जीवन को महायोग कैसे बनायें?  P अतुल विनोद

जीवन को योग कैसे बनायें? 

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भारतीय योग-तत्व दर्शन कहता है… 

जीवन और जगत, आत्मा और परमात्मा कोई अलग अलग अस्तित्व नहीं, एक ही अस्तित्व के दो विस्तार … जीवन की अनदेखी संभव नहीं.. जीवन के कारण ही तो इतनी बातें हो रही हैं| 

जीवन के बिना आत्मा परमात्मा की बातें सम्भव नही .. इसलिए जीवन की उपेक्षा नहीं.. 

जीवन क्या है? परमात्मा की इच्छा 

वो परमात्मा कौन है? यहीं से शुरू होती है जिज्ञासा! 

जीवन मिथ्या है ये भी एक दृष्टिकोण हैं या जीवन के प्रति हमारी समझ मिथ्या है ये भी एक नजरिया है| 

मिथ्या कौन है जीवन? जगत? या हमारी सोच का संसार? 

यदि सब मिथ्या है तो परमात्मा ने ऐसा मिथ्या संसार क्यूँ बनाया? 

कहते हैं जीवन नष्ट हो जाता है? शरीर नश्वर है इसलिए जगत बंधन है .. और अन्धकार है| 

दूसरा नजरिया जीवन कभी नष्ट ही नहीं होता .. दुनिया में न तो कभी अन्धकार था न होगा .. क्यूँकी ये जगत उसी का विस्तार है इसलिए कौन नष्ट होगा? कौन मरता है? 

मरता तो कोई नहीं क्यूंकि मरण है ही नहीं सिर्फ रूपांतरण है| 

रूपांतरण किसका? उस एक उर्जा का जो सर्वत्र है .. उस उर्जा का केंद्र कहाँ है? हमारे अंदर .. कैसे? आत्मा के रूप में|

सुना तो है लेकिन  यकीन नहीं होता| 

तो फिर क्या करें? जानो.. कैसे? उसे तो उससे ही जाना जा सकता है| उसी को गुरु बना लो|

लेकिन उससे पहले चुनो… बिना जाने रह सकोगे? या जानना ही है? 

हाँ जानना है| तो फिर प्यास जगाओ… प्यास होगी तो बुझाने के लिए कोशिश करोगे .. कहीं न कहीं तो मिलेगी .. कोई बूँद जो गले को थोड़ा गीला करेगी .. जहाँ थोड़ी भी सम्भावना है वहीं मिलेगा स्रोत| 

हमे ये अधिकार है| हम किसकी खोज करें.. अपने मन के सुख की? या उस अनंत की| 

उस अनंत की .. वो इस क्षुद्र को कैसे मिलेगा? ये तो वही जनता है| 

फिर मैं क्या कर सकता हूँ? तुम उससे अपने मन के तार जोड़ो .. उसके आगे हाथ फैलाओ .. समर्पण कर दो … धोखा नहीं चलेगा … वो जानता है तुम्हारी प्यास कितनी गहरी है|

इस रास्ते पर संस्कार बाधा बनेंगे| वो आत्मा के साथ कैरी फॉरवर्ड होते हैं| 

यानि? 

आत्मा के साथ सूक्ष्म और कारण देह नया नया शरीर धारण करते हैं| ये उर्जा है जो जन्म जन्म से तुमने बटोरी है| 

इस उर्जा में तुम्हारी लाखों योनियों के कर्मफल हैं| 

लेकिन जब समर्पण आता है तो चेतना का दूसरा स्तर जागृत हो जाता है| 

वो स्तर ही अध्यात्म जागृति है| तब भी ये संस्कार अहंकार के रूप में रास्ता रोकते हैं| 

तुम जान गए हो इसलिए बाधाओं से डरना नहीं| 

इस अहम की ग्रन्थि को काटते रहना .. ये फिर फिर बढ़ेगी तुम काटते रहना .. तुम्हारी जागृत चेतना तुम्हारा सहयोग करेगी .. तुम उसका सहयोग करना| 

बस उसके आगे समर्पित रहना| हर स्तर पर भूमिगत हो जाना| शरीर, मन, प्राण, शरीर, विज्ञान … इसके बाद ये ग्रंथियां, ये कोष खुल जाएंगे … शरीर का अन्नमय कोष खुलेगा और वो संस्कारों से मुक्त होकर दिव्य हो जाएगा .. फिर खुलेगा मन का दरवाजा … मनोमय कोष शुद्ध होगा .. विकार दूर होंगे … फिर प्राणमाय कोष खुलेगा … प्राण के प्रवाह के लिए सुसुम्ना आपना रास्ता खोल देगी …. फिर विज्ञानमय कोष खुलेगा … ज्ञान अपने विशुद्ध रूप में होगा …. फिर आनंद, फिर चित, फिर सत्य| 

सत चित आनंद …..  

ये कब तक होगा .. ये तय करना हमारा काम नही … हमारा काम है चलते रहना … 

तुम  पीठ मत दिखाना … भागना मत …. साहस, धैर्य, निष्ठा, समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहना|

हिसाब किताब नही| मोल भाव नहीं| कुछ बचाना मत .. पूरा समर्पित कर देना …

अपने आपको पूरा ही चढ़ा देना| 

सबसे पहले आत्मज्ञान के रास्ते पर चलने का चुनाव करना, फिर संकल्प करना और आगे बढ़ जाना| 

जैसे तुम निकलते हो किसी मंजिल के लिए .. कार में बैठते हो … रास्ते में कितने विघ्न आते हैं … कभी टायर पंचर, कभी भारी ट्राफिक, कभी सड़क खराब, कभी जैम, कभी बारिश … वापस नहीं लौटोगे तो पंहुचोगे … मिलेगी मंजिल 

P ATUL VINOD

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