मध्य प्रदेश के आदिवासियों के खेल, कितने रोचक हैं यह खेल…. 


स्टोरी हाइलाइट्स

खेल देखने वाले भी उन्हीं की जनजाति के लोग होते हैं और खिलाड़ी भी वे ही होते हैं। विवाद की स्थिति तो कभी नजर आती ही नहीं है। जनजाति के लोगों में खार-पाट, घुघामाल, ढुकढुकणियां, आवली-पोपली के अलावा सोलह सार, अरी-दुरी तिरी चंगा इनके प्रमुख खेल होते हैं।

जाने इन अनोखे खेलों के बारे में...

Ancient tribal sports Tribal sports 

आदिवासियों के खेल: आदिवासी समाज के भी अपने खेल होते है। उनके इस खेल में सच्ची खेल भावना और ईमानदारी की झलक दिखाई पड़ती है। इनके खेल में न तो कोई रैफरी होता है और न ही कोई इसका आयोजक। इनके खेल में अपनी परंपरा और जाति का निर्वाह दिखाई पड़ता है। 

खेल देखने वाले भी उन्हीं की जनजाति के लोग होते हैं और खिलाड़ी भी वे ही होते हैं। विवाद की स्थिति तो कभी नजर आती ही नहीं है। जनजाति के लोगों में खार-पाट, घुघामाल, ढुकढुकणियां, आवली-पोपली के अलावा सोलह सार, अरी-दुरी तिरी चंगा इनके प्रमुख खेल होते हैं।

खार-पाट: यह खेल कबड्डी का ही दूसरा रूप कहा जा सकता है। इसमें दोनों टीमों में नौ-नौ खिलाड़ी होते हैं। कबड्डी की ही तरह मैदान होता है, जिसमें मैदान के बीच में एक रेखा खींचकर चार आड़ी रेखाएं खोच जाती है। खिलाड़ी संकेत पाते ही दूसरी टीम के खिलाड़ी को छकाते हुए उन्हें छूने का प्रयास करता है, वह खिलाड़ी टीम के मैदान से मिट्टी उठाता है और मध्य रेखा पार करते हो अपने मैदान में आने पर जोर से वह खार बोलता है। 

उसके खार बोलने का आशय यह होता है कि दूसरे के मैदान से वह मिट्टी ले आया है। इस खिलाड़ी की फुर्ती देखते ही बनती है। हार-जीत का फैसला इस बात पर निर्भर होता है कि किस टीम का खिलाड़ी कितनी बार मिट्टी लेकर आया है। जो ज्यादा बार मिट्टी लाता है वह टीम विजयी होती है। 

घुघामाल: आदिवासियों में घुघामाल खेल काफी लोकप्रिय है। यह खेल चांदनी रात में गांव के जवानों द्वारा खेला जाता है। इसमें दो दल होते हैं। गांव के बैलों की कद-काठी और रंग से वे सभी परिचित होते हैं। खेल में किसी विशेष व्यक्ति के बैल का हुलिया, एक दल द्वारा पूर्व निर्धारित होता है। वह दल बेचवाल होता है और दूसरा दल सेवाल। गांव के बाहर खुले में इन दोनों दलों के बीच सवाल-जवाब होते हैं। इसमें विक्रेता पक्ष उस व्यक्ति का नाम पूछता है जिसके पास ऐसा बैल होता है, अगर दूसरा पक्ष सही नाम बता देता है तो ठीक नहीं तो विक्रेता पक्ष जोर से चिल्लाकर नहीं कहता है और दौड़ पड़ता है। 

दूसरा पक्ष उसे छूने के लिए एक फलॉग तक दौड़ता है और उसे छूने का प्रयास करता है। नहीं छूने पर यहां कुछ देर रुककर पुन: वही सवाल पूछा जाता है, नहीं बताने पर यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। तीसरा क्रम भी कुछ पहले क्रम की तरह होता है। इसके बाद भी अगर नाम नहीं बताया जाता है तो विक्रेता दल उसी स्थान पर दौड़ता हुआ लौटता है जिस स्थान से यह प्रक्रिया शुरू हुई थी। वहां वापस आकर कोई पेड़ या पत्थर का निशान होता है जिसकी रक्षा क्रेता दल का एक सदस्य करता है, जिसे चकमा देकर विक्रेता दल का सदस्य यदि निशान को छू लेता है तो वह दल विजेता हो जाता है।

बुक काणिया: इस खेल में स्थान की लंबाई-चौड़ाई के अनुसार कितने भी खिलाड़ी शामिल हो सकते हैं। एक खिलाड़ी दाम देता है, जो अन्य खिलाड़ियों को छूने का प्रयास करता है। अन्य खिलाड़ी पानी में डुबकी मारकर इधर-उधर हो जाते हैं। इस बीच यदि वह खिलाड़ी तैरकर किसी को छू लेता है तो दाम उस खिलाड़ी पर आ जाता है। पशु चराते वक्त बालक यह खेल घंटों तक खेला करते हैं।

आंवली-पीपली: यह खेल गांव के बाहर पेड़ों पर खेला जाता है। इस खेल में पेड़ के नीचे एक गोला बनाया जाता है उस गोले में खड़ा होकर एक खिलाड़ी अपनी टांग के नीचे डंडा फेंकता है जिस खिलाड़ी पर दाम होता है वह दौड़कर डंडा लाने जाते हैं। इस अवधि में सभी खिलाड़ी तेजी से पेड़ पर चढ़ जाते हैं। 

दाम वाला खिलाड़ी डंडे को लाकर गोले में रख देता है। अब वह डंडे की रक्षा करते हुए पेड़ पर चढ़े खिलाड़ियों में से किसी को छूने का प्रयास करता है। इसी बीच पेड़ से कूदकर दूसरे खिलाड़ी डंडे को छूने का प्रयास करते हैं। इस प्रयास में अगर दाम देने वाले खिलाड़ी को कोई छू लेता है तो यही क्रिया दोबारा अपनाई जाती है। जब तक कि दाम देने वाला खिलाड़ी किसी अन्य को नहीं छू लेता। जब वह किसी को छू लेता है तो उस खिलाड़ी को दाम देना पड़ता है।

इस तरह आदिवासियों के कई और अन्य खेल भी होते हैं जो मनोरंजन के लिए खेले जाते हैं। बारिश के समय घर में मनोरंजन के लिए ये सोलह सार, अरी दुरी-तिरी-चंगा का खेल खेलते हैं। क्षेत्र चाहे बदल जाये मगर इनके खेल प्राय: समानता लिए होते हैं। बच्चों के अलावा युवा और बुजुर्गों में इन खेलों के प्रति अपनी आस्था है, अपना रुझान होता है।


 

पुराण डेस्क

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