भारतीय समाज:- वानप्रस्थ आश्रम (Vanprastha Ashram)


स्टोरी हाइलाइट्स

भारतीय समाज:- वानप्रस्थ आश्रम (Vanprastha Ashram) यद्यपि 25-25 वर्षों के कालखण्ड के अनुसार 50 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने का प्रावधान होना चाहिए था, पर जैसा कि इसके पूर्व के पृष्ठों में उल्लेख किया गया है कि आश्रमों के साथ आयु की अवधि ठीक 25-25 वर्ष नहीं रखी गई थी, वरन् यह विभाजन सुविधा हेतु किया गया था। उदाहरणस्वरूप, एक बालक पूर्ण 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम में न बिताकर उपनयन संस्कार की अवधि से लेकर स्नातक संस्कार तक की अवधि बिताता था। जिस प्रकार १ वर्ण के लिए उपनयन संस्कार की आयु एक समान नहीं थी, उसी प्रकार स्नातक संस्कार भी उस आयु में संपादित किया जाता था, जब गुरु यह अनुभव करता था कि शिष्य ने पूर्ण विद्या प्राप्त कर ली है। अतः यह अवधि 25 वर्ष से कुछ कम या अधिक भी हो सकती थी ठीक इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश के लिए ठीक 50 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेना अनिवार्य नहीं था। वस्तुत जब गृहस्थ यह अनुभव कर लेता था कि उसने सभी ऋणों से उक्ण होने का कार्य कर लिया है. गृहस्थ धर्म का निर्वाह कर लिया है तब यह संसार से विरक्त हो जाता था। इसके साथ ही उसके मन में वानप्रस्थ होने की इच्छा उत्पन्न होती थी मनु का कथन है कि- "जब गृहस्थ यह अनुभव करे कि उसकी त्वचा शिथिल पड रही है तथा बाल सफेद हो गए हैं तथा सन्तान की भी सन्तान हो चुकी है, तब उसे गृहस्थ आश्रम को त्यागकर वन की ओर प्रस्थान करना चाहिए| इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम वह आश्रम है जिसमें व्यक्ति गृहस्थ आश्रम के पश्चात् प्रवेश करता था। अब न उसका कोई घर-बार न धन-सम्पत्ति। समाज से परे वह दान में कुटिया बनाकर रहता था। वस्तुतः यह आश्रम एक संक्रमणकालीन आश्रम था। संक्रमण से अभिप्राय यह है कि इस आश्रम में व्यक्ति न तो गृहस्थ का जीवन-निर्वाह करता था और न ही पूरी तरह सांसारिकता से निर्लिप्त होता था। शन-शनैः वह सांसारिकता, समाज, कुटुम्ब, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार आदि से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करता था। यही कारण है कि वानप्रस्थी को पत्नी साथ रखने की अनुमति तो थी, यास की नहीं। ब्रह्मचर्य आश्रम में अ्ित जञान तथा गृहस्थ आश्रम में प्राप्त अनुभवों के अनुसार वानप्रस्थ अपने ज्ञान को परिमार्जित करता था। इस प्रकार परिपक्व ज्ञान अपने आश्रम में रहने वाले ब्रह्मचर्य को प्रदान करता था वनों में रहने के कारण उसे वनस्पतियों से संबंधित भरपूर शान हो जाता था। अत यानप्रस्थी चिकित्सक का कार्य भी करता था। इसी प्रकार आवश्यकतानुसार राजा अथवा प्रजा को मार्गदर्शन देने के दायित्व का निर्देश भी दानप्रस्थी को करना पड़ता था स्पष्ट है कि वानप्रस्थी का संया समाज से रहता था, परन्तु नियंत्रित रूप में। सांसारिकता से छुटकारा पाने के लिए वानप्रस्थी को आत्म-नियंत्रण रखना पड़ता था| इसके अतिरिक्त लोभ मोह, क्रोध, अहंकार आदि से मुक्ति हेतु उसे कठोर तप भी करना पड़ता था शरीर को संन्यास के योग्य बनाने के लिए शारीरिक सुख की अपेक्षा कष्टों को सहने की सुख-दुख से निर्लिप्त होने तैयारी भी कठिन तप के माध्यम से वानप्रस्थी को करनी पड़ती थी उदाहरणस्वरूप वानप्रस्थी दिन भर पंजे के बल खड़े होकर, वर्षा ऋतु में नदी अथवा तालाब में खड़े होकर, ग्रीष्म ऋतु में अपने चारों ओर अग्नि जलाकर तथा शीत ऋतु में गीले वस्त्र पहनकर तपस्या करता था। इस प्रकार का कठोर जीवन तथा तप करते हुए वह शनैः-शनैः समाज और संसार से विरक्त बन ही जाता था। यह वानप्रस्थ आश्रम की चरम अवस्था मानी गई।