रामायण का सच....सीता के त्याग को क्या साजिशन जोड़ा गया ?


स्टोरी हाइलाइट्स

इसका रचना काल लगभग 1500 इस्वी है. इसकी मूल भाषा कन्नड़ है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद चुका है. इसके लेखक तोरवे नरहरी जी है....Uttar Kand ramayan

रामायण का सच....सीता के त्याग को क्या साजिशन जोड़ा गया ?

Uttar Kand ramayan

क्या राम को बदनाम करने अलग से जोड़ा गया उत्तर रामायण ?

जो राम अपनी पत्नी का हरण करने वाले रावण के विनाश के लिए समुद्र पर पुल बांधकर लंका पर चढ़ाई करते हैं।

जो राम पत्नी की तलाश में वन वन भटकते हैं।

जो राम अपनी पत्नी के लिए राक्षस वंश का विनाश करते हैं।

उनकी ऐतिहासिक गाथा में उत्तर रामायण को अलग से जोड़ने की बातें प्रमाणित होती जा रही हैं।

तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में सीता को छोड़ने का ज़िक्र नही किया। पदम् पुराण से लेकर राम कथा बताने वाली इतिहासिक किताबों में उत्तर रामायण को स्वीकार्यता नही दी। रावण को मारने के बाद राम-सीता ने बरसों तक राज किया । इस दौरान सीता के परित्याग जैसी कोई घटना नही हुई ।

शोधकर्ताओं का म‍त : विपिन किशोर सिन्हा ने एक छोटी शोध पुस्तिका लिखी है जिसका नाम है : 'राम ने सीता-परित्याग कभी किया ही नहीं।' यह किताब संस्कृति शोध एवं प्रकाशन वाराणसी ने प्रकाशित की है। इस किताब में वे सारे तथ्‍य मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि राम ने कभी सीता का परित्याग नहीं किया।


जिस सीता के लिए राम एक पल भी रह नहीं सकते और जिसके लिए उन्होंने सबसे बड़ा युद्ध लड़ा उसे वह किसी व्यक्ति और समाज के कहने पर क्या छोड़ सकते हैं? राम को महान आदर्श चरित और भगवान माना जाता है।

वे किसी ऐसे समाज के लिए सीता को कभी नहीं छोड़ सकते, जो दकियानूसी सोच में जी रहा हो। इसके लिए उन्हें फिर से राजपाट छोड़कर वन में जाना होता तो वे चले जाते।

दरअसल, शोधकर्ता मानते हैं कि रामायण का उत्तरकांड कभी वाल्मीकिजी ने लिखा ही नहीं जिसमें सीता परित्याग की बात कही गई है।

रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि 'वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकांड' मूल रामायण के बहुत बाद की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है।' (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1950)

लेखक के शोधानुसार 'वाल्मीकि रामायण' ही राम पर लिखा गया पहला ग्रंथ है, जो निश्चित रूप से बौद्ध धर्म के अभ्युदय के पूर्व लिखा गया था। अत: यह समस्त विकृतियों से अछूता था। यह रामायण युद्धकांड के बाद समाप्त हो जाती है। इसमें केवल 6 ही कांड थे, लेकिन बाद में मूल रामायण के साथ बौद्ध काल में छेड़खानी की गई और कई श्लोकों के पाठों में भेद किया गया और बाद में रामायण को नए स्वरूप में उत्तरकांड को जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

ऐसा भी कहा जाता है कि बौद्ध और जैन धर्म के अभ्युदय काल में नए धर्मों की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता को प्रतिपा‍दित करने के लिए हिन्दुओं के कई धर्मग्रंथों के साथ इसी तरह का हेरफेर किया गया। इसी के चलते रामायण में भी कई विसंगतियां जोड़ दी गईं। बाद में इन विसंगतियों का ही अनुसरण किया गया। कालिदास, भवभूति जैसे कवि सहित अनेक भाषाओं के रचनाकारों सहित 'रामचरित मानस के रचयिता ने भी भ्रमित होकर उत्तरकांड को लव-कुश कांड के नाम से लिखा। इस तरह राम की बदनामी का विस्तार हुआ।

संत मुरारी बापू कहते हैं हो सकता है किसी एक पुराण या ग्रन्थ में आया हो की राम ने सीता का त्याग किया। लेकिन मेरे तुलसीदास जी ने कहीं भी नहीं कहा है कि त्याग हुआ है। जब तुलसीदास ने नहीं कहा तो त्याग हुआ ही नहीं है। बात खत्म।

Uttar Kand ramayan

उत्तर काण्ड बाद में मिलाया है. इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं।

