संग्रहणी, संग्रहणी पेट का गंभीर रोग: Irritable Bowel Syndrome Symptoms Causes And Treatment

संग्रहणी, संग्रहणी पेट का गंभीर रोग: Irritable Bowel Syndrome Symptoms Causes And Treatment

Irritable-Stomach-Newspuran

संग्रहणी एक भयंकर रोग है| इसमें रोगी को मल बार बार एवं अधिक आता है| मल में चर्बी भी होती है| इस रोग के कारण रोगी हर समय दु:खी रहता है| वह सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों को पचा नहीं पाता|

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सुबह उठते ही रोगी को शौच आता है| चूंकि बड़ी मात्रा में मल निकलता है, इसलिए रोगी घबरा जाता है| इस रोग में आंतों में दूषित पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं जिससे रोगी को बार-बार शौच करने जाना पड़ता है|

ग्रहणी रोग (IBS)होने के पहले प्यास अधिक लगना, शरीर की शक्ति (बल) कम होना, आलस्य, शरीर में भारीपन, अन्न के पचते समय पेट में जलन होना, मुंह से लार का निकलना, पेट का तना हुआ रहना, उल्टी होना, कर्णनाद (कानों में आवाज होना) भोजन करने में रुचि नहीं होना तथा अग्नि का मंद होना आदि लक्षण होते हैं। आयुर्वेदीय शरीर रचना विज्ञान(Anatomy) के अनुसार आशय एवं धातु के बीच में रहने वाले क्लेद को 'क्या' कहते हैं।

मानव शरीर में सात कलाएं होती हैं, जिनमें छठवीं कला का नाम पित्त धरा कला है। यह छठवीं कला पक्वाशय था आमाशय के बीच में स्थित है। इस पित्त धरा कला के अंतर्गत आमाशय के बाहरी द्वार से लेकर छोटी आंत्र के प्रथम भाग का संपूर्ण हिस्सा आता है। यह पित्त धरा कला से आशय में रहती है, उसे ग्रहणी कहते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ग्रहणी से क्षुद्रांत्र के प्रारंभिक भाग का अथवा

संग्रहणी विश्लेषण एवं चिकित्सा

Collection analysis and medicine-Newspuran

केवल क्षुद्रांत्र (छोटी आंत्र) का ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए। ग्रहणी, अग्नि (पित्त) का मुख्य केंद्र है, जो पाचन के लिए अन्न को ग्रहण करती है तथा पाचन के बाद शेष बचे हुए 'मल'भाग को निकाल देती है, किंतु वातादि दोषों के फलस्वरूप अग्नि के मंद हो जाने पर यह अनपचे अन्न को भी निकाल देती है, जो ग्रहणी का सामान्य कार्य है। ग्रहणी का यह कार्य अग्नि के बलाबल पर निर्भर रहता है।

अतिसार रोग से पीड़ित व्यक्ति रोग मुक्त होने पर यदि अपथ्य का सेवन करता है या प्रारंभ से ही जिनकी अग्नि मंद हो, ऐसे व्यक्ति अपथ्य का सेवन करते हैं, तब ऐसे मंद अग्नि वाले व्यक्तियों की जठराग्नि, वातादि दोषों के फलस्वरूप पुनः अधिक विकृत होकर ग्रहणी को भी विकृत कर देती है, जिसके कारण त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) में से किसी एक, दो या तीनों दोषों से विकारग्रस्त होकर ग्रहणी खाए हुए पदार्थ को आमावस्था में अथवा किंचित पक्वावस्था में भी अनेक बार त्यागती है। इससे कभी बद्ध (बंधा हुआ) और कभी द्रवरूप में बार-बार पीड़ा सहित दुर्गंधित मल निकलता है । इस व्याधि को ग्रहणी अथवा संग्रहणी कहते हैं।

