वास्ता उससे न अपना,जिसको अकल कहते हैं, अपनी तो कुटिया को ही हम ताजमहल कहत हैं। – दिनेश मालवीय “अश्क”

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वास्ता उससे न अपना,जिसको अकल कहते हैं
अपनी तो कुटिया को ही हम ताजमहल कहत हैं।

आप भी निकले कहाँ कुछ ढूँढने असली
आज की दुनिया मे नकल को ही असल कहते हैं।

रहते हैं बेचैन, कितने ख़ुद से बेख़बर
देखना उनको ज़रा जो लोग ग़ज़ल कहते हैं।

देखिये बेशर्मी झूठे पारसाओं की
उनके चेहरे पे न दीखे जिसे शल कहते है।

सोचता हूँ कौन हूँ क्या हूँ कहाँ से हूँ
लोग इसको मेरा दीमाग़ी ख़लल कहते हैं।

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