1- “THE ILIAD OF THE EAST” “दी इलियड ऑफ दी ईस्ट” रामायण का इंगलिश मे संक्षिप्त अनुवाद है जो FREDERIKA RICHARDSON ने किया था। इसे MACMILLAN AND CO ने 1870 मे प्रकाशित किया था। इसमे केवल पहले 6 काण्डों का ही विवरण है। यदि इस अनुवादक के सामने उत्तरकाण्ड होता तो क्या वह उत्तरकाण्ड का अनुवाद न करता।

2 RALPH T. H. GRIFFITH ने 1874 में रामायण का इंगलिश मे अनुवाद किया है। इसे लंदन मे TRUBNER AND CO ने तथा भारत मे बनारस मे Lazarus And Co ने छापा था। इसमे भी पहले 6 भागों का अनुवाद है। युद्धकाण्ड के अंत मे अनुवादक उत्तरकांड के विषय मे लिखता हैं –

अर्थात एक महाकाव्य के रूप मे रामयण विजयी राम की अपनी रानी को बचाने और अपने पूर्वजो की राजधानी मे राज्याभिषेक के साथ पूरी हो जाती है। छठे अध्याय के अंतिम खंड मे वाल्मीकि राम के गौरवशाली और खुशाहाल शासन की बात करते हैं और उनके लिए आशीर्वचन कहते हैं जो रामायण को पढ़ते और सुनते हैं। इससे यह निश्चित हो जाता है कि महाकाव्य यहाँ समाप्त हो जाता है। उत्तरकाण्ड बाद की रचना है जो किसी दूसरे द्वारा लिखी गई है।

3 – वाल्मीकि रामायण की संस्कृत में 3 टीका मिलती है. उसमे से सबसे मुख्य तथा पुरानी टीका श्री गोविन्दराज जी की है. गोविन्दराज जी ने अपना व् अपने गुरु का परिचय बालकाण्ड में रामयण के आरम्भ में तथा युद्ध काण्ड के अंत में दिया है. बिच में कहीं पर ही अपना परिचय नहीं दिया है. यदि गोविन्दराज जी के सामने उत्तर काण्ड होता तो वह अपना परिचय युद्ध काण्ड ने न देकर उत्तर काण्ड में देते.

4-सन 1900 के आसपास तक जो भी गोविन्दराज की टीका सहित वाल्मीकि रामायण छपी है उनमे उत्तरकाण्ड की टीका नहीं है. परन्तु 1930 के संस्करण में गोविन्दराज की उत्तर काण्ड पर टीका मिलती है.उसके उत्तर काण्ड पर जो टीका दी गई है वह पिछले 6 काण्डों की टीका से बिलकुल अलग है और उत्तर काण्ड को रामायण का हिस्सा दिखाने के लिए बनाई है.

5 भारत में वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर कई प्रादेशिक भाषाओं में रामायण लिखी गई है. जैसे कम्ब रामायण (तमिल में), रंगनाथ तेलुगु (तेलुगु में), तोरवे रामायण (कन्नड़ में) तथा तुलसीदास जी की रामचरित मानस (अवधि में). अब हम क्रम से इन पर विचार करते है.

[1]- कम्ब रामायण – इसका रचना काल लगभग बारहवी शताब्दी है. संस्कृत से भिन्न उपलब्ध भाषाओ में यह सबसे पुरानी रामायण है. इसके लेखक महाकवि कम्बन है. इसकी मूल भाषा तमिल है. अब तक इसके हिन्दी में (पहला अनुवाद 1962में बिहार राजभाषा परिषद् ) कई अनुवाद हो चुके है. इसमें भी बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक 6 ही काण्ड है. यह भी भगवान् श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् श्री राम जी द्वारा दरबार में सभी के लिए प्रशंसा वचन के साथ पूरी होती है. यह बहुत अधिक वाल्मीकि रामायण से मिलती है. यदि महाकवि कम्बन जी के सामने वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह इसका वर्णन जरुर करते. परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे.

[2] रंगनाथ रामायण – इसका रचना काल लगभग 1380 इस्वी है. इसकी भाषा तेलुगु है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद (1961 में बिहार राजभाषा परिषद द्वारा) चुका है. यह रामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् दरबार के दृश्य के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक 6 काण्ड है. यदि इसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह अवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे. *

[3]- तोरवे रामायण - इसका रचना काल लगभग 1500 इस्वी है. इसकी मूल भाषा कन्नड़ है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद चुका है. इसके लेखक तोरवे नरहरी जी है. यह रामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक, सुग्रीव आदि को विदा करना, रामराज्य में सुख शान्ति, दरबार के दृश्य तथा रामायण पढने के लाभ के वर्णन के साथ पूरी हो जाती है .

इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक 6 काण्ड है. यदि इसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह अवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे.
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