आयुर्वेद चिकित्सा विचित्र लेकिन वैज्ञानिक है: ताली, तलुवा और तालू का चमत्कार

आयुर्वेद चिकित्सा विचित्र लेकिन वैज्ञानिक है: ताली, तलुवा और तालू का चमत्कार
हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने मानव शरीर और सम्पूर्ण प्रकृति का बड़ी बारीकी और गहराई से अनुसंधान, अन्वेषण करके प्रकृति के अनन्त रहस्यों को मानव के कल्याणार्थ उपस्थित किया है। हमारी भारतीय दिनचर्या और सम्पूर्ण कर्मकाण्ड, नियम-उपनियम, विधि आदि अपने में आश्चर्यजनक गहन रहस्यों को छुपाए हुए है। 

यदि सूक्ष्मता के साथ शास्त्रों में नित्य कर्म, धर्म और पूजा-पाठ के रूप में जो साधारण असाधारण प्रक्रियाएं करने का निर्देश किया गया है वह सब समाज के व साधक के आंतरिक और बाह्य स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए बताया गया है।

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ताली के चमत्कार:-

वैज्ञानिक रहस्य है कि ताली बजाने से बहुत सारे रोग दूर हो जाते हैं। स्नायु मंडल पर, विशेष रूप से हृदय पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ता है। एक्युप्रेशर, एक्युपंक्चर विद्या के दृष्टिकोण से आदमी की हथेली पर ऐसे संवेदनशील मर्मस्थल, सेन्सिटिव पांइटस हैं जिन पर ताली बजाने से कर्ता के आंतरिक स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है।


ताली बजाने से करतल पर स्थित अधिकांशत: सभी विशेष स्थलों पर जोरदार शामक प्रभाव पड़ता है। फलतः शरीर में रोग शमन की क्रिया अज्ञात प्रकार से आरंभ हो जाती है। एक्युपंक्चर विज्ञान के अनुसार मानव शरीर के सैकड़ों से भी अधिक ऐसे मर्म स्थलों का ज्ञान प्राप्त कर लिया गया है, जिन पर विशेष प्रकार 1 की सुईयों के द्वार आघात करने से रोग दूर होते हैं। 

चीन में इस विद्या के संबंध में बहुत बड़ी खोज काफी पुराने समय से हो चुकी है। किन्तु भारतीय प्राचीन ऋषियों ने चिकित्सा में ही नहीं, धर्म के रूप में पूजा और उपासना की विधियों में उपरोक्त विज्ञान का समावेश कर दिया था। जिससे नित्य की जाने वाली प्रार्थना, उपासना व भजन कीर्तन आदि में होने वाली स्वभाविक और आवश्यक क्रियाओं को जनता के अधिकांश व्यक्ति नियमित रूप से अन्जाने में ही करते रहते थे। फलतः सर्वसाधारण और समाज का स्वास्थ्य ठीक रहता था।

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आज के तथाकथित वैज्ञानिक समाज के बहुत से लोग हमारी प्राचीन कीर्तन आदि की धार्मिक प्रक्रियाओं को व्यर्थ का ढोंग कहकर उनकी उपेक्षा करते हैं। किन्तु आज प्रत्यक्ष प्रमाणों के द्वारा व प्रेशर पंचर विज्ञान के द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि करतल में बहुत सारे मर्मस्थल छुपे हुए हैं, जिन पर विशेष दबाव पड़ने से कितने ही रोग दूर हो सकते हैं। 

कीर्तन करते हुए घंटों तक कीर्तन के साथ-साथ ताली बजाने की क्रिया की जाती है। स्वाभाविक ही कीर्तन के समय सर्वप्रथम तो मन एकाग्र होगा। दूसरे ताली बजाने की वैज्ञानिक क्रिया से करतल में स्थित बहुत सारे मर्म स्थलों पर जोरदार और विशेष प्रकार का दबाव पड़ेगा, जिससे स्वास्थ्य पर निश्चय ही अच्छा प्रभाव रहेगा। 

करतल में स्थित मर्म स्थलों पर हर व्यक्ति किसी वस्तु या अपने हाथ की अंगुलियों के द्वारा भी प्रातः सायं दबाव डालकर अपने आपको स्वस्थ कर सकता है। किन्तु ताली बजाने से दोनों करतलों के मध्य हाथ के दबाव के साथ-साथ वायु का भी दबाव बन जाता है, जिसका प्रभाव किसी वस्तु व अंगुलियों के दबाने से कहीं अधिक प्रभावशाली माना गया है। 

इसलिए ताली बजाने से और वह भी एकाग्रता और तन्मयता के साथ बजाने से कर्त्ता के स्नायु मंडल पर हृदय और म पर विशेष स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव पड़ता रहता है। नियमित ताली बजाकर कीर्तन करने वाले लोगों को अधिकांशतः हृदय रोग नहीं होता है।

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तलुवे के विचित्र प्रभाव:-

एक्युप्रेशर और प्रेशर पंचर विज्ञान के अनुसार पैर के निचले हिस्से तलुवे में भी बहुत सारे मर्मस्थल माने गए हैं। ये मर्म स्थल शरीर के बहुत सारे स्वास्थ्य केन्द्रों से और योग चक्रों से अर्थात् स्नायुगुच्छों से सीधा संबंध रखते हैं। तलुवे के उन विशेष स्थानों पर यदि अनजाने में भी खास प्रकार का दबाव पड़ता है और सूक्ष्म रूप से हमारे स्वास्थ्य पर उसका प्रभाव अवश्य होता है।

