत गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं जो व्यक्ति समता में स्थापित हो जाता है वो श्रेष्ठ हो जाता है,  समता में स्थित होने का मतलब ये है कि खुद की तरह दूसरे लोगों को भी समान मानना उनके सुख दुख को भी अपना सुख दुख मानना|दूसरों को सुख देने की प्रबल इच्छा होना, सिर्फ अपने चाहने वाले नहीं| जो ना चाहने वाला हो उसे भी समान रूप से सुख देने की इच्छा समता का परिचायक है| जिसमें सब के हित  की प्रीति हो गई उसे भगवान मिल गया|जैसे हम अपने शरीर के अलग-अलग अंगों से अलग-अलग व्यवहार करते हुए भी उन सबसे समान रूप से प्रेम रखते हैं ऐसे ही अलग-अलग लोगों से अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हुए भी उन सब से समान रूप से  प्रेम करना ही समता है|

 

 

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