श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के असली महानायक

एक अप्रत्रिम योद्धा स्व राजेन्द्र सिंह

Rajendrasingh-newspuran-03अयोध्या नगरी में प्रभू श्रीराम का भव्य राम मंदिर बनना प्रारंभ हो पाया है तो इसमें अहम योगदान स्व. राजेंद्र सिंह जी का है। उन्होंने हाईकोर्ट में जो सुबूत प्रस्तुत किए थे, वे मंदिर के पक्ष में निर्णय देने का बेस बने। बहुत सरल से दिखने वाले स्व. राजेंद्र सिंह ने अथक मेहनत से इतनी बौद्धिक प्रतिभा अर्जित कर ली थी कि वो कोर्ट में श्रीराम जन्मभूमि के लिए अत्यंत ऐसे प्रमाण प्रस्तुत कर सके और वह भी बिना किसी ऑर्गनिसशनल सहायता के।

वरिष्ठ पत्रकार गुंजन अग्रवाल के मुताबिक भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की जड़े बहुत गहरी थीं। इसी समर्पण के वशीभूत होकर वे रामजन्मभूमि विवाद से जुड़ गये थे। इस विवाद की हियरिंग के लिये जब लखनऊ में एक खास न्यायपीठ का गठन किए गया तो राजेन्द्र सिंह बिना किसी के कहे खुद तैयार हो, एक व्यक्ति के रूप में मंदिर के पक्ष में आईविटनेस बनने लखनऊ पहुँच गए। चूँकि वे किसी संगठन या मामले के पक्षकार द्वारा पेश नहीं किए गए थे, इसलिए न्यायालय ने पहले उनकी परीक्षा ली कि उनके पास गवाही देने लायक कुछ है भी या नहीं।

कोर्ट ने उन्हें इसके लिए उपयुक्त पाया और फिर वे अपना बोरिया बिस्तरा लेकर रामजन्मभूमि न्यास के लखनऊ ऑफिस में जम गए। बकौल गुंजन अग्रवाल वे लगातार अध्ययन करके गवाहों के लिये तथ्य खोजते और नये गवाहों को तैयार व प्रशिक्षित करते।
इसके एवज में उन्होंने अपने लिए कुछ भी चाहा नहीं, न धन न पद और न यश मान प्रतिष्ठा । इसके लिए अपने परिवार की उन्होंने कभी चिन्ता नहीं की।

राजेंद्र सिंह जी श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति-आन्दोलन के महत्वपूर्ण गवाह और अनुवादक थे। राम मन्दिर-मामले में मन्दिर के पक्ष में  उर्दू और  फ़ारसी के मौजूद पन्नों का उन्होंने अनुवाद करके  विश्वहिंदूपरिषद् के आन्दोलन को ताकत प्रदान की। लगभग 16 साल पहले दिनांक १-१२-२००४ को (तब वे जीवन के ६०वें वर्ष के थे) को उनकी गवाही का क्रास एग्जामिनेशन हुआ था। यह क्रास एग्जामिनेशन प्रति परीक्षण, उनके ऐतिहासिक तथ्यों के विश्वसनीय अहम जानकार होने का अदालती सत्यापन था।

उन्होंने १० प्रमुख सिक्ख ग्रंथों के आधार का शपथ देते हुए कहा था, " इन ग्रंथों से प्राप्त जानकारी से पूर्णतः तय व प्रमाणित होता है कि विवादित भूमि श्री राम चंद्र जी की जन्म स्थली है।

सिख गुरु श्री गुरुनानकदेव जी ने अयोध्या जाकर श्री रामजन्मभूम मंदिर के दर्शन किये थे। वहीं इन्ही ग्रंथों से यह भी प्रमाणित होता है कि आगे चलकर श्री  गुरुतेगबहादुर और उनके पुत्र श्री  गुरुगोविन्द_सिंह ने भी अयोध्या जाकर श्री राम जन्म भूमि के दर्शन किये थे"।