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भारतीय वैज्ञानिक ऋषियों ने इस बात को वैज्ञानिक रूप से जानकर खूंटी वाली खड़ाऊं और साधारण खड़ाऊं पहनने की विधि निकाली। उनके द्वारा पैर के कई विशेष भागों पर जोरदार प्रभाव पड़ता है। जैसे खूंटी वाली खड़ाऊं पहनने से साधक की काम शक्ति नियंत्रित होती है।

खूंटी वाली खड़ाऊं पहनने से मस्तिष्क के एक विशेष भाग पर पैर का मर्म स्थल दबने से विचारों में परिवर्तन या काम संबंधी विचारों में परिवर्तन आ जाता है। पैर के तलवे की मालिश करने से बहुत सारे रोग स्वाभाविक ही दूर हो जाते हैं। अत: पैर के तलवे की मालिश नित्य की जाए। 

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पैर के तलवे की मालिश अपने आप में एक विशेष चिकित्सा मानी गई है। इससे आंखों पर भी बहुत अच्छा असर होता है। इससे नेत्र ज्योति का विकास संभव होने लगता है। गर्मी के समय में रबड़ के जूते पहनने से तलवे के द्वारा, गर्मी का बुरा प्रभाव मस्तिष्क और नेत्र ज्योति पर विशेष रूप से पड़ता है। 

इसलिए गर्मी में रबड़ के जूते न पहनें। तिल, नारियल व सरसों के तेल के द्वारा नित्य प्रति, किसी भी एक समय मालिश कर सकते हैं। मालिश करते हुए अंगूठे के द्वारा तलवे के विभिन्न भागों को हल्के रूप में दबाने का प्रयत्न करें। इससे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर निश्चय ही अच्छा असर होगा।

हमारे प्राचीन विद्वानों ने अग्नि से तलवों को सेकना निषेध माना है। बहुत अधिक आवश्यकता होने पर ही पैरों को थोड़ा बहुत सेका जा सकता है, अधिक नहीं रोकना चाहिए। अधिक सेकने से मस्तिष्क पर बुरा असर होगा। बादाम रोगन या शुद्ध घी से तलवे पर मालिश करने से नेत्र ज्योति और सम्पूर्ण स्नायुमंडल पर बहुत अच्छा असर होता है।

नृत्य करने में भी पैरों का विशेष रूप से प्रयोग होता है। उसके द्वारा हमारे स्वास्थ्य पर बहुत ही सुन्दर प्रभाव पड़ते देखा गया है। हर व प्रदेश में नृत्य की परम्परा भिन्न-भिन्न प्रकार की है। किन्तु भारतीय कत्थक, कत्थकली, ओडिसी, भरतनाट्यम आदि नृत्यों में विशेष वैज्ञानिकता देखी जाती है। इन उपरोक्त भारतीय नृत्यों में पैर के तलवे पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। अतः यह नृत्य हमारे मन मस्तिष्क व स्वास्थ्य पर बहुत अच्छा प्रभाव डालते हैं।

तालु शुद्धि का चमत्कार:-

ताली और तलवे की तरह ही हमारे मुख के अन्दर तालु नाम का स्थान भी अपने आप में बहुत ही महत्ता रखता है। ऋषियों ने के सम्बन्ध में भी विशेष खोज करके मानव मात्र का तालु बहुत बड़ा उपकार किया है। तालु का उपयोग और उसकी सफाई के संबंध में जानकारी न होने के कारण कई रोगों से लोग कष्ट पाते रहते हैं।

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चिकित्सा शास्त्रियों और शरीर विज्ञान आचार्यों ने बड़ा प्रयत्न करके तालु के संबंध में विशेष जानकारी सर्वसाधारण के लिए दी है। तालु में विजातीय द्रव्य और विकार आ जाने के कारण अर्थात् तालु में गन्दा पानी एकत्रित हो जाने के कारण नजला, जुकाम, गले की खराबी, आंखों की कमजोरी आदि कई प्रकार की बीमारियां आ जाती हैं। 

उनको ठीक करने के लिए प्रातः काल मल-मूत्र त्याग के अनन्तर कुल्ला दातुन करते समय अपने सीधे हाथ के अंगूठे से तलवे की और गले की हल्की मालिश करनी चाहिए अर्थात् अंगूठे से तालु को धीरे से रगड़कर साफ करें। और काग के पास गले में भी हल्का सा दबाने का प्रयत्न करें। इससे मुख, नाक व आंख से पानी आ सकता है, थोड़ा सिर चकरा सकता है।

इसलिए यह क्रिया सावधानी से और नित्य प्रातःकाल करें। यदि इस क्रिया को नियमित रूप से किया जाए तो टॉन्सिल्स, गले की कई प्रकार की खराबियां, नेत्रों की कमजोरी आदि कई बीमारियां स्वाभाविक ही दूर हो जाती हैं। इस क्रिया को करने से जुकाम में भी बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।

ताली, तलवा और तालु का ठीक और वैज्ञानिक उपयोग जानकर हम सब बहुत अधिक लाभ उठा सकते हैं। इस रहस्यपूर्ण जानकारी से सर्वसाधारण तथा उच्च कोटि के साधक, योगीजन भी अपने जीवन को सुखी, स्वस्थ और चमत्कारपूर्ण बना सकते हैं। 

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सांसारिक दृष्टिं से उपरोक्त रहस्यों का जानकर हम सब बहुत से कष्टों व रोगों से बच सकते हैं और ऋषियों की इन विचित्र खोजों को जानकर अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं। ताली, तलवा और तालु के संबंध में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। जिसको जानकर आश्चर्य के साथ-साथ नवीन और विचित्र अनुभव हो सकते हैं।

केशव देव


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