मायावी ब्रह्मांड में ब्रह्म की पहचान:

मायावी ब्रह्मांड में ब्रह्म की पहचान:
"चिन्हे क्यों कर ब्रह्म को, एतो गुन ही के अंग को विकार ।

 बाजीगर  बाजी   रची, मूल  माया  थें  मोह  अहंकार ।। "     

महामति प्राणनाथ जी ने इस त्रिगुणमयी (सत, रज, तम) माया को विकार कहा है, माया के तीन गुणों के द्वारा रचित इस ब्रह्मांड में सभी ब्रह्म की खोज कर रहे हैं, परंतु उनको ब्रह्म की पहचान इस माया के विकार रूपी शरीर के द्वारा नहीं हो सकती है। माया के तमोगुण से पांच तत्व तथा पांच उनके विषय, रजोगुण से पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेंद्रियां, और सतोगुण से मन बुद्धि चित्त अहंकार की उत्पत्ति हुई है।

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ब्रह्माँड के रहस्य
इस प्रकार ये 24 तत्व माया के विकार हैं। जीव के अंदर एक 25 वां तत्व और भी है जो चेतन है, वह अक्षर ब्रह्म के मन ज्योति स्वरूप का प्रतिबिंबित अंश है। यदि जीव के साथ यह छाया रूपी ब्रह्म का चेतन अंश नहीं होता तो संसार खड़ा ही नहीं होता, क्योंकि असत्य की रचना सत्य के सहारे ही होती है।

यह संसार स्वप्न है तथा रचना करने वाले की नींद में बना है। स्वप्न के पात्र नींद के बाहर नहीं आ सकते हैं और रचना करने वाला स्वयं अपने सपने के अंदर नहीं आ सकता है। इस प्रकार स्वप्न का जीव ब्रह्म को कैसे जान सकता है?

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स्वप्न की रचना करने वाले को महामति प्राणनाथ जी ने बाजीगर कहा है। जिस प्रकार बाजीगर अपनी जादुई शक्ति (संकल्प) के द्वारा अनेक कबूतर बना देता है और उन्हें मिटा भी देता है। वे बाजीगर के कबूतर कभी नहीं जान सकते हैं कि उसको किसने बनाया है?

स्वप्न के अंदर बने जीवों को भी यह मालूम नहीं हो सकता है कि इनको किसने बनाया है ? क्यों बनाया है ? तथा किस प्रकार बनाया है ? उपरोक्त वाणी में यह भी स्पष्ट है कि इस संसार की रचना माया, मोह, और अहंकार से हुई है।

" जाको पेड़ प्रतिबिंब प्रकृति, पांच तत्व को ही आकार ।

माहे खेले निरगुण व्यापक, लिए माया मोह अहंकार ।। "

इस संसार का मूल (उद्गम) प्रकृति में पड़ने वाला अक्षर ब्रह्म का प्रतिबिंब है, उसी से पांच तत्वों ने आकार लिया है। इस प्रकार अक्षर ब्रह्म के मन (ज्योतिस्वरूप) की सत्ता निर्गुण ब्रह्म के रूप में सर्वत्र माया, मोह और अहंकार के साथ खेल रही है। इस स्वप्न के संसार की रचना गोलोक धाम वासी श्री कृष्ण ने अपने चित्त में मन के संकल्प के द्वारा अपनी फरामोशी की नींद में की है। शास्त्रों में इसी कृष्ण को अक्षर पुरुष कहा है।

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महामति प्राण नाथ जी की वाणी के अनुसार स्वप्न के संसार की रचना निम्न प्रकार से बतलाई गई है। इसे समझ लेना चाहिए।

1- अक्षर पुरुष की इच्छा का नाम माया (प्रकृति) है। यह अपनी अनादि अवस्था में अक्षर ब्रह्म के अंदर सुप्त अवस्था में निष्क्रिय रूप में रहती है।

2- अक्षर के चित्त में माया (प्रकृति) तथा काल के मिलन से मोहजल रुपी अंधकार की उत्पत्ति हुई जिसमे स्वप्न रूपी असत्य संसार की रचना हुई।

3- मोह जल रूपी अंधकार (नींद) में अक्षर ब्रह्म का प्रतिबिंब पड़ने पर है, चित्त की वृत्तियों (संकल्प-विकल्प) का अहंकार रूपी अंडा बना तथा इसी अंडे से तीन गुण लिये स्वप्न का प्रथम पुरुष प्रकट हुआ, जिसे संत जन काल पुरुष, शास्त्र आदिनारायण तथा गीता में ईश्वर कहा गया है।

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बजरंग लाल शर्मा

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