कारण : मिथ्या आहार-विहार ही प्रत्येक रोग की उत्पत्ति के कारण हैं। अतिसार, प्रवाहिका, आमातिसार तथा ग्रहणी या संग्रहणी आदि रोगों के उत्पन्न होने का मुख्य कारण अग्नि का बंद होना ही है। मात्रा से अधिक एवं गरिष्ठ भोजन करना, जिससे उसका समयानुसार पाचन नहीं होना, अत्यंत तीखा, रूखा, कटु, अत्यंत चिकनाई युक्त तथा अत्यंत गर्म, अत्यंत ठंडा भोजन, अपनी प्रकृति के विरुद्ध आहार, पहले किए हुए भोजन के पचे बिना ही फिर से भोजन करना, ठंडे, बासी भोजन को फिर से गर्म करके या तल कर सेवन करना, सड़ा-गला दूषित भोजन करना, भोजन के तुरंत बाद स्नान या मैथुन करना, भय, शोक आदि मानसिक विकारों से ग्रस्त होना, गंदा, बासी, दूषित जल, दूध, या पेय पदार्थ, रासायनिक पेय का सेवन करना, नशीले पदार्थ यथा गांजा, भांग, अफीम, चरस, कोकीन, स्मैक, हेरोइन, एल.एस.डी., शराब का सेवन करना, मल-मूत्र आदि अधारणीय वेगों को बलात रोकना तथा पंचकर्म के अतियोग या मिथ्यायोग होना, रात्रि में जागरण करना तथा दिन में सोना आदि कारणों से अग्नि मंद होकर ग्रहणी रोग (IBS)को उत्पन्न करती है।

ग्रहणी के सामान्य लक्षण-

ग्रहणी रोग (IBS)से पीड़ित व्यक्ति अत्यंत द्रव युक्त (पानी के समान पतला),

Duodenitis | Saint Luke's Health System

छिछड़ेदार, आम मल का बार-बार त्याग करता है। कभी-कभी मल बंधा हुआ आता है तथा कष्टपूर्वक मल का त्याग करता है। कभी द्रवात्मक, कभी विषन्धात्मक मलत्याग का अनिश्चित स्वरूप ग्रहणी रोग (IBS)होने का संकेत देता है। कई-कई दिनों तक द्रवात्मक मल त्याग के बाद अपने आप ही मल बंधा हुआ आने लगता है। ग्रहणी रोग (IBS)के अन्य सामान्य लक्षणों में प्यास लगना, भोजन से अरुचि, मुख विरसता (स्वाद की अनुभूति नहीं होना), लालास्राव, हाथ-पैरों में सूजन, संधियों में पीड़ा होना, आमगंध युक्त खट्टी डकार आना, उल्टी होना, ज्वर तथा शरीर दुबला होना आदि इस रोग के सामान्य लक्षण हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ग्रहणी रोग (IBS)में अजीर्ण, गर्म, तीखे भोजन तथा जीवाणु संक्रमण आदि कारणों से विकृत हुई छोटी आंत्र सेवन किए हुए आहार का सामान्य रूप से पाचन नहीं कर पाती। जो व्यक्ति अत्यधिक चिकना, भारी (देरी से पचने वाला), कार्बोहाइड्रेट बहुल भोजन लेते हैं तथा प्रोटीनयुक्त द्रव्यों का प्रयोग नहीं करते, उनमें पाचन के समय आंत्र में विदग्धता होती है तथा बैक्टीरिया की अधिक उत्पत्ति होकर शोथ (सूजन) उत्पन्न हो जाता है तथा ग्रहणी की श्लेष्मलकला में अधिक स्राव होकर सेवन किया गया आहार बिना पचे ही इसके साथ आगे की ओर सरकते हुए आम (आंव) के रूप में बाहर निकल जाता है।

इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी हैं, जिनके लिए संक्षेप में यह कह सकते हैं कि पाचन संबंधी विकृति की अधिकता के कारण ही ग्रहणी रोग (IBS)उत्पन्न होता है।

इस रोग में आंत्र की आचूषण क्षमता घट जाती है, जिसके कारण लौह एवं विटामिन आदि की शरीर में कमी हो जाती है, जिससे रसक्षय तथा रक्तक्षय से दुर्बलता आ जाती है। रोगी शीघ्रतापूर्वक मांसक्षय होकर दुबला हो जाता है। आध्मान, अग्निमांद्य एवं मुखशोष आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

