ब्रह्मर्षि विश्वामित्र-दिनेश मालवीय

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

-दिनेश मालवीय

विश्वामित्र भारत की ऋषि परम्परा के ऐसे महासूर्य हैं, जिनके प्रताप से तीनो लोक आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित हैं. इनका जीवन इस बात को सिद्ध करता है कि मनुष्य तप-साधना और दृढ़ संकल्प से क्या नहीं कर सकता. पहले तो वह तपस्या करके क्षत्रियत्व से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया वह राजऋषि और फिर अपनी तपस्या के पुरुषार्थ से ब्रब्रह्मर्षि की ऊँची आध्यात्मिक पदवी तक पहुँचे. ऐसा पुरुषार्थी ऋषि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए आदर्श है. वह सप्तर्षियों में अग्रगण्य बने और विश्व का कल्याण करने वाले गायत्री महामंत्र के दृष्टा हुए.

प्रजापति के पुत्र कुश के वंश में महाराज गाधि हुए. विश्वामित्र उन्ही के पुत्र थे. कुरु वंश में जन्म लेने से इन्हें कौशिक भी कहा जाता है. यह बहुत धर्मात्मा और प्रजापालक राजा थे. एक बार वह सेना के साथ जंगल में आखेट करते हुए ऋषि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे. वशिष्ठजी ने उनका खूब आतिथि सत्कार किया. विश्वामित्र को बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके साथ आये हज़ारों सैनिकों और पशुओं को वशिष्ठजी ने किस प्रकार भोजनादि से तृप्त कर दिया. वह तो ऋषि हैं और उनके पास कोई साधन-सामग्री भी नहीं रहती.

यह कार्य वशिष्ठजी ने अपनी कामधेनु गाय के माध्यम से किया. पूछने पर वशिष्ठजी ने उन्हें यह रहस्य बता दिया. विश्वामित्र के मन में कामधेनु को प्राप्त करने की इच्छा बलबती हो गयी. उन्होंने वशिष्ठजी से कामधेनु गाय देने की याचना की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. विश्वामित्र ने राजहठ ठान ली और वह उसे बलपूर्वक ले जाने लगे. कामधेनु के प्रभाव से लाखों सैनिक पैदा हो गये और उन्होंने विश्वामित्र को पराजित कर दिया. उनकी सेना भाग खड़ी हुयी. उन्हें बहुत ग्लानि हुयी और उन्होंने सोचा कि उनके क्षत्रियबल पर धिक्कार है. सच्चा बल तो ब्रह्म्बल है.

विश्वामित्र राज-पाट छोड़कर घोर तपस्या करने लगे. तपस्या में उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा. पहले काम ने मेनका के जरिये बाधा डाली. उसके मोह से निकल कर वह पश्चाताप करने वन में चले गये. वहाँ उन्होंने बहुत कठोर तपस्या की. इसके बाद उन्हें क्रोध रुपी महाविघ्न का सामना करना पड़ा. त्रिशंकु राजा को गुरु वशिष्ठ का शाप था. विश्वामित्र ने वशिष्ठ के साथ अपने बैर को याद करने उसे यज्ञ करने के लिए कह दिया. यज्ञ में वशिष्ठजी और उनके पुत्र नहीं आये. इस पर क्रोधित होकर  विश्वमित्र ने उनके सभी पुत्रों को मार डाला. वशिष्ठजी शांत रहे. विश्वामित्र को अपनी भूल का अहसास हुआ कि इससे उनकी तपस्या में बहुत बड़ा विघ्न हुआ है.

विश्वामित्र फिर तपस्या में लीन हो गये. उन्हें बोध हुआ कि काम और क्रोध को जीतने के बाद ही व्यक्ति ब्रह्मर्षि बनता है. अभी तक वह महर्षि ही बन पाए थे. उन्हें अनुभव हुआ कि उन्होंने वशिष्ठजी का अनिष्ट किया है और उनकी कामधेनु को भी जबरदस्ती लेने की कोशिश की. मैंने उनके पुत्रों को मार डाला, तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा. मैं भी उन जैसा ही बनूँगा. ऐसा विचार कर वह फिर तप करने लगे.

उनकी घोर तपस्या से भगवान ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न हुए और वरदान माँगने को कहा. इन्होंने कहा कि यदि उचित समझें तो मुझे ब्रह्मर्षि बनने का वरदान दें. स्वयं वशिष्ठजी मुझे अपने मुँह से ब्रह्मऋषि की उपाधि दें.

वशिष्ठजी पहले ही उनकी तपस्या से प्रसन्न हो चुके थे. उन्हें पता चल चुका था कि विश्वामित्र ने काम और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है. इसलिए उन्होंने ब्रह्माजी के कहने पर उन्हने ब्रह्मर्षि की उपाधि दी और उन्हें गले लगाया. उन्होंने उन्हें सप्तर्षियों में स्थान दिया.

अपने तप के प्रभाव से विश्वामित्र जग में पूज्य हुए. उन्होंने भगवान श्रीराम को वन में ले जाकर उनसे असुरों का वध करवाया. उन्हें बला और अतिबला सिद्धियों के साथ ही अनके प्रकार के दिव्य अस्त्र प्रदान किये. उन्हें जनकपुरी ले जाकर सीताजी से उनका विवाह करवाया. उनकी दी हुयी विद्याओं और अस्त्रों के कारण ही श्रीराम तीनों लोकों में आतंक फैलाने वाले रावण का बध कर पाये.

गायत्री महामंत्र विश्वामित्रजी के ह्रदय में ही प्रकाशित हुआ, जिसने करोड़ों आध्यात्मिक साधकों के ह्रदय को दिव्य ज्ञान से आलोकित कर दिया और आज भी कर रहा है. गायत्री साधना सर्व शुभफल प्रदान करने वाली है. यह ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की विश्व को अनूठी और अनमोल देन है.

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