जब अंग्रेजों ने किया कपड़ा उद्योग पर कुठाराघात … भाग 3

आज़ादी की लड़ाई का तीसरा पड़ाव…

जब अंग्रेजों ने किया कपड़ा उद्योग पर कुठाराघात …

भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 3

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अंग्रेजों के हितों के लिए भारतीयों की बलि चढ़ाने का जीता जागता उदाहरण भारतवासियों ने तब देखा जब अंग्रेजों ने उभरते हुए भारतीय कपड़ा उद्योग की कीमत पर अपने फल-फूल रहे सूती कपड़ा उद्योगों को बचाने की कोशिश की। वह कुछ इस तरह हुआ था, जब अंग्रेज व्यापारी के रूप में आए थे तब भारतीय सूती कपड़ा पूरे संसार में प्रसिद्ध था, फलतः भारतीय कपड़ा उनके व्यापार की एक महत्वपूर्ण चीज बन गया था। परन्तु औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप ब्रिटेन में भी बड़े पैमाने पर कपड़ा तैयार होना शुरू हो गया। शीघ्र ही अंग्रेज निर्माता अपने देश में भारतीय कपड़े के आयात के विरुद्ध हो गये। उन्होंने ब्रिटिश लोकसभा पर जोर डालकर इस तरह के कानून पारित करवा लिये जो भारतीय कपड़ा व्यापार को नष्ट कर दें। वे अपने उद्देश्य में प्रमुखता के साथ सफल हुए। 19वीं शताब्दी के शुरुआत के दशकों से उन्होंने भारत को कपड़े का निर्यात करना शुरू कर दिया और इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को एक जोरदार घक्का पहुंचाया। साम्राज्यवादी शासकों के मन में व्यापार करने के संबंध में जो विचार था वह इस तरीके का था कि भारत उत्पादन न करे और कच्चा माल निर्यात करे तथा तैयार माल आयात करे। वास्तव में यह वह तंत्र था जो भारत के शोषण को सुनिश्चित करता था।

यह हाल इस शोषण की चरम सीमा में पश्चिमी भारत में सूती कपड़ा उद्योग की आधारशिला भी 19वीं शताब्दी आठवें दशक में इस उद्योग का पर्याप्त रूप से इतना विकास हो गया था कि वे मेनचेस्टर के बड़े उद्योगपतियों के लिए खतरे की घण्टी सरीखा हो गया था। इन्होंने अब यह शिकायत करनी शुरू की कि भारत में उन्हें जो आयात शुल्क देना पड़ रहा है वह न्यायपूर्ण नहीं है। वह न्यायपूर्ण नहीं था क्योंकि वे मुक्त व्यापार सान्ता के विपरीत था। वे भारतीय सूती कपड़ा उद्योग की रक्षा करने वाला प्रतीत होता था। यह स्थिति होने के कारण मेनचेस्टर के बड़े उद्योगपतियों ने भारत में आयात शुल्क को समाप्त करने की मांग की।

इसके विरुद्ध भारतीय इस शुल्क को बनाये रखना चाहते थे उनका तर्क था कि भारतीय कपड़ा उद्योग अब भी शैशावस्था में है। यह ऐसा समय है जबकि इसे देश के शासन से सहायता और सुरक्षा की एक सीमा तक आवश्यकता है।

आखिरकार अंग्रेजों को अपने खुद के उद्योग को उसके शुरू के समय में क्रत्रिम रूप से सुरक्षा देनी पड़ी और इस प्रक्रिया ने फल-फूल रहे भारतीय कपड़ा उद्योग को नष्ट कर दिया कुछ भारतीय यह बात तक कहते थे कि आयात शुल्क के संबंध में शासन की कार्यवाही यह प्रदर्शित करेगी कि भारत उसके खद के लोगों के कल्याण के लिए शासित किया जाता है या कि अंग्रेजों के हितों के लिए। शीघ्र ही बाइसरॉय लिटन ने इनमे से कुछ शुल्क को समाप्त कर दिया और भारतीयों को अंग्रेजी शासन की सच्चाई प्रकट करके बता दी।

यह सच्चाई कुछ और तरीकों से भी उजागर हुई। आयात शुल्क को हटा देने का अर्थ केवल नवजात सूती कपड़ा उद्योग को धक्का पहुँचाना ही नहीं था उसका मतलब राजस्व में उस समय क्मी लाना था जबकि उस कमी का वहन करना लिए संभव नहीं था। देश के बड़े हिस्सों में उस समय अकाल फैला हुआ था और लोग भूख से मर रहे थे. इस वजह से शासन को भारतीयों पर अतिरिक्त कर लगाने पर बाध्य होना पड़ा। ऐसे संकट के समय शासन को आयात शुल्क में कटौती कर अपने राजस्व को कम करना पड़ा और यह कार्य मेनचेस्टर के धनी उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया था।

 

 


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