ग्रहणी के भेद । दोष भेद से ग्रहणी के चार प्रकार हैं।

1. वातज ग्रहणी। इसमें वात दोष की दृष्टि घृत ग्रह पित प्रधानता होने से अन्न का पाचन नहीं होना ताल का सूखना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, कानों में आवाजें आना, उदर, पार्श्व, वंक्षण एवं गर्दन में दर्द होना, अत्यधिक प्यास लगना, दुबलापन तथा मुख विरसता होती है। भोजन के पचने के बाद तथा पच्यमानावस्था में आध्मान होता है। भोजन के नहीं पचने पर भी अनेक रसों से युक्त आहार द्रव्यों के खाने की इच्छा बनी रहती है। इसमें रोगी को आम तथा है, फेनयुक्त द्रवबहुल (पतला) मल निकलता है। कभी-कभी श्वास एवं कास रोग भी होता है।

 

Biliary duodenum2. पित्तज ग्रहणी: पित्त को बढ़ाने वाले कारणों के सेवन से अधिक मात्रा में बढ़ा हुआ पित्त अग्नि को आप्लावित कर नष्ट कर देगा है। पित्तज ग्रहणी में रोगी पीले एवं नीले रंग दा के द्रवात्मक मल का त्याग करता है। दुर्गंधयुक्त खट्टी डकारें आती हैं। भोजन से अरुचि होती है। गले तथा हृदय प्रदेश में जलन आदि लक्षण होते हैं। कुछ ही दिनों में रोगी का मुख पीला पीला दिखने लगता है।





3. कफज ग्रहणी : अत्यंत गुरु (भारी), स्निग्ध आदि पदार्थों के सेवन से अधिक बढ़ा हुआ कफ अग्नि को मंद कर देता है अतः कफज ग्रहणी से पीड़ित व्यक्ति के आहार का पाचन बड़ी कठिनाई से होता है। रोगी आम एवं कफ से युक्त मल का त्याग करता है। रोगी को हल्लास, वमन, अरुचि, मुख में प्रलेप (कफ लिप्त होना), मधुरता दो लक्षणों के साथ-साथ का तथा पीनस आदि के लक्षण भी पीड़ित करते हैं।

4. त्रिदोषज ग्रहणी : इसमें वात आदि तीनों दोषों के मिले-जुले लक्षण होते हैं। ग्रहणी के अन्य भेद-- चरक संहिता में ग्रहणी के उपरोक्त वर्णित चार प्रकार ही कहे गए हैं, किंतु बाद के आचार्यों ने संग्रह ग्रहणी (संग्रहणी) तथा घटी यंत्र ग्रहणी नामक दो अन्य भेदों का भी वर्णन किया है।संग्रहणी: यह त्रिदोषज ग्रहणी का ही एक प्रकार है। इसमें रोगी को 10-15 दिन तक दस्त लगते हैं तथा 5-7 दिन बंद रहकर फिर अपने आप दस्त लगने लाते हैं।

निदान करते समय ग्रहणी रोग (IBS)के सामान्य लक्षणों की स्थिति देख लेना ही पर्याप्त होता है।

ग्रहणी रोग (IBS)में औषध-व्यवस्था

ग्रहणी रोग (IBS)अत्यंत कष्टकारक एवं कृच्छ्साध्य रोग है इसकी चिकित्सा को निम्नवत विभक्त कर सकते हैं। 1. सामान्य चिकित्सा 2. विशेष चिकित्सा।

General medicine-Newspuran

1. सामान्य चिकित्सा : किसी भी प्रकार के ग्रहणी रोग (IBS)में सर्वप्रथम उसकी साम अथवा निराम अवस्था का निश्चय कर लेना चाहिए। रोगी यदि पहले से ही आमदोष से पीड़ित रहा हो, तब रोग एवं रोगी की स्थिति का आंकलन कर उसे मृदुवमन, मृदुरेचन, लंधन, पाचन तथा दीपन औषधियों का प्रयोग करना चाहिए। इसके सिवाय आमदोषनाशक उपक्रम एवं औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।

यदि उपरोक्त उपक्रमों तथा औषधियों से ग्रहणी की निराम अवस्था आ जाए अथवा पूर्व से ही निराम अवस्था है, तब दीपन, स्तंभन तथा अनुलोमन औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।

औषधि प्रयोग में रस औषधियों के अतिरिक्त क्षार, चूर्ण तथा आसव, अरिष्ट का प्रयोग करना चाहिए सिद्ध घृत, दुग्ध प्रयोग तथा तक्र प्रयोग का ग्रहणी रोग (IBS)में विशेष महत्व है। घृत प्रयोग ग्रहणी रोग (IBS)होने के कारणों में अति स्निग्ध एवं गुरु पदार्थों का

