जनजातीय: भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक दृष्टि का व्यवहारिक रूप

जनजातीय: भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक दृष्टि का व्यवहारिक रूप
भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक दृष्टि का व्यवहारिक रूप जनजातीय जीवन और उनके सौन्दर्याभिव्यक्ति में प्रामाणिक रूप से देखा जा सकता है। जनजातीय वाचिक साहित्य के सभी पक्षों चाहे वे मिथक, कथा, गीत अथवा कहानियाँ हों, बहुत लम्बी नहीं हैं। लम्बे गीत या कथाएँ इनमें नहीं पायी जाती। दो-तीन से लगाकर पाँच या छः पंक्तियों के गीत ही प्रायः इनमें पाये जाते हैं, लेकिन इन गीतों के सहारे पूरी रात नर्तन किया जा सकता है। सैकड़ों बार इनकी पुनरुक्ति होगी, किसी भी सदस्य को इसमें परहेज नहीं है। नृत्य की मुद्राओं में भी बहुत विविधता नहीं है। दो या तीन मुद्राएँ ही रातभर चलने वाले नृत्य के लिए पर्याप्त हैं। समुदाय के सभी सदस्य इसका हिस्सा होते हैं, उनमें कोई भी ऐसा नहीं है, जो विशिष्ट कलाकार हो या किसी गुरु के द्वारा प्रशिक्षित किया गया हो।


जनजातीय समुदायों में प्रायः ऐसा ही रूप उनके शिल्प संसार में भी देखने को मिलता है। जीवन की जरूरतों की लगभग सभी वस्तुएँ आपसी समन्वय से तैयार कर ली जाती हैं। मसलन खेती-किसानी के उपकरण, घर के दरवाजे, खिड़की, चारपाई, चूल्हा-चकी आदि का निर्माण, शादी-विवाह से सम्बन्धित वस्तुएँ और दूसरी चीजें जैसे मण्डप, खम्ब, सूपा, टोकनी आदि स्वयं ही बनाते हैं। यहाँ अलग से कोई कलाकार नहीं होता। सम्भवत: नगरीय समुदायों ने उनकी कुशलता और कौशल को देखकर उन्हें कलाकार को संज्ञा दी हो।

जनजातीय जीवन शैली में केन्द्रीय रूप से दोहराव बहुत गहरे तक काम करता है, उनके शिल्प संसार में प्राय: एक ही भांत (डिजाइन) को बार-बार बनाया जाता है। गीत की एक ही पंक्ति को बार-बार दोहराया जा रहा है। दशहरा अन्य समुदायों में नीरसता का बोध कराता है। विशेषकर नागर समुदाय हर बार कुछ नया, कुछ अलग करना चाहता है। हम किसी जगह या दृश्य को बार-बार नहीं देख पाते। हमारा मन बहुत गति में है। हमने अपनी जरूरतें इस तरह से परिकल्पित कर ली हैं कि हमें हर बार कुछ नया चाहिए। वहीं हमारे समय में ही जी रहे जनजातीय समुदायों की जीवन शैली, जिसके केन्द्र में दोहराव लगभग अनिवार्य है इस प्रवृत्ति ने उनके मन की गति को स्थिर सा कर दिया है। मन को चंचल वृत्ति को ही स्थिर करने के उपाय धरती की सभी आध्यात्मिक परम्पराओं ने प्रस्तावित किये हैं। ऊर्ध्व यात्रा के लिए यह अनिवार्य है। मन की स्थिरता होने से हमारी अपरिमित इच्छाओं का भी तुरन्त ही समापन होता है। ऐसा मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के अतिरिक्त संसाधनों का संग्रह नहीं कर सकता। भविष्य के लिए संग्रह की प्रवृत्ति से निजात का यह अर्थ है कि ऐसा मनुष्य किसी भी प्रकार को दुष्प्रवृत्तियों में स्वयं को संलग्न नहीं कर सकेगा ऐसे मनुष्य को हो परम्परा ने संतुष्ट' कहा है।

LokhandJan-Newspuran-MPJanjatiSangrahalaya-04जनजातीय समुदाय हमारी समझ में समय के त्रिआयाम में नित्य वर्तमान का साक्ष्य है। उसके पास स्मृति से प्रेरित होने के लिए कोई पुराण नहीं हैं। वह अपने परिवेश की चुनौतियों के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर जीवन को सुगम बनाता है। उसके लिए दूसरा चुनौती नहीं है। विकास क्रान्ति के युग में हमारा पड़ोस ही हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। उसके द्वारा हमारे लिए जो आसन्न खतरे पैदा किये जायेंगे, उसकी समय रहते तैयारियाँ ही हमारी वास्तविक चुनौतियाँ हैं। हम इन अवास्तविक चुनौतियों की तैयारी करते-करते कब अपने पड़ोस की तरह हो जाते हैं, यह हमको पता ही नहीं चलता। फिर हमारे सारे तर्क, सभी जरूरतें उस तल से आकलित होने लगती हैं, जो कल तक हमारे लिए मायने नहीं होती थीं। हम स्वयं ही अपने कमजोर पड़ोस को इतना शक्तिशाली बना लेते हैं कि उससे आगे होने के लिए अपने मूल्यों का त्याग कर देते हैं और फिर बाद में कभी हम इस पर विचार करना भी ठीक नहीं समझते, जो अवास्तविक यात्रा हम कर चुके होते हैं, उससे लौटना असंभव नहीं तो बहुत कठिन तो हो ही जाता है। कमोवेश यही स्थिति प्रत्येक सभ्यता के साथ हुई है।

वर्तमान समय में भारतीय ज्ञान और दर्शन के व्यवहारिक पक्ष को देखने-समझने के लिए हमें जनजातीय जीवन से ही प्रमाण प्राप्त हो सकते हैं। अब यह आधार भी खिसक रहा है। संस्कृति का वास्तविक संरक्षण स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाओं के क्रियान्वयन से सम्भव है- अन्यथा जीवन दर्शन ही बचेगा-जीवन नहीं। देश के कई राज्यों में गोंड जनजाति का निवास है। स्थानीय परिवेश के कारण उनकी मान्यताओं में अंशत: भेद दिखाई देता है, पर तत्वत: वह भेद ऊपरी है। आंतरिक रूप से बिल्कुल भी नहीं है।

 साभार 
अशोक मिश्र


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