EDITORApril 20, 20211min212

प्राचीन साहित्य में शक्ति : वैदिक काल से आज तक शक्ति पूजा

प्राचीन साहित्य में शक्ति

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वैदिक साहित्य में उमा, पार्वती, अम्बिका, भगवती, सदाणी और भवानी जैसे नामों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। वेद के दशम मंडल का एक सूक्त शक्ति उपासना के कारण देवी सूक्त कहा जाता है।

सनातन हिन्दू धर्म में शक्ति पूजा का प्रचलन अत्यन्त प्राचीन काल से रहा। है। प्राचीन साहित्य में शक्ति को नारी रूप में अभिव्यक्त करते हुए उसके दिव्य स्वरूप को विशेष महत्व दिया गया है। सृष्टि की रचना में नारी का महत्व अभूतपूर्व माना है। प्रारंभिक रूप में शक्ति को शिव की पत्नी उमा पार्वती के रूप में जगज्जननी भी कहा गया है। शक्ति और शिव की अभिन्नता हमारे धार्मिक समन्वय एव सहिष्णुता का प्रतीक है। कालांतर में शक्ति के रूप में स्थापित पार्वती, कपिलावरणा काली, सिंहवाहिनी, दुर्गा महाकाली बन गई। उल्लेखनीय बात यह है कि एक देवता के रूप में शिव और विष्णु के अतिरिक्त शक्ति की महिमा और गरिमा चरम सीमा पर पहुंची। शक्ति उपासक भक्त शाक्त’ कहे जाने लगे। शक्ति के विभिन्न नाम जैसे काली चामुण्डा, शिवानी, रुद्राणी, भवानी आदि उनके विशेष संबंध को प्रदर्शित करते हैं। साथ ही समय के साथ-साथ शक्ति को लक्ष्मी, वैष्णवी ब्राह्मी इन्द्राणी, वाग्देवी के रूप में भी प्रतिष्ठित किया जाने लगा। मध्यकाल तक शक्ति की महिमा सृष्टि, पालन और संहाररूपी के रूप में स्थापित हो गयी।

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तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मणों में भी अम्बिका का उल्लेख किया। केनोपनिषद में उमा को विद्यादेवी का रूप मानते हुए हेमवती’ कहा गया है। प्रारंभ में शिव और शक्ति की प्रधानता का दम जातियों और पर्वतीय निवासियों में तीव्रता पूर्वक हुई। प्रकृति को शक्ति को महत्व प्रदान करके उसे माया रूप में ‘नित्या शक्ति’ की कल्पना की गई।

महाभारत के उद्धरण भी देवी शक्ति का महत्व स्पष्ट करते हैं। अर्जुन द्वारा युद्ध में विजय की कामना स्वरूप दुर्गा की आराधना विभिन्न नामों से की गई।

पुराणों में भी देवी की उत्पत्ति यशोदा के गर्भ से बताते हुए राजा कंस द्वारा शिला पर पटकने और देवी का छिटक कर आकाश में स्थित हो जाने की कथा का उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण में तो शक्ति की महत्ता और सर्वशक्तिमान होने का विशद विवरण मिलता है। उसमें शक्ति के तीन रूप माने गए हैं- (1) महाकाली (2) महालक्ष्मी और (3) महासरस्वती।

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उक्त पुराण में शक्ति को ही पृथ्वी रूप में सृष्टि का आधार माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में ही देवी दुर्गा से संबंध ‘दुर्गासप्तशती’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। नवरात्र काल में उपासक इसका पाठ करते हैं। देवी शक्ति के रूप में यह आख्यान भी सर्वविदित है कि महिषासुर के संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, सूर्य आदि देवताओं के मुख से निकले तेज से शक्ति का उद्भव हुआ। वही शक्ति ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाई। मार्कण्डेय पुराण में भी देवी की उत्पत्ति से संबंधित ऐसी ही कथा का उल्लेख मिलता है। जब शुंभ-निशुंभ असुरों के संहार हेतु विभिन्न देवगण, हिमालय पर स्तुति कर रहे थे तब भगवती पार्वती के कोश से देवी शिवा (अम्बिका) का जन्म हुआ। कोश से उत्पन्न होने के कारण उन्हें ‘कौशिकी’ कहा गया। पार्वती के शरीर से अम्बिका के निकलने के कारण उनका शरीर काला हो गया और जिसके कारण उन्हें ‘काली’ कहा गया है। चण्ड-मुण्ड के संहार के कारण देवी शक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व प्रकट हुआ।

भारतीय समाज में शक्ति के तीन प्रधान रूप विशेषतः मान्य रहे हैं। (1) सौम्य रूप (2) प्रचण्ड रूप और (3) काम प्रधान रूप। देवी के सौम्य रूप की उपासना विशेष रूप से प्रचलित है। 

 


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