भोपाल: कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी एक परिचय में समा ही नहीं सकता। वे केवल अधिकारी नहीं होते, केवल वैज्ञानिक नहीं, केवल साहित्यकार नहीं—वे अनुभवों का चलता-फिरता विश्वकोश होते हैं।
ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व हैं आर.पी. राजू—पूर्व सलाहकार एवं डिप्टी जनरल मैनेजर, न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया; पूर्व ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी, स्टेट इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट, महाराष्ट्र पुलिस मुख्यालय, मुंबई।
इन दिनों भोपाल आए आर.पी. राजू एक साहित्यिक कार्यक्रम में सहभागिता के लिए पहुँचे। इसी अवसर पर इस प्रतिनिधि से विशेष चर्चा में उन्होंने अपने जीवन के वे अध्याय खोले, जहाँ मौत, मशीन, मंत्र और मानवीय संवेदना—सब एक साथ मौजूद रहे।
प्रश्न: आपने मुंबई में बम डिस्पोजल जैसे अत्यंत जोखिम भरे कार्य को लंबे समय तक अंजाम दिया। उस दौर को कैसे याद करते हैं?
आर.पी. राजू: बम डिस्पोजल ऐसा काम है, जहाँ एक सेकंड का निर्णय जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा खींच देता है। मुंबई बम कांड के समय जो प्रशिक्षण मुझे डिस्पोजल और डिटेक्शन के हाईएस्ट कोर्स में मिला था, वही उस समय काम आया।
ख़तरा हर पल था, लेकिन विश्वास भी उतना ही गहरा—ईश्वर की कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद में। शायद वही कारण है कि इतने वर्षों तक इस खतरनाक सेवा में रहते हुए मैं हर बार सफल रहा।
प्रश्न: आपने इंडो-पाक बॉर्डर पर भी विशेष ड्यूटी निभाई, जहाँ आपको गोली भी लगी। वह अनुभव?
आर.पी. राजू: देश की सीमा पर ड्यूटी केवल शारीरिक नहीं, मानसिक परीक्षा भी होती है। उस दौरान मेरे पैर में गोली लगी, लेकिन मन में कभी भय नहीं आया। जब आप वर्दी पहनते हैं, तो व्यक्तिगत दर्द से बड़ा राष्ट्र का कर्तव्य हो जाता है। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वह चोट भी मेरे जीवन का एक सम्मानचिह्न है।
प्रश्न: आप ड्रोन टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ भी हैं। आज के दौर में ड्रोन को आप कैसे देखते हैं?
आर.पी. राजू: ड्रोन अब केवल कैमरा उड़ाने की चीज़ नहीं रह गए हैं। आज मक्खी के आकार का भी ड्रोन मौजूद है, जो निगरानी, सुरक्षा, वैज्ञानिक और सैन्य कार्यों में उपयोगी है। भविष्य का युद्ध, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन—तीनों ड्रोन टेक्नोलॉजी के बिना अधूरे हैं। भारत इस क्षेत्र में तेज़ी से आत्मनिर्भर बन रहा है, यह संतोष देता है।
प्रश्न: न्यूक्लियर, केमिकल, बायोलॉजिकल और रेडिएशन (NCBR) जैसे विषयों पर आपकी विशेषज्ञता रही है। इसे आप किस दृष्टि से देखते हैं?
आर.पी. राजू: ये विषय जितने तकनीकी हैं, उतने ही मानवीय भी। न्यूक्लियर शक्ति विनाश का माध्यम नहीं, यदि सही हाथों में हो तो विकास का दीपक बन सकती है।
सुरक्षा, संतुलन और नैतिकता—तीनों साथ चलें, तभी विज्ञान मानवता का सहायक बनता है।
प्रश्न: भारत-रूस न्यूक्लियर एग्रीमेंट और 1000 मेगावाट प्लांट को लेकर आपने लंबे समय तक काम किया। उस यात्रा को कैसे याद करते हैं?
आर.पी. राजू: इसकी चर्चा 90 के दशक से चल रही थी। वोल्गा और गंगा के मिलन की बात केवल प्रतीकात्मक नहीं थी—यह दो सभ्यताओं के वैज्ञानिक सहयोग की कहानी है। इस परमाणु बिजली संयंत्र के माध्यम से देश को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जो काम हुआ, उसका हिस्सा बनना मेरे जीवन की बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
प्रश्न: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ काम करने का अनुभव?
आर.पी. राजू: प्रधानमंत्री मोदी ने मेरे विशेष अनुभवों को देखते हुए मुझे परमाणु मामलों में सलाहकार की भूमिका दी—यह विश्वास मेरे लिए सम्मान है। और कलाम साहब… वे केवल राष्ट्रपति नहीं, एक चलते-फिरते विश्वविद्यालय थे। उनके साथ विशेष सहायक के रूप में काम करना—मेरे जीवन की सबसे प्रेरणादायक स्मृतियों में से है।
प्रश्न: इतने गंभीर क्षेत्रों के बीच आप जादू, कठपुतली और कविता से कैसे जुड़े?
आर.पी. राजू (मुस्कराते हुए): शायद संतुलन के लिए। जब जीवन में विस्फोट, हथियार और रेडिएशन हों, तब आत्मा को बचाने के लिए कला चाहिए। मैं जादू भी करता हूँ, कठपुतलियों को उंगलियों पर नचाता हूँ—और कविता लिखता हूँ, क्योंकि कुछ बातें होती हैं जो आदेश, रिपोर्ट या तकनीक में नहीं कही जा सकतीं।
प्रश्न: आपकी काव्य-पुस्तक “जो कह ना पाया…” के बारे में कुछ बताइए।
आर.पी. राजू:
यह मेरी आत्मा की आवाज़ है।
वे शब्द, जो फाइलों के बीच दब गए…
वे भाव, जो जोखिम भरे मिशनों के बाद मन में रह गए…
लगभग 100 कविताओं का यह संग्रह जल्द ही पाठकों के बीच होगा।
आर.पी. राजू केवल एक नाम नहीं—
वे जोखिम में खड़ा साहस,
विज्ञान में रचा विवेक,
और कविता में बहती संवेदना हैं।
जहाँ अधिकतर लोग जीवन को एक ही दिशा में जीते हैं,
वहीं आर.पी. राजू ने उसे सीमा, प्रयोगशाला, मंच और काग़ज़—हर जगह पूरी शिद्दत से जिया है।
डॉ. नवीन आनंद जोशी