पराम्बा भगवती आदि शक्ति प्रधान दस महाविद्या और पृथ्वी 

पराम्बा भगवती आदि शक्ति प्रधान दस महाविद्या और पृथ्वी 
वैकुण्ठ धाम निज निवास में भगवान विष्णु ने पराम्बा ध्यान में लीन अपने पार्षदों जय विजय को निर्देशित किया कि मेरी साधना के इस समय में कोई अन्य व्यक्ति अन्दर प्रवेश न कर पाये। उसी समय प्रभु-दर्शन लालसा को हृदय में रखकर सनक सनन्दन- सनातन और सनत्कुमार जो ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं पधारे । 

जय विजय के द्वारा महर्षियों को रोकने पर ऋषियों ने जय विजय को शाप दिया कि तुम तीन जन्मों तक दैत्य रूप धारण करो । जय विजय द्वारा क्षमा प्रार्थना करने पर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी सहित ऋषियों की आज्ञानुसार उन्हें तीन जन्मों में मुक्त करने का आश्वासन दिया। प्रथम जन्म में जय-विजय ने हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष के रूप में अवतरित होकर कठोर तप द्वारा ब्रह्मा जी से असीमित शक्ति के वरदान प्राप्त किये। हिरण्याक्ष अपने बल के प्रभाव से सम्पूर्ण पृथ्वी को लेकर जल के अन्दर प्रवेश कर गया।

DUS Mahavidya
तब पृथ्वी के उद्धारार्थ भगवान ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष का उद्धार किया एवं पृथ्वी को लाकर स्थापित किया । भगवान् जब पृथ्वी को ला रहे थे तब पृथ्वी ने भगवान् से कर बद्ध प्रार्थना की कि मुझे कहाँ स्थापित करेंगे ? क्योंकि यहाँ तो समग्र जल ही जल है। भगवान ने पृथ्वी से कहा कि मैं तुम्हें अपने गोलोक धाम के जैसे अलौकिक एवं सत्य स्थान पर स्थापित करूंगा । पृथ्वी के द्वारा यह पूछने पर कि वह स्थान कौन सा है भगवान ने मथुरा-पुरी और यमुना तट-विश्राम घाट एवं वहाँ स्थित माथुर ब्राह्मणों को अलौकिक और दिव्य बताते हुए यह कहा -

न केशवसमो देवो, न माथुरसमो द्विजः ।

न विश्रामसमं तीर्थं सत्यं सत्यं वसुन्धरे ।।

पृथ्वी ने यहाँ इन माथुर ब्राह्मणों को श्री महाविद्या जी की उपासना एवं साधना में लीन पाया । 'महाविद्या जी के स्वरूप का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार किया गया है

देवीं कदम्बवनगामरूण-त्रिकोण

संस्थां सितां सिततराम्बुजकर्णिकास्थाम् ।

सत्पुस्तकाक्षवलयाङ्कितपाणिपदमा, वागीश्वरीं कुलगुरूं प्रणमामि भक्त्या ।।

वाराह पुराण के अनुसार वाराह जी ने अपने श्रीमुख से श्री विश्राम घाट की महिमा का वर्णन निम्नोक्त किया है

गंगायाः शतगुणं पुण्यं यत्र केशी निपातितः । ततः शतगुणं पुण्यं यत्र विश्रान्तिता हरेः ।।

अर्थात् वाराह भगवान् ने प्रथम विश्रामघाट पर विश्राम किया एवं नारायण भगवान् ने असुर वध कर पृथ्वी भार को हरण किया एवं यहाँ आकर अपने श्रम को दूर किया । इसलिये आज भी विश्रामघाट के समीप में “गत श्रम 

भगवान्" का स्थान विद्यमान है। इसी श्रेष्ठ मथुरापुरी में दस महाविद्याओं में श्रेष्ठ भगवती महाविद्या (तारा) का स्वरूप विद्यमान हैं। जिसका वर्णन शास्त्रों में निम्नलिखित हैं ।

काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी । बगला छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा ।।

मातङ्गी त्रिपुरा चैव विद्या च कमलात्मिका ।

एता दश महाविद्या सिद्धिदा च प्रकीर्तिताः ।।

महाविद्याजी के 10 स्वरूप हैं


१. काली २. तारा ३. भुवनेश्वरी ४. कमला ५. धूमावती ६. भैरवी ७. बंगलामुखी ८. छिन्नमस्ता ९. ललिता १०. मातङ्गी

इन दसों महाविद्याओं को श्रीकुल एवं कालीकुल के नाम से साधक लोग जानते हैं ।

Mahavidya
भगवती महाविद्या वर्तवान में जहाँ विराज रही है, उसे अम्बिका वन के नाम से जाना जाता है जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत दशमस्कन्ध के ३४वें अध्याय में स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है । इसी अम्बिका वन में नन्दबाबा कृष्ण - बलराम को साथ लेकर भगवती के पूजन के लिए आये थे ।

प्राचीन कथानक (आज से लगभग २५० वर्ष पूर्व) यह भी है कि तांत्रिक सम्राट दीक्षित अपनी एकान्त साधना के लिये यहाँ आये एवं उस स्थान के चारों और भूतों का परकोटा लगाकर एकान्त साधना किया करते थे। साथ ही साथ दो सिंह मन्दिर के द्वार पर रक्षा के लिये नियुक्त कर दिये थे । उसी समय माथुर चतुर्वेद- श्री विद्या पीठाधीश्वर श्री शीलचन्द्र जी महाराज वहाँ पधारे एवं भूतों के परकोटे को काटकर उन दोनों सिहों को स्तम्भित कर पत्थर का बना दिया एवं मंदिर में जाकर साधना की । इन्हें सत्पात्र जानकर सम्राट दीक्षित ने पूजापात्र एवं श्रीयंत्र इन्हें प्रदान किया जो आज भी यहाँ विद्यमान हैं । छत्रपति शिवाजी ने भी आगरा जेल से गुप्त रूप में निकलने के बाद सत्ता प्राप्तकर यहाँ आकर मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया ।

 

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