भारत भवन: कलाओं का मरकज़: जाने भोपाल में स्थित भारत भवन में क्या है ख़ास 

भारत भवन: कलाओं का मरकज़: जाने भोपाल में स्थित भारत भवन में क्या है ख़ास 
कलाओं के तीर्थ भारत भवन का उद्घाटन 1982 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।



भारत भवन अतीत की कला यादों और नई कला प्रवृत्तियों का आश्रय स्थल है। संगीत, अभिनय, कविता, रंग, मूर्तिकला और साहित्य का एक स्वतंत्र परिवार है, जिसकी आवाज महान झील की लहरों से टकराती है और समुद्र के पार सुनाई देती है। मध्य प्रदेश का सौभाग्य रहा है कि भारत भवन की सौगात ने उसे देश-विदेश के मानचित्र पर समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले एक अद्वितीय राज्य की छवि दी है।

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उद्देश्य यह था कि मौखिक(वर्बल), दृश्य(विजुअल) और निष्पादनकारी कलाएं(परफॉर्मिंग आर्ट्स) एक-दूसरे से संवाद करें और इनके अन्वेषण से कला के उत्कृष्ट मानक रूप स्थापित किए जाएं। इसके साथ ही लोग हमारे देश के विविध कलारूपों के बारे में अपनी समझ बनाएं।

चार्ल्स कोरिया थे आर्किटेक्ट:

भारत भवन में कला की आत्मा को एक शरीर चाहिए था। इसका जिम्मा दिया गया मशहूर वास्तुशिल्पी चार्ल्स कोरिया को उन्होंने श्यामला हिल्स पर भारत भवन को इस तरह से डिजाइन किया है कि यह जमीन पर जमीन के निचले तल पर और तालाब के किनारे बनाया गया। यहां पर पहुंचना ही मन को शांति से भर देता है। भारत भवन के पीछे बड़े तालाब का नजारा कलाप्रेमियों को प्रकृति के सामीप्य के सौंदर्यबोध से परिपूर्ण कर देता है।

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जे स्वामीनाथन पहले चेयरमैन:

भारत भवन के लिए वित्तीय व्यवस्था मप्र प्रदेश सरकार ने की और इसके संचालन का जिम्मा भारत भवन ट्रस्ट को दिया गया। ट्रस्ट में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और आईएएस अधिकारी एवं कवि अशोक वाजपेयी आजीवन न्यासी बने। इसके चैयरमेन थे मशहूर चित्रकार एवं लेखक जे स्वामीनाथन। बाद में अर्जुन सिंह और अशोक वाजपेयी ने आजीवन न्यासी के पद से इस्तीफा दे दिया।

कला, नाट्य साहित्य सभी एक जगह:

भारत भवन में 6 विंग्स हैं। रूपंकर यानी फाइन आर्ट का संग्रहालय, रंगमंडल रेपर्टरी, भारतीय कविताओं का केंद्र वागर्थ, शास्त्रीय और लोक संगीत का केंद्र अनहद, शास्त्रीय सिनेमा का केंद्र छवि और साहित्य का केंद्र निराला सृजनपीठ।

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भारत भवन की इस कला यात्रा भले ही सरकारों के आने-जाने से कई उतार-चढ़ाव आए हों, ट्रस्ट का पुनर्गठन हुआ हो, लेकिन सभी संस्कृति कर्मी इस बात पर एकमत हैं कि भारत भवन ने कला के क्षेत्र में उत्कृष्टता का जो मापदंड कायम किया है। इसकी मिसाल देश में कहीं नहीं है। लेखकों के बीच में भले ही विचारधारा को लेकर असहमतियां बनीं हों, तौर तरीकों पर मतभेद रहे हों, लेकिन भारत भवन ने जो योगदान कला और संस्कृति को दिया है वह अतुलनीय है। 

रुपंकर ने कराया विश्वस्तरीय परिचय:

रूपंकर की स्थापना का श्रेय मशहूर पेंटर जगदीश स्वामीनाथन को है। वे उनका व्यक्तित्व सुफियाना था। भारतीय चित्रकला के आदिवासी, लोक और नागर यानी कि आधुनिक स्वरूपों में काम करने का उन्हें गहरा ज्ञान था। उनकी दृष्टि भारत में साकार हुई। 

रूपंकर में आदिवासी कलादीर्घा, आधुनिक कलादीर्घा और सिरेमिक दीर्घा है। इसके जरिए लोगों को विश्वस्तरीय व उत्कृष्ट चित्रकला और शिल्पकला से परिचित करवाया गया। लोगों ने आदिवासियों के जीवन, उनके कलाबोध उनके जीवनमूल्यों को उनकी कला से जाना जाता हैं।  

भारत भवन ने रजा, हुसैन, बेंद्रे को देखा:

अपने समय के तमाम मशहूर पेंटर, रजा, हुसैन, बेंद्रे, चिंचालकर यहां आए। उन्होंने पेंटिंग्स बनाई और उनकी कला से यहां आने वाले लोग रूबरू हुए। यहां विश्वस्तरीय चित्रकारों के काम को देखा और सराहा गया। यही वह जगह है, जहां देश के नामचीन पेंटर्स का किया हुआ काम संग्रहीत है। यहां कई कैंप आयोजित हुए|

यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के छापे के काम की प्रदर्शनी लगी। इसमें चीन, जापान समेत विश्व के उत्कृष्ट काम प्रदर्शित किए गए।

ब.व कारंत ने की रंगमंडल की स्थापना:

नाटक प्रभाग के प्रमुख अनिल शाही के मुताबिक रंगमंडल की स्थापना मशहूर नाटककार ब.व कारंत ने 1982 में की थी। रंगमंडल में पूरे देश और प्रांतों से नाटक आमंत्रित किए जाते हैं। नाटक शृंखलाएं और फेस्टिवल आयोजित होते हैं। रेपर्टरी में देश के प्रांतों से कलाकारों को बुलवाकर यहां पर प्रशिक्षित किया गया। इन्हें मानदेय दिया गया। 

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ये कलाकार नई उम्र के थे और अभिनय सीख रहे थे, इन्हें नाटक की बारीकियों से अवगत कराया गया। इन्हें मांजा गया। इनकी मुलाकात मशहूर नाट्य निर्देशकों से करवाई गई। इनके साथ कई नाटकों का यहां निर्माण किया गया। तकरीबन 61 नाटक भारत भवन में तैयार हुए। नाटकों को देशज शैली में बुंदलखंडी, छत्तीसगढ़ी, मालवीय परंपरा में खेला गया।

इतने दर्शक कि पुलिस बुलाई:

शाही के मुताबिक यहां पर नाटकों के दर्शक बड़ी तादाद में आते हैं। कुछ साल पहले अभिनेता सौरभ शुक्ला के डायरेक्शन में एक नाटक हुआ था 'बर्फ' इस नाटक में इतनी भीड़ जुटी थी कि पुलिस बुलवानी पड़ी थी। इसके बाद से ही नाटकों के लिए पचास रुपए का टिकट तय कर दिया गया। नाटकों के प्रदर्शन की एक ही शर्त है उत्कृष्टता। इनका चयन एक एडवाइजरी बोर्ड करता है एडवाइजरी बोर्ड भी अपनी साख को लेकर सजग रहता है।


देशज, परंपरा से जुड़ाव वाले नाटक:

भारत भवन ने नाटकों की पाश्चात्य शैली के बजाए देशज और परंपरा से जुड़ना शुरू किया। 

विश्व कविता का आयोजन बेमिसाल:

भारत भवन ने वागर्थ से मानक साहित्यक कार्यक्रम आयोजित किए। साहित्य की आलोचना की मैग्जीन पूर्वग्रह नियमित ढंग से प्रकाशित हुई। 38 साल की भारत भवन की यात्रा में विश्व कविता के आयोजन को ऐसा पड़ाव मानते हैं, जो देश में दोबारा नहीं हुआ। बड़े आयोजन की कोई मिसाल नहीं है। 1985 में हुए विश्व कविता आयोजन में मशहूर अंतरराष्ट्रीय कवि शामिल हुए थे। इनमें अर्नेस्तो कार्देनाल, अंग्रेजी के कवि स्टीफन, रशियन, स्पेनिश समेत योरपीय कवि इस कार्यक्रम में आए थे।

देश के हर प्रांत में बनना था:

कहते हैं कि यह एक मौलिक योजना थी कि कला का ऐसा बड़ा सेंटर देश के हर प्रांत में बने इसका स्वरूप म्यूजियम की तरह था। यह दीगर बात है कि सिर्फ मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने ही इसे साकार किया। इसके बाद किसी राज्य में इस योजना का क्रियान्वयन नहीं हो सका। भारत भवन के साथ ही उर्दू अकादमी ने कई काम किए। कई शायरों के संग्रह प्रकाशित किए गए।

हर नामचीन गायक-वादक यहां आया:

भारत भवन ऐसा सेंटर हैं जिसने देश दुनिया में कला के क्षेत्र में अपने काम से अपनी पहचान बनाई। इसके जरिए मन देश और दुनिया के पटल पर रेखांकित हुआ। उन्होंने बताया कि नृत्य और शास्त्रीय संगीत का ऐसा कोई नामचीन गायक या वादक नहीं हो जो यहां पर नहीं आया हो।

लेखकों को लिखने का अवसर:

साहित्य के क्षेत्र में निराला सृजनपीठ ने महत्वपूर्ण काम किया है। इस पीठ के जरिए हिंदी के लेखकों, कलाकारों को यह अवसर दिया गया कि वे दो साल तक इस पीठ पर रहें और आजीविका के चक्कर छोड़ कर अपना ध्यान रचना कर्म पर लगाएं। यहां की निराला सृजनपीठ पर निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, मंजूर एहतेशाम, रमेशचंद्र शाह, चित्रकार रामकुमार ने काम किया। हिंदी लेखकों को निश्चिंत होकर लेखन का मंच देने का यह उपक्रम कहीं और देखने को नहीं मिलता।


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