हिंदू-संस्कृति और रामायण: Hindu Culture and Ramayana:

हिंदू-संस्कृति और रामायण: एक महान् आदर्श ग्रंथ

What is the importance of the Ramayana in Indian culture

हिंदू-संस्कृति के स्वरूप को बतलाने के लिये रामायण एक महान् आदर्श ग्रंथ है। उसमें हिंदू-संस्कृति का स्वरूप स्थल-स्थल पर भरा है। हिमालयका 'हि' और सिन्धु (समुद्र)-का 'न्धु' लेकर 'हिन्दू' शब्द बना है। उसीका अपभ्रंश 'हिंदू' शब्द है। हिमालय से समुद्र तक के स्थान का नाम है हिंदुस्थान और उसमें बसने वाली जातिका नाम हिंदू है। हिंदू जाति का ही दूसरा नाम है-आर्य जाति, श्रेष्ठ जाति। किस जाति का चाल-चलन, रहन-सहन, आचार-व्यवहार आदि जो स्वाभाविक कल्याणमय आचरण है, उसका नाम है 'हिंदू-संस्कृति'। आर्य पुरुषों की उक्त संस्कृति सदाचार कहा जाता है। उनका चाल-चलन, आहार-विहार, खान-पान आदि प्रत्येक आचरण श्रुति-स्मृतिविहित होने से आत्मा का कल्याण करने वाला है। इस लोक और परलोक में कल्याण करने वाला होने के कारण इस सदाचार की ही 'हिंदू-धर्म'* कहते हैं। यह अनादि काल से चला आ रहा है, इसलिये इसी को 'सनातन-धर्म' कहते हैं।
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मनु का वचन है 
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतत् चतुर्विधं प्राहु साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥

'वेद, स्मृति, सत्पुरुषों का आचरण तथा अपने आत्माका प्रिय (हित) करने वाला कार्य-इस तरह चार प्रकार का यह धर्म का साक्षात् लक्षण कहा गया है। यह सनातन धर्म ईश्वर का कानून है और सदा ईश्वर का निवास करता है। यह सृष्टि के आदि में ईश्वरसे ही प्रकट होता है। भगवान ने गीता में कहा है


इमं विवस्वते विवस्वान्मनवे योगं प्राह प्रोक्तवानहमव्ययम्। मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥

'मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।' तथा यह प्रलय के समय ईश्वर में ही समा जाता है। इसलिये ईश्वर ही इसकी प्रतिष्ठा हैं। भगवान ने स्वयं कहा है

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

'क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृतका तथा नित्य धर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मैं हूँ। अत: इस शाश्वत धर्म को ईश्वर का स्वरूप ही कहा जाता है। यह सदा से है और सदा रहेगा, इसलिये इसका नाम 'सनातन-धर्म' है। यह कभी प्रकट रूप से रहता है, कभी अप्रकट रूप से; किंतु इसका कभी विनाश नहीं होता। ईश्वर के अवतार की भाँति इसका केवल प्रादुर्भाव और तिरोभाव होता है।

वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण के समस्त श्लोक तथा तुलसीकृत रामचरितमानस के सारे दोहे, चौपाई, छन्द आदि सभी इसी शाश्वत धर्म रूप हिंदू-संस्कृतिका दिग्दर्शन करा रहे हैं। उनमें भी श्री राम और सीता के आदर्श चरित्र एवं सभी भाइयों का परस्पर भ्रातृप्रेम हिंदू-संस्कृतिके प्रधान निदर्शक हैं।

श्री रामचन्द्रजी की सारी ही चेष्टाएँ धर्म, ज्ञान, नीति, शिक्षा, गुण, प्रभाव, तत्त्व एवं रहस्य से भरी हुई हैं। उनका व्यवहार देवता कृषि, मनि, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी के साथ बहुत ही प्रशंसनीय, अलौकिक और अतुलनीय है। देवता, ऋषि मुनि और मनुष्यों की तो बात ही क्या जाम्बवान, सुग्रीव, हनुमान आदि रीछ-वानर; जटायु आदि पक्षी तथा विभीषण और राक्षसों के साथ भी उनका ऐसा दयापूर्ण, प्रेमयुक्त और त्यागमय व्यवहार हुआ है कि जिसे स्मरण करने से ही रोमांच हो आता है।

भगवान श्री राम की कोई भी चेष्टा ऐसी नहीं, जो कल्याणकारिणी न हो। उन्होंने साक्षात् परब्रह्म परमात्मा होते हुए भी मित्रों के साथ मित्रका-सा, माता-पिता के साथ पुत्र का-सा, स्त्री के साथ पतिका-सा, भाइयों के साथ भाई-सा, सेवकों के साथ स्वामीका-सा, मुनि और ब्राह्मणों के साथ शिष्यका-सा-इसी प्रकार सबके साथ यथायोग्य त्यागयुक्त प्रेमपूर्ण व्यवहार किया है। अत: उनके प्रत्येक व्यवहार से हम लोगों को शिक्षा लेनी चाहिये।

श्रीरामचन्द्रजी के राज्य का तो कहना ही क्या है, उसकी तो संसार में एक कहावत हो गयी है। जहाँ कहीं सबसे बढ़कर सुन्दर शासन होता है, वहाँ 'रामराज्य' की उपमा दी जाती है। श्रीराम के राज्य में प्रायः सभी मनुष्य परस्पर प्रेम करने वाले तथा नीति, धर्म, सदाचार और ईश्वर की भक्ति में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करने वाले थे । प्रायः सभी उदारचित्त और परोपकारी थे। वहाँ के प्रायः सभी पुरुष एकनारीव्रती और अधिकांश स्त्रियां पतिव्रत-धर्मका पालन करनेवाली थीं। भगवान् श्रीराम का इतना प्रभाव था कि उनके राज्य में मनुष्य की तो बात ही क्या, पशु-पक्षी भी प्रायः परस्पर वैर भुलाकर निर्भय विचरा करते थे। भगवान श्रीराम के चरित्र बड़े ही प्रभावोत्पादक और अलौकिक थे यह हमारे आर्य पुरुषों का स्वाभाविक ही व्यवहार था। इसी आदर्शको हिंदू-संस्कृति कहते हैं । हमें उसी आदर्श को लक्ष्य में रखकर उसका अनुकरण करना चाहिये।


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