धर्माधर्म सर्वज्ञ योगिगम्य भी नहीं

धर्माधर्म सर्वज्ञ योगिगम्य भी नहीं

Religion is not even omniscient

धर्माधर्म इन्द्रियगम्य न होने के कारण इन्द्रियों की सामर्थ्य में अतिशय ला देने वाले आधुनिक परिष्कृत यंत्राद्वारे जैसे धर्माधर्म का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, वैसे ही योग साधना द्वारा भी नहीं हो सकता; क्योंकि दूर, सूक्ष्म और व्यवहित स्व-स्व विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्यरूप अतिशय ही इन्द्रियों में योग साधना से आता है, अतः योग साधना से भी यह सम्भव नहीं कि स्व-विषय का अतिक्रमण कर इन्द्रियाँ स्व-अगोचर धर्माधर्म को ग्रहण कर सकें। अत:आचार्य कुमारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-



यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलङ्गनात्।

दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यात् न रूपे श्रोत्रवृत्तिता।

अतएव इसी से यह कहना भी खण्डित हो जाता है कि'अयोगी मानव भले ही धर्माधर्म का प्रत्यक्ष न कर सकें, चरम योग साधना से सम्पन्न हमारे सर्वज्ञयोगी भगवान् बुद्ध, भगवान् महावीर या मुहम्मद साहब तो धर्माधर्म का साक्षात्कार कर ही सकते हैं।


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