सेवन करना उल्लिखित है तथापि ग्रहणी में स्नेह का प्रयोग उत्कृष्ट माना गया है क्योंकि घृत श्रेष्ठ अग्निदीपक है तथा वायु एवं पित्त का हरण करता है। अग्निदीपक द्रव्यों से सिद्ध घृत कफ दोष का हरण करने के साथ-साथ ग्रहणी में अपक्व अन्न को धारण करने की क्षमता को बढ़ाकर उसका पाक करता है। ग्रहणी रोग (IBS)में वायु विकृत रहती है अत: समान वायु अग्नि को प्रदीप्त नहीं करती तथा अपान वायु भी अपने कार्य को सम्यक रूप से संपादित नहीं करती, जिसके कारण अनपचा अन्न ही मल के रूप में बाहर निकलता है। घृत के प्रयोग से समान तथा अपान वायु अपनी प्राकृत स्थिति में आ जाती है, जिससे अग्नि दीप्त होकर भोजन का सम्यक पाक होता है तथा मल विपक्व होकर बाहर निकलता है। ग्रहणी में यदि रोगी कष्टपूर्वक मल त्याग करता है, तो भी घृत का प्रयोग उपयोगी है। यदि रोगी की आंतों में रूक्षता हो, तो घृत का प्रयोग और भी उपयोगी हो जाता है।

तक्र प्रयोग पाचन शक्ति को बढ़ाने तथा उसे व्यवस्थित करने में तक का विशेष महत्व है। तक आंतों की आचूषण शक्ति को बढ़ाता है तथा उसमें रहने वाले विशिष्ट तत्वों के आचूषण से शरीर को बल (शक्ति) प्रदान करता है। इसीलिए ग्रहणी रोग (IBS)में दुग्ध प्रयोग की तरह केवल तक प्रयोग भी रोगनाशक है। चरकाचार्य के अनुसार ग्रहणी दोष में तक्र ओपन, ग्राही तथा लघु होने के कारण अधिक श्रेष्ठ है यह त्रिदोष नाशक है। तक, अम्ल होते हुए भी मधुर विपाक वाला होने से पित्त को प्रकुपित नहीं करता। अभिष्यंदी होते हुए भी कषाय, उष्ण, विकासी एवं रूक्ष होने से कफ में भी  हितकारक है। कषाय तथा रुक्ष होते हुए भी स्वादु, अम्ल एवं सान्द्र होने के कारण वात दोष को दूर करता है।

ग्रहणी रोग (IBS)में उपयोगी अन्य औषधियां रस : ग्रहणी कपाट रस, ग्रहणी शार्दूल रस, अगस्ति सूतराज रस, रसेंद्रचूर्ण, राजवल्लभ रस, हेमगर्भ पोट्टली रस आदि।चूर्ण : वृहत गंगाधर चूर्ण, लघु गंगाधर चूर्ण, जातिफलादि चूर्ण,कपित्थाष्टक चूर्ण, दाडिमाष्टक चूर्ण, हिंग्वाष्टक चूर्ण, वृहल्लवंगाद्य चूर्ण, हिंग्वादि चूर्ण,नागराज चूर्ण आदि। क्वाथ : नागरादि क्वाथ, तिक्तादिक्वाथ, शालिपादि क्वाथ आदि।

वटी : हिंग्वादि वटी, रसोनादि वटी, गंधक वटी, शंख वटी, सौवर्चल पाक वटी, दुग्ध वटी, क्षार गुटिका आदि।

घृत : दशमूलाद्य घृत, त्र्यूषणाद्य घृत, पिप्पली मूल घृत आदि। क्षार : यवक्षार, भूनिम्बादि क्षार, पिप्पलीमूलाद्य क्षार आदि।

आसव-अरिष्ट : द्राक्षासव, कुमारी आसव, चंदनासव, दन्त्यारिष्ट , मध्वारिष्ट, दशमूलारिष्ट आदि।

पर्पटी : रस पर्पटी, पंचामृत पर्पटी, स्वर्ण पर्पटी आदि।


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