मेखला : कमर कस लो ब्रह्माँड के रहस्य- 54 यज्ञ विधि -12

मेखला : कमर कस लो   

                         ब्रह्माँड के रहस्य - 54    

                          यज्ञ विधि -12
रमेश तिवारी 
कमर कस लो। यह ऐसा वाक्य है, जो हमारे बडे़ और बुजुर्गों के मुंह से हमेशा सुना जाता रहता है। हमारी यज्ञ विधि में तो इसका और भी गंभीर अर्थ है। तो आज हम इसी "कमर कस लो" वाक्य के महत्व पर चर्चा करते हैं।

अग्नि का आविष्कार अंगिरा (ब्रह्मा जी) ऋषि ने किया। यज्ञ का संबंध इसी अग्नि से है। अग्नि में सोम डालने का नाम ही यज्ञ है। इसी अग्नि तत्व को पहचान कर यज्ञ विद्या का आविष्कार करने वाले यही अंगिरा प्रजापति (मूल पुरुष) थे। इसके बाद ही यज्ञ विद्या भुवन त्रिलोकी अर्थात् पृथ्वी लोक, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग लोक में प्रचलित हो गई।

हमारे पाठक भ्रम में न रहें, इसलिये फिर एक बार बता दें कि इन तीनों लोको की भौगोलिक स्थिति क्या थी! दक्षिण समुद (श्रीलंका) से काराकोरम तक पृथ्वीलोक, काराकोरम से इलावर्त  (अल्ताई पर्वत) तक अंतरिक्ष लोक और अल्ताई पर्वत से उत्तर ध्रुव तक स्वर्ग लोक)। स्वर्गलोक कोई आसमान में नहीं है।


यजमान को देवता बनाने की प्रक्रिया में हम बता चुके हैं कि, उसको किस प्रकार से मुंडन, स्नान, निवास, मक्खन लेपन, अंजन, दूर्वा से नेत्रों का स्पर्श आदि विधि अपनाना होती हैं। ठीक उसी कडी़ में यह एक और महत्वपूर्ण विधि- "कमर कस लो" से भी गुजरना होता है। कमर कस लो का मतलब है। बेल्ट बांध लो। आज कल भी हमको हवाई जहाज में अथवा कार में भी तो बेल्ट बांधना पड़ता है।

अंगिरा ऋषि (ब्रह्मा जी) ने जब पहली बार यज्ञ विधि की मर्यादा स्थापित की और अनेक यज्ञ भी किये, तो अनुभव किया कि लंबे समय तक चलने वाले यज्ञ में यजमान भोजन करेगा, तो आलस्य आयेगा। अतः उन्होंने भोजन के स्थान पर गाय के दुग्ध के सेवन की व्यवस्था दी। किंतु! साथ ही उनको यह अनुभूति भी हुई कि यजमान अधिक दिनों तक भोजन नहीं करने और मात्र दूध पीने से कमजोर हो जाएगा। तो यज्ञ में बाधा आयेगी।

इसलिये उन्होंने मेखला (कमर बंध, बेल्ट) की व्यवस्था कर दी। इसके पूर्व जब अंगिरादि ऋषि यज्ञ करते थे और दीक्षा ले लेते थे, तो उनको मात्र दूध के आहार पर ही रहना पड़ता था, तो उनको भूख भी सताया करती थी। वे परेशान हो जाते थे। कि करें तो करें क्या! बस यहीं से मेखला का शोध हुआ।

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हम कोई काम प्रारंभ करते हैं तो बडे़, बूढ़े कहते भी हैं न-देखो भाई काम पूरा करना है! कमर कस लो। हमारे वस्त्र ढीलें हों तो हम ठीक महसूस नहीं करते। अतः यह जो कमर बंद का प्रचलन है, यह मेखला का ही रूप है। हमारे बचपन में हमारे संस्कारों में एक संस्कार मेखला बंधन का भी होता था। तब हमारी कमर में मेखला की जगह काला अथवा लाल धागा बांधा जाता था। इस मेखला को ग्रामीण भाषा में "छूंटा" कहा जाता था।

वैदिक भाषा में इस मेखला को उर्जबल कहा जाता है। आपको पता होना चाहिए कि पारस्य देश (ईरान अथवा आर्यायण) से भारत में आकर बसे पारसी अभी भी नवरोज (त्यौहार) पर मेखला बांधते हैं। यह उनकी पुरानी परम्परा है। तो ऋषियों ने बडी़ खोज के बाद देखा कि भोजन के आलस्य से बचने दुग्ध पान और निरंतर मात्र दुग्ध पान से होने वाली कमजोरी से बचने का बस यही "ऊर्जबल" (ऊर्जा वृद्धि) एक उपाय है कि कमर कस लो। ताकि स्फूर्ति बनी रहे। कमजोरी की अनुभूति न हो।

किंतु समस्या यह उठी कि यज्ञ जैसे पवित्र कार्य में बैठे यजमान को किस बस्तु की मेखला बांधी जाना चाहिए। जो कि विज्ञान सम्मत भी हो और यज्ञ पदार्थों से मेल खाती भी। कहने का तात्पर्य कि मेखला ऐसे पदार्थ की होना चाहिए, जो कि आत्मा को परमात्मा तक ठीक ढंग से पहुंचाने वाले "जीपीएस" सिस्टम में फिट बैठ जाये। तब विचार के बाद, सूर्य से संबंधित दो पदार्थों पर दृष्टि गई।

एक तो शरपत (मूंज) की रस्सी और दूसरी शण (सन) की रस्सी की मेखला। मूंज की रस्सी को इसलिए नकार दिया गया क्योंकि शरपत के संयोग से ही शरीर से रक्त प्रवाहित होने लगता है। क्योंकि शरपत वज्र है। बहुत तेज धार है उसमें। तो शण को चुना गया। किंतु शण की रस्सी (मेखला में) थोडी़ सी मूंज लगाने की मर्यादा स्थापित कर दी गई।मामला अभी यहीं समाप्त नही हुआ। 

हम जानेंगे कि शण की रस्सी की मेखला ही क्यों? और मेखला बनाने की विधि कैसी होना चाहिए। ऐसी और भी अनेक संबंधित जानकारियों के साथ.. अगली कथा अब आगे। तो मिलते हैं। तब तक विदा।
              धन्यवाद।

Priyam Mishra



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