ब्रह्माँड के रहस्य -61————-यज्ञ विधि, सोम -5

सोम और सम्राट
                                                        ब्रह्माँड के रहस्य -61 
यज्ञ विधि,सोम -5
रमेश तिवारी 
पाठक मित्रों, सोम आक्सीजन है। सोम ही चंद्रमा है। सोम से ही सूर्य में चमक है। सोम तीनों लोकों का स्वामी है। सोम के बिना जीवन ही नहीं। अतः सोम के इस महत्व को ध्यान में रखते हुए हमको यहां सोमवल्ली और सोमरस के संबंध में बहुत कुछ जानना है। 

हमने बताया था कि आर्यायण के पर्वतों पर चंद्रमा की कलाओं के साथ सोम की पत्तियां घटती और बढ़ती रहतीं थीं। क्यों! इसलिये की औषधियों के राजा चंद्रमा की अमृत बिंदु वहां टपकती रहतीं थी। ब्रह्माँड में जो सोम व्याप्त है। वही सोम मनुष्य शरीर में भी व्याप्त है। जिस दिन यह आक्सीजन नहीं होगी! परिणाम हम जानते हैं।

सोम के इसी महत्व को देखते हुए दिव्यात्मा बनने जा रहे यजमान की आत्मा को विष्णु धाम तक पहुंचाने के लिये यज्ञ में सोम वल्ली को लाया जाता था। सोम आर्यायण से आता था। किंतु इतने महान अतिथि का सत्कार कैसा होता था, हम यहां समझने का प्रयास करते हैं। सोम विमानों से आता था। सोम लताओं के पवित्र जल से स्नान के बाद उसको क्रय किया जाता था। क्रय विधि का नाम था। 



"सोमक्रयणी"। यहाँं से गौर से देखें - यजमान अथवा उसके प्रतिनिधि अर्घवयु ने सोम क्रय कर लिया। सोम किन वस्तुओं को देखर क्रय किया गया, यह आगे बतायेंगे। सोम से सूर्य में कैसे चमक आई, यह महान रहस्य भी ऋषियों के माध्यम से देखेंगे।

यजमान अब सोम को अपने दुर्य (घर) लेकर जायेगा। सोम राजा है। उसकी प्रतिष्ठा सम्राट जैसी है। अतः सम्राट जैसे सम्मान बिना तो ले जा नहीं सकते। सोम रखा है! एक शकट (बैलगाड़ी) भी खडी़ है। विज्ञान के अनुसार गाडी़ में आस्तरण (अस्तर, विछावन) की जगह कृष्ण मृग चर्म बिछा हुआ है। जो दिव्य है। अब सोम वल्लियों को परिधान पहनाया जाना है। सम्राट के दिव्य वस्त्र को सोमपनहन कहते थे। यह सोमपनहन को मामूली वस्त्र नहीं होता था। बहुमूल्य होता था।

बहुत सम्मान के साथ सोम को लपेट कर कृष्णमृग चर्म पर रखा जाता था। किंतु सम्राट को हर कोई तो देख नहीं सकता, अतः उनको सोमपर्य्याणहन में रखा जाता था। अर्थात महत्वपूर्ण वस्त्र के पर्दे में। बैलगाडी़ के चारों तरफ उसको आवेष्टित (लपेटा) किया जाता था। एक कारण यह भी कि सम्राट को धूल न लगे। वायु मंडल में व्याप्त नाष्टरा (कीटाणु) न लग जाये।

दूसरी बात यह भी कि आत्मा त्रिवृत है,जैसा कि हम पूर्व में भी कह चुके हैं, सो सोम अभी गर्भ रुप में है, क्योंकि इस सोम की अग्नि में आहूति होने के बाद ही "दिव्यात्मा" उत्पन्न होगा। गर्भ मनुष्यों की दृष्टि से प्रच्छन्न रहता है। इसीलिए वेष्ठित किया गया है। तीसरी बात यह कि यह सोमवल्ली सोम होने से देवता रुप है, और देवता मनुष्यों से तिरोहित रहते हैं।

फिर सम्राट को उष्णीष (पगडी़ अथवा मुकुट) धारण कराया जाता था। उत्तम प्रकार का मुकुट अथवा दिव्य वस्त्र की पगड़ी। इन प्रत्येक प्रक्रियायें पवित्र मंत्रों से संसकारित की जातीं हैं। अब सम्राट के शकट में प्रतीनाह (झंडा) बांधा जाता है। कृष्ण मृग चर्म को लपेट कर उसी चर्म की ध्वजा लगादी जाती थी। यह प्रतीनाह, सुब्रह्मण्य (गाडी़वान) के स्तम्भ (बांस) बैठने के समीप लगाया जाता था। गाडी़ में जुते बैलों को पलाश (सोम गिरे पर्ण) शाखा से हांका जाता था। हां और फिर.! बैलों को देखा जाता। कही, बैलों पर काली झांई नहीं पड़ रही। यदि झांई दिखी तो पक्का माना जाता था कि बहुत अच्छी वर्षा होगी।

यह भी देखा जाता कि यह बैल अनश्रु (आंसू रहित) होकर घूर्षाही (भार वहन करने लायक) हैं कि नहीं। अवीरहणो (सींगों से) मारने वाले तो नहीं हैं) हैं। परिपरिन (चोर) परिपंथिन (शत्रु) और वृक (भेड़ियों) से सुरक्षा करते हुए, सोम सम्राट को घर लाते थे। किंतु घर आये सम्राट की जो अगवानी की जाती थी, वह भी अद्भुत होती थी। मत्रों सहित बैलगाडी़ खडी़कर फिर बैलों के शैला और जोत (गला बांधने के) खोलकर, गाड़ी को औदुम्बर( गूलर) की कुस्तुम्भी (जूडी़ में बंधी टेकी) पर ऐसा खडा़ करते थे कि सम्राट का सम्मान कम न हो। गाडी़ नीची न हो।

यह नाभि बराबर ऊंची कुस्तुम्भी गूलर की लकडी़ की इसलिए होती थी, क्योंकि संसार के सभी वृक्षों में "गूलर का वृक्ष" सबसे शक्तिशाली और फल सर्वोतम औषधि है। नाभि तक ऊंची इसलिए होती क्योंकि नाभि से ही भुक्त अन्न प्रतिष्ठित होता है। रस और रूप का विभाग भी नाभि से होता है। सोम अन्न है, अतः इसको नाभि में ही प्रतिष्ठित करना चाहिए। और सर्वाधिक विज्ञान यह कि नाभि में ही वीर्य का स्थान है। सोम ही वीर्य है। अतः नाभि प्रमाण की आसंदी होती है।

कल हम पुराणों में वर्णित इंद्र और अहिल्या की आधिभौतिक कथा को आधिदैविक (ब्रह्माँड की सुंदर वैज्ञानिक घटना) कथा का वर्णन करेंगे, वह भी सोम से संबंधित। यह भी देखेंगे कि यज्ञ स्थल जाने तक सोम सम्राट का कैसा आतिथ्य होता है।

तो मित्रो, आज बस यहीं तक। मिलते हैं। तब तक विदा। 
                                               धन्यवाद। 

Priyam Mishra



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