Rss के प्रमुख विचारपुरुष रहे स्व. देवेंद्र स्वरूप राजेंद्र सिंह जी के बारे में लिखते हैं, “श्री राजेन्द्र सिंह से मेरा introduction करीब 40 वर्ष पूर्व 1980 में प्रारम्भ हुआ जब मैं दीनदयाल शोध संस्थान में बैठता था और राजेन्द्र सिंह वहां मिलने आया करते थे। मेरे लिए उनके आकर्षण का कारण उनकी ज्ञान पिपासा थी। इस ज्ञान की चाह की प्रेरणा उन्हें कहां से प्राप्त हुई, यह मै कभी नहीं समझ पाया। फरीदाबाद जाकर उनके फेमिली परिवेश को देखने का मौका मिला और उनके जीविकार्जन की साधन कार्यशाला को भी देखा। वहां कार्यशाला मात्र एक बढ़ई की शॉप थी। ऐसे परिवेश में पैदा हुए, जन्मे-बढ़े राजेन्द्र सिंह में पुराणों, वेदों, स्मृतियों आदि प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों को पढ़ने की भूख कैसे जगी, यह मेरे लिये एक पहेली बनी रही। यह ज्ञान-पिपासा ही उन्हें मुझसे मिलाने की वजह बनी। उनकी वेशभूषा, पहनावा, रहन सहन आदि में बौद्धिकता का कोई आवरण नहीं था। पर जब वे बहस करते तो उनके गूढ़, अगाध अकाट्य ज्ञान-भंडार की परतें खुलने लगतीं। अपने सीमित साधनों में से पाई पाई बचा कर उन्होने अनेक पुस्तकों का भंडार बटोरा। पुस्तक-संग्रह का मानस ही उन्हें मेरे पास खींच लाया और यही हम लोगों की वार्तालाप का मुख्य विषय रहता।”

जानेमाने ज्योतिषी और वैदिक ज्योतिष पंचांग के निर्माता आचार्य दार्शनेय लोकेश लिखते हैं, “अद्वितीय याददाश्त शक्ति, इतिहास के विन्दुओं पर बहुत ही बारीक सुलझी समझ, मोती से सजावट के साथ रखे अक्षरों वाला बहुत सुन्दर हस्तलेख, तथ्यों का भ्रम रहित ज्ञान उनकी बहुत बड़ी विशेषताओं में से रहे हैं। वे मेरे पंचाङ्गिक कार्य के समर्थक ही नहीं सहयोगी व मार्गदर्शक भी थे। वैदिक पंचांग के अपने कार्य साधन हेतु देश के जिन छः लोगों के मैं सतत कॉन्टेक्ट में बना रहता हूँ उनमे से वे एक खास थे। प्रारम्भ में मुझ से बोले कि मुझे आपके पञ्चाङ्ग को देखने में किंचित असुविधा हो रही है। उनके विराट ब्यक्तित्व की यह एक एक प्रेरणा दायक झलक है।“

एक इतिहास लेखक के रूप में उनकी लाइफ जर्नी १९६७ से शुरू हुयी थी। 'शाश्वत वाणी' में प्रकाशित 'आर्यों का भारत आगमन -एक भ्रांत धारणा' उनके जीवन का सबसे पहला आर्टिकल है।

सिक्खइतिहासमेंश्रीरामजन्मभूमि' जैसी किताब लिखकर उन्होंने ब्रिटिश व वामपंथी इतिहासकारों को आईना दिखाया था। श्री राजेन्द्र सिंह न सिर्फ इतिहासकार, बल्कि एक जीवन्त विश्वकोश थे।प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक कालक्रम उनका पसंदीदा विषय था और इस विषय पर उन्होंने हजारों पृष्ठ लिख छोड़े हैं।

महाभारत और पुराणों में दिए घटनाक्रम को कालबद्ध और लिपिबद्ध करने में उन्होंने उल्लेखनीय प्रयास किया था। इसी प्रकार सिख-इतिहास पर भी उनकी जोरदार पकड़ थी। इसके अलावा वह इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी-इतिहास के भी वह बड़े भारी मर्मज्ञ थे। कुरआन, हदीस और बायबल पर उनकी व्याख्या अच्छे-अच्छे इस्लामी चिंतकों पर भारी पड़ती थी।

 


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